शब्दों का बदलता मिज़ाज – रिश्तों की खोती मिठास

सितंबर 2026

yashodhara bhatnagar
यशोधरा भटनागर
अलकापुरी, देवास (मध्य प्रदेश)


भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, मनुष्य के भीतर से दूसरे मनुष्य तक जाने वाली वह महीन डोर है, जिसमें समय, संस्कार, स्मृतियाँ और संबंध एक साथ बँधे रहते हैं। किसी समाज की भाषा को सुनकर उसके समय की धड़कन पहचानी जा सकती है। शब्द बदलते हैं तो केवल शब्द नहीं बदलते, उनके साथ हमारे व्यवहार, हमारी निकटताएँ और कभी-कभी हमारी संवेदनाएँ भी अपना रूप बदल लेती हैं।

आज जब हम नई पीढ़ी की भाषा की बात करते हैं, तो चर्चा केवल ‘हाय’, ‘हेलो’, ‘ओके’, ‘कूल’, ‘ब्रो’ या डिजिटल संक्षिप्तियों तक सीमित नहीं रह सकती। इस भाषा का एक दूसरा, अधिक चिंताजनक पक्ष भी है—वह है बातचीत में बढ़ती बेलाग अशिष्टता, गाली-गलौज और अपशब्दों का सहज इस्तेमाल।

लेकिन इसे केवल ‘आज के बच्चों के संस्कार खराब हैं’ कहकर समझ लेना समस्या को बहुत छोटा कर देना होगा।

एक समय था जब मोहल्ला एक परिवार था और मोहल्ले की अपनी एक लोकभाषा हुआ करती थी। वह किसी व्याकरण की पुस्तक में नहीं मिलती थी, फिर भी उसमें जीवन का पूरा व्याकरण समाया था।

पड़ोस की चाची, गली के काका, सामने वाले घर की दादी, दूध वाले भैया, डाकिया चाचा… रक्त-संबंध न होते हुए भी भाषा ने सबको रिश्तों में बाँध रखा था। किसी के घर से पकवान निकला तो कटोरी पड़ोस में पहुँची। किसी के यहाँ कोई दुख-परेशानी आई तो अगले दरवाज़े से आवाज़ आती—“कुछ चाहिए तो बताना।” किसी बुज़ुर्ग को देखते ही बच्चे का स्वर अपने आप नीचे हो जाता।

‘आप’, ‘आइए’, ‘बैठिए’, ‘खाइए’, ‘कैसे हैं?’… ये केवल शब्द नहीं थे, बल्कि ये दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने के संस्कार थे।

मोहल्ले की भाषा में एक सहज माधुर्य था। उसमें आत्मीयता थी, पर आत्मीयता की भी एक मर्यादा थी। मज़ाक था, मगर अपमान नहीं। असहमति थी, मगर संबोधन में सम्मान बचा रहता था।

आज मोहल्ले सिकुड़कर अपार्टमेंट हो गए हैं और चौपालें स्क्रीन पर चली गई हैं। पड़ोसी का चेहरा कई बार वर्षों तक दिखाई नहीं देता, जबकि दूर देश में रहने वाला कोई डिजिटल मित्र प्रतिदिन बातचीत का हिस्सा बना रहता है। भाषा भी उसी के साथ बदल गई है।

नई पीढ़ी और बेलाग भाषा

आज युवाओं की बातचीत में अपशब्दों का इस्तेमाल कई संदर्भों में सामान्य होता दिखाई देता है। मित्रों के बीच मज़ाक, खेल, ऑनलाइन बातचीत, सोशल मीडिया टिप्पणियों और मनोरंजन सामग्री में सुनाई देने वाली भाषा कई बार वास्तविक जीवन की बातचीत में भी उतर आती है।

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शोध यह संकेत देते हैं कि युवाओं में अपशब्दों का प्रयोग केवल ‘बदतमीज़ी’ का परिणाम नहीं होता। कभी यह भावनाओं को तीव्रता से व्यक्त करने, कभी समूह में स्वीकार्यता पाने और कभी अपनी बात को अधिक प्रभावशाली बनाने का माध्यम बन जाता है। सोशल मीडिया ने युवाओं को अपनी बात खुलकर रखने के बहुत अधिक अवसर दिए हैं और इसके साथ अशिष्ट भाषा की दृश्यता भी बढ़ी है। यानी समस्या केवल शब्दों की नहीं, शब्दों के सामान्य हो जाने की है।

जब किसी शब्द को बार-बार सुना जाता है, तो उसका चौंकाने वाला प्रभाव कम होने लगता है। जो कल असभ्य माना जाता था, वह आज मज़ाक का हिस्सा बन जाता है। और जो मज़ाक में कहा गया था, वह धीरे-धीरे रोज़मर्रा की भाषा में प्रवेश कर जाता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा।

हर अपशब्द हिंसा नहीं है और हर अपशब्द किसी व्यक्ति को अपमानित करने के लिए नहीं बोला जाता। भाषा-विज्ञान और मनोविज्ञान के अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि लोग कभी-कभी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल भावनात्मक तीव्रता, तनाव या आश्चर्य व्यक्त करने के लिए करते हैं।

लेकिन किसी की गरिमा को चोट पहुँचाने वाली गाली और मित्रों के बीच भावनात्मक विस्मय व्यक्त करने वाला अपशब्द एक ही बात नहीं हैं।

यहीं भाषा की नैतिकता का प्रश्न खड़ा होता है। आखिर यह भाषा आई कहाँ से? इस बदलाव के पीछे कई परतें हैं।

भाषा-बदलाव की मुख्य परतें

  • डिजिटल दुनिया: सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग, छोटे वीडियो और मीम संस्कृति में तीखी, उत्तेजक और चौंकाने वाली भाषा अक्सर मनोरंजन का हिस्सा बन जाती है। शोध में भी साथियों, मीडिया और सोशल नेटवर्क को युवाओं की अशिष्ट भाषा के महत्वपूर्ण सामाजिक स्रोतों में गिना गया है।
  • साथियों का प्रभाव: किशोरावस्था में समूह से जुड़ना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। कोई शब्द मित्र-मंडली में सामान्य है, तो उसे न बोलना कई बार ‘अलग’ दिखाई देना हो सकता है। इसलिए युवा भाषा केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, समूह की पहचान भी बन जाती है। किशोरों के बीच गाली-गलौज को व्यापक ‘पीयर कल्चर’ का हिस्सा मानने वाले अध्ययन भी सामने आए हैं।
  • घर की भाषा: हम अक्सर बच्चों की भाषा पर उँगली उठाते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि भाषा सीखने की पहली पाठशाला घर है। बच्चे केवल उपदेश नहीं सुनते, वे देखकर और सुनकर भाषा ग्रहण करते हैं। यदि घर में क्रोध का पहला उत्तर गाली है, तो बच्चे के लिए गाली केवल निषिद्ध शब्द नहीं रह जाती; वह क्रोध व्यक्त करने का सीखा हुआ तरीका बन सकती है।
  • ध्यान खींचने की संस्कृति: डिजिटल संसार में जो बात चौंकाती है, वह अधिक दिखाई देती है। बेलाग भाषा कई बार ‘कूल’, ‘बोल्ड’ या ‘बेबाक’ दिखने का माध्यम बन जाती है। कुछ युवा जान-बूझकर ऐसी भाषा चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि शालीन भाषा बहुत साधारण है, जबकि तीखा शब्द उन्हें अधिक प्रभावशाली बनाएगा।
  • संवाद का घटता धैर्य: जब बातचीत छोटी होती जाती है, तो भाव व्यक्त करने के लिए शब्दों की जगह तीव्र शब्द लेने लगते हैं। कभी विस्तृत वाक्य में जो बात कही जाती थी, वह अब एक शब्द, एक इमोजी या एक तीखी प्रतिक्रिया में समाप्त हो जाती है।
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क्या केवल नई पीढ़ी को दोष देना पर्याप्त है?

इन समस्त कारणों को जानने के बाद विकृत होती भाषा के लिए क्या नई पीढ़ी को दोष देना पर्याप्त है?

नहीं, क्योंकि भाषा का यह परिवर्तन केवल युवाओं ने पैदा नहीं किया है। उन्हें यह भाषा समाज ने दी है।

घर, स्कूल, मनोरंजन, इंटरनेट, विज्ञापन, सार्वजनिक बातचीत—हर जगह से भाषा उनके पास पहुँचती है। इसलिए नई पीढ़ी को केवल ‘अपशब्द बोलने वाली पीढ़ी’ कह देना वैसा ही है जैसे आईने पर धूल देखकर चेहरे को दोष देना।

हमें यह भी देखना होगा कि आज बच्चे और युवा भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कितने सुरक्षित संवाद-स्थल पा रहे हैं। यदि उन्हें क्रोध, असहमति, निराशा और चोट के लिए संवेदनशील शब्द नहीं मिलेंगे, तो वे वही शब्द उठाएँगे जो सबसे आसानी से उपलब्ध हैं।

इसलिए भाषा-सुधार का रास्ता केवल ‘गाली मत दो’ कहने से नहीं निकलेगा। उन्हें विकल्प देने होंगे:

  • क्रोध में कहना—“मुझे यह बात बहुत बुरी लगी।”
  • असहमति में कहना—“मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ।”
  • चोट लगने पर कहना—“तुम्हारी बात से मुझे दुख हुआ।”
  • मज़ाक की सीमा पार होने पर कहना—“ऐसा मज़ाक ठीक नहीं है।”

ये वाक्य शायद गाली जितने छोटे और उत्तेजक न हों, मगर इनमें मनुष्यता बची रहती है।

भाषा में फिर लौटे ‘आप’

हमें पुरानी भाषा को हूबहू वापस लाने की आवश्यकता नहीं है। समय पीछे नहीं चलता। नई पीढ़ी की अपनी भाषा होगी, अपने मुहावरे होंगे, अपनी गति होगी। आवश्यकता केवल इतनी है कि आधुनिकता के साथ माधुर्य भी रहे और बेबाकी के साथ मर्यादा भी।

  • ‘हाय’ और ‘नमस्ते’ में कोई युद्ध नहीं है।
  • ‘थैंक्यू’ और ‘धन्यवाद’ एक-दूसरे के शत्रु नहीं हैं।
  • ‘टेक केयर’ और ‘अपना ध्यान रखना’ दोनों में स्नेह हो सकता है।
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प्रश्न शब्द का नहीं, उसके पीछे खड़े मन का है।

हमें नई पीढ़ी से यह नहीं कहना कि तुम्हारी भाषा गलत है। हमें उससे कहना चाहिए कि तुम्हारे पास भाषा की जितनी शक्ति है, उसका इस्तेमाल किसी को छोटा करने के लिए मत करो। क्योंकि शब्दों में अद्भुत शक्ति होती है। वे किसी के भीतर वर्षों तक फूल खिला सकते हैं और एक क्षण में कोई पुराना घाव भी खोल सकते हैं।

कभी मोहल्ले की गली में कोई बुज़ुर्ग आवाज़ देता था—“बेटा, ज़रा इधर आना।”

आज स्क्रीन पर कोई लिखता है—“भाई, कहाँ है आजकल?”

दोनों में समय का अंतर है, लेकिन अपनापन हो तो दूरी नहीं।

हमें बस यह सुनिश्चित करना है कि आने वाली पीढ़ी की भाषा में तकनीक की चमक जितनी भी हो, मनुष्यता की गर्मी उससे अधिक हो।

शब्द बदलें, संबोधन बदल जाएँ, भाषा की चाल बदल जाए—यह स्वाभाविक है। मगर भाषा से यदि सम्मान चला गया, तो रिश्तों के घर में सबसे पहले दरवाज़े बंद होंगे।

और तब शायद हमें बहुत देर से याद आएगा कि मोहल्ले की वह सहज भाषा कितनी बड़ी संपत्ति थी, जहाँ गाली से पहले नाम लिया जाता था, असहमति से पहले रिश्ता बचाया जाता था और विदा होते समय कहा जाता था—“आते रहना।”

शायद नई पीढ़ी की भाषा को बचाने का सबसे सुंदर रास्ता यही है कि हम उसे शब्दों की शुद्धता से अधिक संवाद की शालीनता सिखाएँ। क्योंकि भाषा का भविष्य शब्दकोश तय नहीं करता, उसे मनुष्य का व्यवहार लिखता है।

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