जून, 2026

फरीदाबाद, हरियाणा
‘’कावेरी ओ कावेरी’’ मंगला ने आवाज लगाई ‘कहाँ खो जाती हो तुम बार-बार, मंदिर नहीं चलना है क्या।’ कावेरी जैसे नींद से जाग गई ‘’हाँ-हाँ, बस चलती हूँ।‘’ आज उसके बेटे सरयु का जन्मदिन है। तीस वर्ष पहले का आज का दिन उसकी आँखों में तैर गया जब उसे बाहों के झूले में झुलाती अस्पताल से घर लाई थी। पूरा घर उसके आने से चहक उठा था। बधाई देने वालों का स्वागत, उसने और उसके पति रामेश्वर नाथ ने दिल खोलकर किया था। करते भी क्यों न, आज दस बरस के बाद उनकी जीवन बगिया महकी थी। रिश्तेदारों और दोस्तों का तांता लगा हुआ था। सभी कह रहे थे कावेरी की सूनी गोद ईश्वर ने भर दी है। रामेश्वर नाथ के वंश को चलाने वाला आ गया है।‘’
रामेश्वर नाथ ने सरयु की परवरिश में कोई कमी नहीं रखी। अच्छे से अच्छा स्कूल, महँगे कपड़े, उसकी परमाइश की हर चीज उसे मिलती रही और वह राजकुमार की तरह पलता रहा।
दिन, महीने और साल किस तरह गुजर गए पता ही नहीं चला और सरयु जवान हो गया। वह दिन भी आ गया जब कावेरी के घर शहनाइयाँ बजी और दुल्हन के रूप में सोनाली उसके घर आ गई।
सोनाली बड़े घर की थी। सरयु की तरह ही कम्प्यूटर इंजीनियर। सबका कहना था कि रामेश्वर नाथ जी बहुत ही किस्मत वाले हैं। उन्हें रूपवन्ती गुणवन्ती और अच्छी कमाऊ बहू मिली है। पर उन्हें इन बातों का ध्यान कहाँ था। उन्हें तो बहु के रूप में एक प्यारी सी बेटी मिलने की खुशी थी। जीवन अपनी रफ्तार से चलता रहा और कावेरी अपने छोटे से घर-परिवार में रमी रही। पति की सेवा के साथ-साथ पुत्र और पुत्र-वधु की सेवा में उसे बहुत संतोष मिलता। रामेश्वर नाथ जी कभी-कभी कह देते ‘’अब तुम्हारे आराम करने के दिन हैं, थोड़ा काम बहु को भी सिखा दो’’ पर कावेरी तो न जाने किस मिट्टी की बनी थी, कहती ‘’अरे बच्चों का काम करने से कोई थकता है क्या, नाजों से पालूंगी दोनों को’’।
सोनाली भी कभी काम में कोई पहल नहीं करती। दफ्तर से आकर सीधे अपने कमरे में घुसना उसकी आदत ही बन गई थी। किन्तु एक दिन तो उसने हद कर दी, घर में सासु जी बीमार पड़ी थी और बहुरानी रसोईघर में जाने की जगह अपनी सहेलियों के साथ घूमने निकल गई। वापसी पर देखा सासु जी की तबीयत अधिक बिगड़ गई थी और डॉक्टर रामेश्वर नाथ जी को कुछ हिदायतें दे रहे थे। डॉक्टर के जाने पर रामेश्वर नाथ जी ने बहु-बेटे और आया मंगला को समझाया कि कावेरी को आराम की बहुत जरूरत है। बहू को जैसे बात पची नहीं। वह बोल पड़ी ‘’पर इनको क्या जरूरत है लगे रहने की, मंगला देख लेगी सब’’। उसकी बात की अनसुनी करते हुए रामेश्वर नाथ जी बोले ‘’आज से रसोई घर बहू संभालेगी’’ सोनाली को लगा जैसे किसी ने उस पर खौलता पानी डाल दिया है। अपने पद के अहंकार में डूबी सोनाली बिफर उठी ‘’मैंने अपने घर में कभी काम नहीं किया। तीन-तीन आया थी मेरे घर में। यह सब मुझसे नहीं होगा।‘’
रामेश्वर नाथ ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी इस लाडली-प्यारी बहु का असली रूप इतना भद्दा है। वह सब तो उसके तन की सुन्दरता को मन की सुन्दरता समझ बैठे थे। सरयु मूक-दर्शक सा खड़ा सब तमाशा देख रहा था। पुत्र की हाजिरी में पिता का अपमान होना बहुत बड़ी बात थी। जिस बेटे से उनकी सारी उम्मीदें बंधी थी, वही बेटा आज एक शब्द भी नहीं बोल पाया।
बीमारी से कावेरी बहुत कमजोर हो गई थी पर घर के सारे माहौल को समझ गई थी। तनाव भरे वातावरण में जीना उसके लिए और मुश्किल हो रहा था। बहु रानी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रही थी। एक दिन उसने सरयु को जाने क्या कहा कि मां का लाडला बेटा, मां से बोल पड़ा, ’’माँ अब हम यहाँ नहीं रह सकते। सोनाली यहाँ रहना नहीं चाहती और मैं उसके बिना नहीं रह सकता।‘’
हैरान परेशान कावेरी ने कहा ‘’पर क्यों, मैंने ऐसी कौन-सी गलती कर दी जिस वजह से तुम लोग मुझे छोड़कर जाना चाहते हो’’ ‘’माँ मुझे बंदिशों में मत बाँधों, मैं वेसे ही बहुत परेशान हूँ। पाँच-छह दिन में चक्कर लगा जाया करूँगा।
कावेरी के कमजोर पैरों से जैसे जमीन ही खिसक गई और आँखों से अविरल धारा बह निकली। आँसू छिपाते हुए बोली ‘’बेटा, जैसी तुम्हारी और सोनाली की मर्जी’’।
वे दोनों आज फिर से वैसे ही अकेले हैं, जैसे तीस बरस पहले थे। कोवेरी कुछ सोचती हुई बुदबुदा रही है ‘’मेरी परवरिश में न जाने कौन सी कमी रह गई, पूरी जिन्दगी सबकी सेवा करती रही, बहू तो चलो दूसरे घर से आई है, लेकिन मेरा सरयु तो दूध का कर्ज़ अदा कर सकता है’’… … ?
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