
हिंदी की गौरव गाथा
कोई साधारण कथा नहीं है,
यह उस मिट्टी की महागूँज है
जिसने हमें जन्म दिया,
और शब्दों की छाया में
पलना सिखाया है,
चलना सिखाया है।
यह भाषा
राज-सिंहासनों की देन नहीं,
यह जन-जन की साधना है।
यह खेतों की मेड़ों पर उगी,
चौपालों में पली,
और माँ की लोरी बनकर
हमारे रक्त में उतर गई। जब-जब अन्याय बढ़ा,इसने स्वर उठाया —
कबीर के दोहों में ज्वाला बनी,
तुलसीदास की चौपाइयों में श्रद्धा बनी,
रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों में
कठोर वज्र-सी हुंकार बनी।
यह वही हिंदी है
जिसने क्रांति की मशाल जलाई,
जिसने आज़ादी के स्वप्न को
शब्दों से साहस दिया।
यह केवल भाषा नहीं,
यह राष्ट्र का स्पन्दन है,
जीवन-धारा है।
इसमें लोक-गीत की मधुरिमा है, इसमें गंगा-सी पावन धारा है,
इसमें वह करुणा है
जो टूटे हृदय को भी
आशा का आलोक देती है।
हिंदी की गौरव गाथा पुरस्कारों की मोहताज नहीं —
यह उस किसान की
खून-पसीने और मुस्कान में है
जो अपनी मिट्टी को
“माँ” कहता है।
यह उस माँ की आँखों में है
जो अपने बच्चे को
पहला अक्षर सिखाते समय
स्वर्ग-सा गर्व महसूस करती है
और मैं —इस विराट परंपरा के समक्ष
एक कोमल स्वर,
एक विनम्र साधक,
एक अंध-अनुगामी।
मैं घोषणा नहीं करता,
मैं प्रण करता हूँ —
कि हिंदी की इस गाथा को
जीवन की अंतिम साँस तक
वक्ष से चिपका रखूंगा ,
प्यार करुंगा व यथोचित
सम्मान दूँगा।
जब मेरी लेखनी चले,तो उसमें हिंदी की गरिमा बहे।
जब मेरी वाणी महके
तो उसमें जन-मन की धड़कन हो। हिंदी की गौरव गाथा
युगों से बहती रही है,
और बहती रहेगी —
जब तक इस धरती पर
एक भी हृदय
अपनी मातृ-भाषा से प्रेम करेगा ; यही मेरा विश्वास है , यही मेरा अभिमान है ;
यही मेरी हिंदी है …..।
