अपने और गैरों का भेद

सितंबर 2026

जनार्दन मिश्र
नई दिल्ली

दुनिया में ऐसे कई लोग हैं,
जो साथ में रहते हुए भी
अपना दुःख एक-दूसरे से
नहीं कह सकते।
यदि कभी कहें भी,
तो दूसरा सुनने को राज़ी नहीं;
सुनकर भी अनसुना कर दे…
हद तो तब हो जाती है,
जब सुनकर मज़ाक उड़ाने लगे!
ऐसे लोग अपनी ज़िंदगी में
ऐसे रहते हैं,
जैसे दो दीवारों की पीठ
जुड़ी होती है एक-दूसरे से।


पर ऐसे में जो लोग,
दुनियावी नज़र में
ग़ैर लोगों को भी
अपना मानकर चलते हैं,
वे उबड़-खाबड़ रास्ते पर भी
हँसते-हँसते चलते रहते हैं।
और जो सदा अपनों में ही उलझे रहते हैं,
वे सीधे-सपाट रास्ते पर भी
बिना ठोकर लगे ही
लुढ़क जाते हैं।
यक़ीनन!
ख़ुशी-ख़ुशी जीने के लिए
ज़िंदगी का दायरा
इतना विस्तृत कर लें
कि अपने और ग़ैरों का
भेद ही मिट जाए।

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