अपने हिस्से का (लघुकथा)

दिसंबर, 2025

tikeshaw sinha
टीकेश्वर सिन्हा ‘गब्दीवाला’
घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)

देवकुँवर तीस साल की उम्र में माँ बनी थी। हीरा जैसा हीरा लाल बेटा मिला था। फिर ईश्वर की ऐसी कृपा हुई कि तीन बेटे व दो बेटियाँ और हुए। भरे-पूरे परिवार में खुश एक दिन देवकुँवर ने बिदेशी राम से कहा- ‘हीरा के बाबूजी! अब हमारे सुख के दिन फिरे।’
और पास आते हुए बिदेशी राम बोला- ‘तो फिर तुम्हारी आँखों में आँसू काहे को… ? यह सुख तो हमें मिलना ही था। ये हमारे अपने हिस्से का है देवकुँवर।’ बिदेशीराम ने देवकुँवर को उंगली पकड़कर अपने पास बिठाया।
समय की चिड़िया ने उड़ान भरी। भाग्य ने पलटा खाया। बिदेशी राम और देवकुँवर अपने छोटे बेटे को कैंसर से नहीं बचा पाए। बेटे की अर्थी उठी।
अपने आँसुओं को अंदर धकेलते हुए बिदेशीराम बिलखती देवकुँवर के पास आया। उसके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा- ‘नहीं रोना देवकुँवर। यह दुःख तो हमें मिलना ही था। ये भी हमारे अपने हिस्से का है। इस संसार में सभी सुख और दुःख के हिस्सेदार होते हैं।’
अंतिम संस्कार में शामिल होने आये लोग हिस्से और हिस्सेदारी की बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे।
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