रात-रात भर नींद गँवाई,
सपनों की तलाश में,
सपने खोजते आ पहुँचा मैं,
सपनों के बाज़ार में।
लाख-लाख में डिग्री ख़रीदी,
हर डिग्री में सपने थे,
सपने में थी सुकून की नींदें,
पर सपने कब अपने थे?
नींद गँवा कर सपने ख़रीदे,
जवानी बिकी उधार में,
नींद खुली तो देखा कैसे,
बिक गया मैं बाज़ार में!
सपने मिले तो मैं खोया था,
जाने किस व्यापार में,
“ले लो सपने, दे दो नींदें…”
फिर पहुँचा बाज़ार में!
बबीता झा
24 मार्च, 2024
