सितंबर 2026

संपादक- हिन्दी-ज्योति
सम्बलपुर, उड़ीसा
प्रस्तावना
भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है। वह मनुष्य की स्मृति, संवेदना, संस्कृति, विचार और सामाजिक अनुभवों की जीवित अभिव्यक्ति है। किसी समाज को समझना हो तो उसकी भाषा को समझना आवश्यक है; क्योंकि भाषा के भीतर उस समाज की मानसिकता, उसकी आकांक्षाएँ, उसके संघर्ष और उसके बदलते जीवन-मूल्य दिखाई देते हैं। इसीलिए, जब किसी पीढ़ी की भाषा बदलती है, तो उसके पीछे केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं होता, उसके साथ सोचने, महसूस करने और संवाद करने के तरीकों में भी परिवर्तन आता है।
आज की नई पीढ़ी जिस भाषा का प्रयोग कर रही है, वह पिछली पीढ़ियों की भाषा से कई दृष्टियों से भिन्न है। उसके शब्द-भंडार में अंग्रेज़ी के शब्दों की बड़ी उपस्थिति है, संवाद में संक्षिप्तता है, अभिव्यक्ति में गति है और डिजिटल माध्यमों ने भाषा के स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा, वेब-सीरीज़, विज्ञापन और वैश्विक संस्कृति ने नई पीढ़ी को अनेक भाषाओं और संस्कृतियों के संपर्क में ला दिया है।
लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि नई पीढ़ी अपनी भाषा से दूर होती जा रही है। अधिक सही बात यह है कि वह भाषा को अपने समय की आवश्यकताओं के अनुरूप नया रूप दे रही है। भाषा का इतिहास बताता है कि वह कभी स्थिर नहीं रहती। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और फिर आधुनिक भारतीय भाषाओं तक की यात्रा इसी निरंतर परिवर्तन की कहानी है। हिंदी भी अनेक भाषाओं, बोलियों और संस्कृतियों के संपर्क से विकसित हुई है।
अतः, नई पीढ़ी की भाषा को केवल “भाषा का पतन” कह देना एकांगी दृष्टिकोण होगा। इसके भीतर नई सृजनात्मक संभावनाएँ भी हैं और कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी। आवश्यकता इस बात की है कि हम इस परिवर्तन को भावनात्मक विरोध के बजाय सामाजिक और भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से समझें।
1. भाषा और पीढ़ी का संबंध
हर पीढ़ी अपने समय की भाषा लेकर आती है। किसी समय साहित्य और सामाजिक जीवन में संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रभाव अधिक रहा, तो किसी दौर में फ़ारसी और अरबी से आए शब्दों ने भारतीय भाषाओं को समृद्ध किया। आधुनिक काल में अंग्रेज़ी ने भारतीय भाषाओं को व्यापक रूप से प्रभावित किया। आज डिजिटल तकनीक ने भाषा में एक नया मोड़ पैदा किया है।
पीढ़ी का अनुभव उसकी भाषा को प्रभावित करता है। जिस पीढ़ी ने रेडियो और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से संसार को जाना, उसकी भाषा में एक प्रकार की औपचारिकता स्वाभाविक थी। टेलीविजन के दौर ने भाषा को अधिक दृश्यात्मक बनाया। इंटरनेट और मोबाइल के दौर ने संवाद को तत्काल और अत्यंत संक्षिप्त कर दिया।
आज की युवा पीढ़ी के लिए संवाद का अर्थ केवल आमने-सामने की बातचीत नहीं है। संदेश, इमोजी, मीम, वीडियो, वॉयस नोट, कमेंट, पोस्ट और छोटे-छोटे डिजिटल उत्तर भी संवाद के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसलिए उसकी भाषा का निर्माण केवल विद्यालय और परिवार में नहीं होता; उसका एक बड़ा हिस्सा डिजिटल संसार में निर्मित हो रहा है।
यहीं से नई पीढ़ी की भाषा का सबसे महत्वपूर्ण गुण सामने आता है—गति।
नई पीढ़ी ऐसी भाषा पसंद करती है जो कम समय में अधिक अर्थ पहुँचा सके। वह लंबे वाक्यों के स्थान पर छोटे वाक्यों को प्राथमिकता देती है। कई बार पूरा विचार एक चित्र, इमोजी या कुछ शब्दों में व्यक्त कर दिया जाता है।
यह परिवर्तन केवल सुविधा का परिणाम नहीं है। यह उस जीवन-शैली का प्रतिबिंब है जिसमें व्यक्ति एक साथ अनेक सूचनाओं और गतिविधियों के बीच रहता है।
2. नई पीढ़ी की भाषा की प्रमुख विशेषताएँ
नई पीढ़ी की भाषा को कुछ प्रमुख विशेषताओं के आधार पर समझा जा सकता है:
(क) संक्षिप्तता
डिजिटल संवाद ने भाषा को संक्षिप्त बनाया है। संदेशों में लंबे वाक्यों की जगह छोटे वाक्य और संक्षिप्त अभिव्यक्तियाँ दिखाई देती हैं।
उदाहरण के लिए:
- ‘क्या कर रहे हो?’ के स्थान पर केवल ‘क्या कर रहे?’ या अंग्रेज़ी के प्रभाव से ‘What’s up?’ जैसे प्रयोग दिखाई देते हैं।
- इसी प्रकार ‘ठीक है’ के स्थान पर ‘OK’, ‘ओके’, ‘K’ आदि का प्रयोग होता है।
यह संक्षिप्तता कभी-कभी भाषा की सहजता बढ़ाती है, लेकिन कई बार विचारों की गहराई को भी सीमित कर देती है।
(ख) हिंदी-अंग्रेज़ी का मिश्रण
नई पीढ़ी की भाषा की सबसे स्पष्ट विशेषताओं में से एक है हिंदी और अंग्रेज़ी का मिश्रण। इसे सामान्यतः “हिंग्लिश” कहा जाता है।
जैसे:
- ‘आज मेरा मूड ऑफ है।’
- ‘तुमने असाइनमेंट सबमिट किया?’
- ‘कल मीटिंग है।’
- ‘यह आइडिया बहुत अच्छा है।’
- ‘आज का दिन बहुत स्ट्रेसफुल था।’
इन वाक्यों में अंग्रेज़ी के शब्द हिंदी वाक्य-विन्यास में सहज रूप से आ गए हैं।
इस मिश्रण को केवल भाषा की कमजोरी मानना उचित नहीं है। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से भाषाओं के बीच संपर्क के कारण शब्दों का आदान-प्रदान एक सामान्य प्रक्रिया है। हिंदी ने सदियों से दूसरी भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति अपनी मातृभाषा या हिंदी में उपलब्ध सहज शब्दों को जानता ही नहीं और हर विचार के लिए अनावश्यक रूप से विदेशी शब्दों पर निर्भर हो जाता है।
3. सोशल मीडिया और भाषा का नया संसार
नई पीढ़ी की भाषा को समझने के लिए सोशल मीडिया की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सऐप और अन्य डिजिटल मंचों ने भाषा के प्रयोग को व्यापक रूप से बदल दिया है।
सोशल मीडिया पर भाषा का उद्देश्य कई बार साहित्यिक सौंदर्य या व्याकरणिक शुद्धता नहीं, बल्कि तत्काल प्रभाव पैदा करना होता है। कोई बात कितनी जल्दी समझ में आती है, कितनी आकर्षक है और कितनी आसानी से साझा की जा सकती है—यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी कारण सोशल मीडिया की भाषा में कुछ नए रूप विकसित हुए हैं:
- छोटे वाक्य
- संक्षिप्त शब्द
- रोमन लिपि में भारतीय भाषाएँ
- इमोजी और हैशटैग
- मीम संस्कृति व वायरल शब्दावली
- ध्वन्यात्मक वर्तनी
- अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं का मिश्रण
उदाहरण के लिए, हिंदी-भाषी युवा अक्सर हिंदी को देवनागरी के बजाय रोमन लिपि में लिखते हैं:
- Aap kahan ho?
- Kal milte hain.
- Mujhe bahut achha laga.
यहाँ भाषा हिंदी है, लेकिन लिपि रोमन है।
इस प्रवृत्ति को केवल लिपि के संकट के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। डिजिटल माध्यमों में सुविधा और गति इसका बड़ा कारण है। फिर भी यह प्रश्न विचारणीय है कि यदि नई पीढ़ी लंबे समय तक अपनी भाषा को उसकी मूल लिपि में पढ़ती-लिखती नहीं है, तो भविष्य में उसके साहित्यिक और भाषिक संस्कारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
4. इमोजी और चित्रों की भाषा
नई पीढ़ी के संवाद में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है—शब्दों के साथ चित्रों का बढ़ता प्रयोग। एक मुस्कुराता हुआ चेहरा, आँसू, हृदय, हाथ जोड़ने का संकेत या अंगूठा दिखाने वाला चिह्न कई बार पूरे वाक्य का काम कर देता है।
- ‘धन्यवाद’ के साथ 🙏
- ‘बहुत खुशी हुई’ के साथ 😊
- ‘मैं हँस रहा हूँ’ के स्थान पर 😂
जैसे संकेत भावों को तत्काल व्यक्त कर देते हैं।
यह भाषा का एक नया दृश्यात्मक आयाम है। मनुष्य ने सदियों से चित्रों और संकेतों के माध्यम से संवाद किया है। आधुनिक इमोजी उसी मानवीय आवश्यकता का डिजिटल रूप माने जा सकते हैं।
लेकिन भावों की जटिलता केवल संकेतों से व्यक्त नहीं की जा सकती। प्रेम, पीड़ा, अपराध-बोध, अकेलापन, असहमति, करुणा या आत्मसंघर्ष जैसे गहरे अनुभवों के लिए शब्दों की आवश्यकता बनी रहेगी।
इसलिए इमोजी शब्दों के विकल्प नहीं, बल्कि उनके सहयोगी हैं।
5. नई पीढ़ी और अंग्रेज़ी का प्रभाव
आज की शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और रोज़गार की दुनिया में अंग्रेज़ी का प्रभाव व्यापक है। नई पीढ़ी के सामने अंग्रेज़ी केवल एक विदेशी भाषा नहीं, बल्कि वैश्विक अवसरों की भाषा के रूप में उपस्थित है।
इसी कारण युवा बातचीत में अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग सहज रूप से करते हैं।
‘करियर’, ‘प्रोजेक्ट’, ‘फीडबैक’, ‘कंटेंट’, ‘स्किल’, ‘ट्रेनिंग’, ‘ऑनलाइन’, ‘डाउनलोड’, ‘अपडेट’, ‘फॉलो’, ‘पोस्ट’ आदि शब्द अब भारतीय भाषाओं के सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन चुके हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या इससे हिंदी कमजोर हो रही है?
उत्तर इतना सरल नहीं है।
किसी भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों का प्रवेश अपने आप में उसके कमजोर होने का प्रमाण नहीं है। भाषा की शक्ति इस बात में है कि वह नए अनुभवों के लिए नए शब्द ग्रहण और विकसित कर सके।
हिंदी का वास्तविक संकट अंग्रेज़ी के शब्दों से नहीं, बल्कि हिंदी में विचार करने और अभिव्यक्त होने की क्षमता के कमजोर पड़ने से पैदा होगा।
यदि कोई युवा अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में सहजता से विचार कर सकता है, तो यह भाषिक संपन्नता है। लेकिन यदि वह अपनी ही भाषा में सरल विचार व्यक्त करने में असमर्थ हो जाए, तो यह चिंता का विषय है।
6. नई पीढ़ी की भाषा और भारतीय भाषाएँ
भारत एक बहुभाषी देश है। यहाँ भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी आधार है।
नई पीढ़ी का भाषिक व्यवहार इस बहुभाषी संस्कृति को एक नया रूप दे रहा है। एक युवा घर में अपनी मातृभाषा बोल सकता है, विद्यालय में हिंदी या अंग्रेज़ी का प्रयोग कर सकता है और इंटरनेट पर कई भाषाओं के मिश्रित रूप से संवाद कर सकता है।
यह बहुभाषिक क्षमता भारत की बड़ी शक्ति है।
ओडिशा में रहने वाला कोई युवा ओड़िया, हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग अलग-अलग परिस्थितियों में कर सकता है। इसी प्रकार बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु या असम का युवा अपनी मातृभाषा के साथ हिंदी और अंग्रेज़ी से भी जुड़ सकता है।
इस प्रकार नई पीढ़ी की भाषा एक प्रकार का बहुभाषिक सेतु बन रही है।
फिर भी इसके साथ एक सावधानी आवश्यक है। वैश्विक भाषा के प्रभाव में स्थानीय भाषाओं और बोलियों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। किसी बोली को ‘गाँव की भाषा’ या ‘कम प्रतिष्ठित भाषा’ समझना भाषिक दृष्टि से अनुचित है। प्रत्येक भाषा और बोली अपने समाज की स्मृति और अनुभव को संजोती है।
7. नई पीढ़ी की भाषा और साहित्य
भाषा में परिवर्तन का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ता है। आज कविता, कहानी और उपन्यास केवल मुद्रित पुस्तकों तक सीमित नहीं हैं। डिजिटल मंचों ने नए लेखकों को सीधे पाठकों तक पहुँचने का अवसर दिया है।
सोशल मीडिया पर लिखी जाने वाली छोटी कविताएँ, लघुकथाएँ, सूक्तियाँ और व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित लेखन ने साहित्य के पाठक-वर्ग को विस्तृत किया है।
नई पीढ़ी का साहित्य कई बार बहुत सीधे ढंग से अपनी बात कहता है। वह अलंकारों की लंबी यात्रा के बजाय अनुभव की सीधी अभिव्यक्ति को प्राथमिकता देता है।
- उसे प्रेम चाहिए तो वह सीधे प्रेम की बात करता है।
- उसे अकेलापन है तो वह अकेलेपन को बिना किसी जटिल प्रतीक के सामने रख देता है।
- उसे व्यवस्था से शिकायत है तो वह उसे सीधे शब्दों में व्यक्त करता है।
इसमें साहित्यिक सौंदर्य की अपनी सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन इसमें एक विशेष प्रकार की ईमानदारी भी दिखाई देती है।
दूसरी ओर, तेज़ी से लिखने और तुरंत प्रकाशित करने की संस्कृति ने भाषा-संपादन की परंपरा को कमजोर किया है। कई बार लेखन बिना संशोधन और बिना भाषिक अनुशासन के प्रकाशित हो जाता है।
इसलिए नई पीढ़ी के लेखन को दिशा देने के लिए भाषा-संस्कार और साहित्यिक अध्ययन दोनों आवश्यक हैं।
8. नई पीढ़ी की भाषा में व्याकरण का प्रश्न
भाषा परिवर्तन के साथ व्याकरण भी प्रभावित होता है। सोशल मीडिया पर विराम-चिह्नों, मात्राओं, वर्तनी और वाक्य-विन्यास की उपेक्षा सामान्य हो गई है।
कई बार पूरा संदेश बिना पूर्ण विराम के लिखा जाता है। मात्राएँ छूट जाती हैं और रोमन लिपि में लिखते समय हिंदी के उच्चारण को अंग्रेज़ी अक्षरों से व्यक्त किया जाता है।
उदाहरण:
- mujhe nahi pata
- aap kaha ho
- bahut acha laga
यह डिजिटल संवाद में सहज हो सकता है, लेकिन यही आदत औपचारिक लेखन में आ जाए तो समस्या उत्पन्न होती है।
विद्यालय और विश्वविद्यालय के स्तर पर इसलिए यह आवश्यक है कि विद्यार्थियों को यह समझाया जाए कि भाषा का प्रत्येक रूप अपने संदर्भ में उपयुक्त होता है।
मित्र को भेजे गए संदेश और शोध-प्रबंध की भाषा एक जैसी नहीं हो सकती।
सोशल मीडिया पोस्ट और साहित्यिक निबंध के भाषिक मानदंड अलग होंगे।
भाषा की स्वतंत्रता का अर्थ भाषिक अनुशासन की समाप्ति नहीं है।
9. नई पीढ़ी की भाषा: संकट या संभावना?
नई पीढ़ी की भाषा को लेकर अक्सर चिंता व्यक्त की जाती है कि युवा शुद्ध हिंदी नहीं जानते, अंग्रेज़ी का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, वर्तनी की गलतियाँ करते हैं और साहित्य से दूर हो रहे हैं।
इन चिंताओं में कुछ सत्य अवश्य है, लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी है।
नई पीढ़ी ने भाषा को एक नया विस्तार भी दिया है। आज कोई युवा भारत के किसी छोटे शहर में बैठकर दुनिया के किसी भी हिस्से के व्यक्ति से संवाद कर सकता है। वह अनेक भाषाओं के शब्द सीख सकता है, विदेशी साहित्य पढ़ सकता है और अपनी मातृभाषा में दुनिया के सामने अपनी बात रख सकता है।
डिजिटल माध्यम ने भाषाओं के बीच संवाद को पहले की तुलना में बहुत आसान बना दिया है।
इसलिए, नई पीढ़ी की भाषा को संकट की दृष्टि से देखने के बजाय उसे परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि नई पीढ़ी पुरानी भाषा क्यों नहीं बोलती।
सवाल यह होना चाहिए कि नई पीढ़ी अपनी भाषा की मूल संवेदना को बचाते हुए नए समय की आवश्यकताओं को कैसे स्वीकार करे।
10. परिवार और भाषा-संस्कार
भाषा का पहला विद्यालय परिवार है। बच्चे शब्दकोश से भाषा नहीं सीखते; वे अपने आसपास के लोगों से भाषा ग्रहण करते हैं।
यदि घर में मातृभाषा या हिंदी के प्रति सम्मान होगा, तो बच्चे के भीतर भी भाषा के प्रति स्वाभाविक आत्मीयता विकसित होगी।
माता-पिता यदि बच्चों से केवल आदेशात्मक भाषा में बात करेंगे, तो भाषा उनके लिए केवल व्यवहार का माध्यम रह जाएगी। लेकिन यदि वे कहानियाँ सुनाएँगे, कविताएँ पढ़ेंगे, लोकगीतों से परिचित कराएँगे और बातचीत में सुंदर शब्दों का प्रयोग करेंगे, तो बच्चे के भाषिक संसार का विस्तार होगा।
विशेष रूप से दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनके पास लोकभाषा, लोककथाओं, कहावतों और जीवनानुभवों का विशाल भंडार होता है।
नई पीढ़ी को इनसे जोड़ना केवल भाषा बचाना नहीं है; यह पीढ़ियों के बीच संवाद बनाए रखना भी है।
11. शिक्षा व्यवस्था की भूमिका
नई पीढ़ी की भाषा को दिशा देने में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विद्यालयों में भाषा को केवल परीक्षा का विषय मानने के बजाय जीवन और अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जाना चाहिए।
बच्चों को केवल व्याकरण के नियम याद कराने से भाषा-प्रेम पैदा नहीं होता। उन्हें कहानी पढ़ने, कविता सुनने, संवाद करने, लेख लिखने और अपने अनुभव व्यक्त करने के अवसर देने होंगे।
शिक्षा में भारतीय भाषाओं और मातृभाषाओं के प्रति सम्मान बढ़ाना आवश्यक है। साथ ही अंग्रेज़ी और अन्य वैश्विक भाषाओं के ज्ञान को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

भाषाओं के बीच संघर्ष खड़ा करने के बजाय बहुभाषिकता को शक्ति के रूप में देखना अधिक उपयोगी होगा।
नई पीढ़ी को यह संदेश दिया जाना चाहिए कि अंग्रेज़ी सीखना अपनी भाषा छोड़ना नहीं है और हिंदी या मातृभाषा से प्रेम करना अंग्रेज़ी का विरोध करना नहीं है।
12. डिजिटल युग में हिंदी का भविष्य
डिजिटल युग हिंदी के लिए केवल चुनौती नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर भी है।
आज हिंदी में ब्लॉग, वेबसाइट, डिजिटल पुस्तकें, ऑनलाइन समाचार, वीडियो, पॉडकास्ट, ई-पुस्तकें और शैक्षिक सामग्री उपलब्ध हैं। इससे हिंदी का पाठक-वर्ग भी बदल रहा है।
अब हिंदी केवल पुस्तकालय की भाषा नहीं रही, वह मोबाइल की स्क्रीन पर भी जीवित है।
आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन अनुवाद, वाक्-पहचान (Speech Recognition) और डिजिटल प्रकाशन जैसी तकनीकें भारतीय भाषाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन तकनीक भाषा की आत्मा नहीं बना सकती। वह शब्द उपलब्ध करा सकती है, अनुवाद कर सकती है और लेखन में सहायता दे सकती है; किंतु भाषा की सांस्कृतिक स्मृति मनुष्य ही निर्मित करता है।
इसलिए, भविष्य की हिंदी को तकनीक-विरोधी होने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है कि तकनीक को हिंदी और भारतीय भाषाओं के विकास का साधन बनाया जाए।
13. नई पीढ़ी से क्या अपेक्षा?
नई पीढ़ी से यह अपेक्षा करना कि वह बिल्कुल उसी भाषा में बोले जो पिछली पीढ़ी बोलती थी, व्यावहारिक नहीं है। हर पीढ़ी अपनी भाषा बनाती है।
लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें किसी भी पीढ़ी को नहीं छोड़ना चाहिए:
- अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान।
- अपनी भाषा में गंभीर और स्पष्ट विचार व्यक्त करने की क्षमता।
- पढ़ने की आदत।
- शब्दों के अर्थ और उनके संदर्भ को समझने की संवेदनशीलता।
- डिजिटल भाषा और औपचारिक भाषा के अंतर की समझ।
- स्थानीय भाषाओं और बोलियों के प्रति सम्मान।
और सबसे महत्वपूर्ण—भाषा को केवल रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदना का माध्यम समझना।
उपसंहार
नई पीढ़ी की भाषा को देखकर घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे लेकर उदासीन रहने का भी कोई कारण नहीं है। भाषा परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जो भाषा बदलती नहीं, वह धीरे-धीरे जीवन से कट जाती है। किंतु परिवर्तन का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना भी नहीं है।
आज की युवा पीढ़ी जिस भाषा का निर्माण कर रही है, उसमें हिंदी है, अंग्रेज़ी है, भारतीय भाषाएँ हैं, स्थानीय बोलियाँ हैं और डिजिटल संस्कृति भी है। उसमें गति है, संक्षिप्तता है, प्रयोगधर्मिता है और कभी-कभी असावधानी भी है।
यह भाषा अभी निर्माण की अवस्था में है।
शायद आने वाले वर्षों में आज के अनेक ‘नए’ शब्द सामान्य हिंदी का हिस्सा बन जाएँगे और कुछ शब्द समय के साथ गायब भी हो जाएँगे। यही भाषा का स्वभाव है।
हमें नई पीढ़ी को भाषा की शुद्धता के नाम पर डराने के बजाय उसकी भाषिक चेतना को समृद्ध करना चाहिए। उसे यह समझाना चाहिए कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि सोचने और मनुष्य बने रहने की प्रक्रिया भी है।
यदि नई पीढ़ी नई तकनीक के साथ अपनी भाषा की संवेदना, साहित्य की परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति को जोड़ सके, तो उसकी भाषा न तो पुरानी भाषा की प्रतिकृति होगी और न ही विदेशी प्रभाव की छाया। वह अपने समय की एक ऐसी जीवंत भाषा होगी, जिसमें अतीत की स्मृति, वर्तमान की बेचैनी और भविष्य की संभावनाएँ एक साथ बोलेंगी।
अंततः, भाषा किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं होती। हर पीढ़ी उसे विरासत में पाती है, अपने अनुभवों से बदलती है और अगली पीढ़ी को सौंप देती है। नई पीढ़ी भी यही कर रही है। उसके हाथों में भाषा का भविष्य है—और यह भविष्य तभी सुंदर होगा, जब आधुनिकता के साथ अपनी भाषिक जड़ों का संबंध भी बना रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं स्रोत :
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