सितंबर 2026

स्वरांजलि सेवा संस्थान, वाल्मीकि नगर, पश्चिम चंपारण (बिहार)
संस्कार की बात करो ना, चारों तरफ़ छा गई निराशा,
बदला-बदला गाँव-देश अब, कहूँ क्या नई पीढ़ी की भाषा!
नैतिकता का गिरा है स्तर, बड़ों का होता न सम्मान,
नया दौर है, नई सोच है, झूठा जीवन है पहचान।
अब कुएँ के पास नहीं जाना चाहे कोई प्यासा… ॥1॥
बड़े-बुज़ुर्गों से बच्चों ने अब तो बना रखी है दूरी,
अहंकार में नई पीढ़ी, बौद्धिक शिक्षा नहीं ज़रूरी।
आदर्शों की बात करो ना, वक़्त बना है खेल-तमाशा… ॥2॥
माता-पिता जी मॉम-डैड हैं, यह तो घर-घर की है कहानी,
सास की सेवा करती बहू थी, यह बातें हो गईं पुरानी।
कजरी, फगुआ, चैता, होली, कोई न गाए बारहमासा… ॥3॥
रिश्ते-नाते में कड़वाहट, मतलब के हैं यार सभी,
देख के रुपया-पैसा-दौलत, कर लेते हैं प्यार सभी।
दिल में दर्द बहुत डी. आनंद, कौन करेगा इसका खुलासा… ॥4॥
हाय, बाय, हैलो कह करके, अपना काम चलाते हैं,
दो अक्षर अंग्रेज़ी सीखकर, इतराते-इठलाते हैं।
दोस्त, प्रेमिका, पति और पत्नी, एक-दूजे को देते झाँसा… ॥5॥
हाथों में सबके मोबाइल, नए ज़माने का यह ढंग,
अब गिरगिट से ज़्यादा इंसाँ लगा बदलने अपना रंग।
मौज-मस्ती, मौक़ापरस्ती—प्यार-मोहब्बत की परिभाषा… ॥6॥
फटा हुआ कपड़ा है फ़ैशन, आधुनिकता की पहचान,
गाँव की मिट्टी से है नफ़रत, फॉरेन कल्चर लगे महान।
भारत माता की जय बोलो, मत भूलो जी मातृभाषा… ॥7॥
