सितंबर 2026

साहित्यकार, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
(सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान” से सम्मानित, “इंडियन राइटर्स लीग”द्वारा टॉप 200 लेखिकाओं में शामिल)
“ओए, कहाँ है?”
“घर पे!”
“कब आएगा?”
“IDK” (I don’t know)
“चल, शिकंजी पीने चलें।”
“मैं नहीं आ रहा।”
“आ जा, यार!”
“OK”
“Tq” (Thank you)
“अरे, स्कूटी पंक्चर हो गई!”
“LOL” (Laugh out loud)
“यार, तुम लोग मिलोगे, मस्तियाँ करोगे… मुझे तो FOMO (Fear of missing out) हो जाएगा।”
“चिल कर, यार! हम ऋषिकेश जाने का सोच रहे हैं, वहाँ चलना तू!”
“अबे साले… कमीने! ज्ञान भारती मत दे! सुन, कब का प्लान कर रहा है?”
“क्या प्लान करूँ भाई! रोहन के पापा की जॉब चली गई… निशांत के पापा का ऑपरेशन है… अनिरुद्ध की माँ के हाथ में फ्रैक्चर है, तो आजकल वह घर संभाल रहा है… तेरा भी तो CAT का पेपर है… मैं तो यूँ ही मज़ाक कर रहा था बे! हमारे माँ-बाप के प्रति भी तो हमारा फ़र्ज़ बनता है।”
“हाँ, वो तो है यार!”
“अबे, हम सारी मस्तियाँ करते हैं, पर पेरेंट्स सबसे इंपॉर्टेंट हैं। उनके लिए हम सब कुछ त्याग सकते हैं। उनकी परेशानियाँ हमारी परेशानियाँ हैं।”
“हाँ यार, वे हम पर कोई ज़िम्मेदारी भी तो नहीं डालते कि ‘अभी हमारी खेलने-खाने और पढ़ने की उम्र है’। हम भी परवाह नहीं करते और अपनी ही धुन में रहते हैं।”
“अब सुन, ज़्यादा इमोशनल होने की ज़रूरत नहीं… ऐसा कर कि अभी ‘फॉर द टाइम बीइंग’ हम सब अपने-अपने घर की ज़िम्मेदारियाँ लेते हैं। अभी हमारे पेरेंट्स को हमारे सपोर्ट की ज़रूरत है। सुन रहा है ना, साले!”
“हाँ, बे!”
“चल, शिकंजी ही पी लेते हैं। कुछ तो मस्तियाँ कर ही लेंगे। उन तीनों चांडालों को भी बुला ले… चल-चल, चलते हैं जैन शिकंजी…!”
