शब्दों की महिमा

सितंबर 2026

savita syal
सविता स्याल
गुरुग्राम, हरियाणा

प्रस्तावना

शब्द किसी संपदा से कम नहीं होते, इसलिए इस संपदा का सोच-विचार कर ही व्यय करना चाहिए। जो व्यक्ति शब्दों का सार्थक उपयोग जानता है—कब, कहाँ और क्या शब्द बोला जाना चाहिए, यह समझता है—वही व्यक्ति जीवन में सफल होता है।

शब्द केवल शब्द ही नहीं होते, अपितु इनमें मानवीय भावनाओं का रस भी मिला होता है। कभी किसी शब्द में इतनी ताक़त होती है कि वह किसी के दर्द की दवा बन सकता है, तो कभी वही शब्द किसी का दर्द बढ़ा भी सकता है। शब्द न केवल हमारे विचारों को अभिव्यक्त करते हैं, अपितु उन्हें सही दिशा भी देते हैं।

बातचीत अथवा संवाद मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब होते हैं और संवाद का आधार शब्द ही हैं। हमारे पूर्वज कहा करते थे— ‘तलवार की धार से चाहे मनुष्य बच जाए, परंतु शब्दों की धार से वह बच नहीं सकता।’ शब्दों की बेदर्दी और उनकी मार जीवन भर व्यक्ति को परेशान कर सकती है।

कबीरदास जी के इस दोहे के माध्यम से यह बात बखूबी कही गई है—

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥

युवा पीढ़ी और बदलती संवाद शैली

आजकल मोबाइल एवं मॉल-संस्कृति में पल रही युवा पीढ़ी, जिसे ‘जेन जी’ (Gen Z) कहा जाने लगा है, बातचीत का असली महत्व नहीं समझती और न ही खुलकर अपनी भावनाओं को शालीन शब्दों में व्यक्त करती है। वह कहीं न कहीं संवेदनहीनता एवं संक्षिप्तता की ओर बढ़ रही है। उनके मुख के स्थान पर मोबाइल अथवा लैपटॉप पर उनकी उँगलियाँ अधिक सक्रिय होती हैं।

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आज की युवा पीढ़ी ने अपनी ही एक भाषा बना ली है, जिसमें सरसता के स्थान पर संवादों से बचने की सुगमता मिलती है। कूल (Cool), लोल (LOL), ओएमजी (OMG), नो वरीज़ (No worries) जैसे संक्षिप्त शब्द उनकी भाषा का अंग बन चुके हैं। अनेक बार तो वे शब्दों के स्थान पर केवल इमोजीस (Emojis) अथवा स्माइलीज़ (Smilies) का प्रयोग करते नज़र आते हैं। अनेक शब्दों के स्थान पर केवल एक चिह्न का प्रयोग करके वे लंबे-लंबे संवादों से बचने का प्रयास करते हैं।

वे यह भूल जाते हैं कि संवाद दो व्यक्तियों के बीच आत्मीयता बढ़ाते हैं और एक-दूसरे तक अपनी भावनाओं को संप्रेषित करने में एक पुल का कार्य करते हैं। उनकी यह संवादहीनता कहीं न कहीं उन्हें आत्म केंद्रित होने की ओर ले जा रही है।

संस्कृति से दूरी और जीवनशैली के दुष्परिणाम

आज युवा अपने करियर के प्रति बहुत सजग हैं, हमें इस बात पर गर्व भी है, परंतु उनका अपनी संस्कृति से दूर जाने और अत्यधिक आत्म केंद्रित होने का दर्द भी समाज सह रहा है। वे अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं एवं उनकी बिंदास जीवनशैली अनेक बार अमर्यादित व्यवहार का कारण बन रही है। टूटते संयुक्त परिवार, बढ़ते वृद्धाश्रम, तनावपूर्ण जीवन एवं कम उम्र में जीवन की चुनौतियों से घबराकर मौत को गले लगाना—इसके दुष्परिणाम हम अपने आसपास स्पष्ट देखते हैं।

संवाद: जीवन पथ का संबल

  • युवाओं की महत्ता: युवा पीढ़ी देश का भविष्य है, वे देश के कर्णधार हैं। अतः उन्हें संवादों एवं भाषा का महत्व समझाना अति आवश्यक है, जिससे वे खुलकर अपनी बात अपनों से कह सकें।
  • तनाव में कमी: संवाद व्यक्ति को घर-परिवार, मित्रों एवं समाज से जोड़ते हैं। खुलकर अपनी बात किसी अपने से साझा करने से व्यक्ति का मानसिक तनाव कम होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: तनाव कम होने से व्यक्ति दोगुने उत्साह से जीवन-पथ पर आगे बढ़ने एवं अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित होता है।
  • संघर्षों से बचाव: संवाद के माध्यम से व्यक्ति जीवन के संघर्षों से घबराकर आत्महत्या करने जैसे नकारात्मक विचारों से दूर रहता है।
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निष्कर्ष

अतः देश के कर्णधारों, हमारी युवा पीढ़ी—जो हमारे भारत का स्वर्णिम भविष्य है—उनके साथ निरंतर संवादों के माध्यम से संपर्क में रहें। उन्हें प्यार भरे शब्दों के साथ जीवन-पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहें और उन्हें संवादहीनता एवं एकाकीपन से बचाएं।

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