भँवर जाल

जून, 2026

डॉ. प्रवीण शर्मा
डॉ. प्रवीण शर्मा
रिटायर्ड प्रिंसिपल, शिक्षाविद, गुरुग्राम, हरियाणा

देखो क्या क्या बदल गया,
और देखो क्या बदल रहा।
संवेदना हुई रेत,
सहृदयता हो गई ढेर।
देखो कैसे बदली!
अच्छे बुरे की परिभाषा।
देखो कैसा समय आया?
सबने भुला दिए संस्कार।
देखो मानव मन भी बना!
निरा मरुस्थल।
मानवता भी नज़र नहीं,
आती है।
माया के बाज़ार में,
देखो गुम हुई मर्यादा!
मूल्य, ममता दम तोड़ रहे,
बंद किताबों में।
कैसे मिटा?
देखो सब!
अनजाने में, अनचाहे में।
देखो डरे डरे हैं!
मात-पिता।
सहमे सहमे सब, गुरूवर।
गिरफ्त हो गई,
देखो ढीली!
अनदेखे में, अनबोले में।
मिट्टी में दबी किताबें,
देखो कैसे!
झाँक रही,
अलमारी से।
ग़ायब हुई सभ्यता,
बदल गए हालात।
देखो कैसे!
बदली आज ज़रूरत है।
ऐसे उलझे,
भँवर जाल में।
कैसे निकलें?
भँवर जाल से।
*****

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