स्त्री होने का गर्व

जून, 2026

पूजा अग्निहोत्री
पूजा अग्निहोत्री
अनूपपुर, मध्य प्रदेश

(कवयत्री परिचय: साझा काव्य संकलनों के अतिरिक्त विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं एवं वैबसाइट में अनवरत प्रकाशन। रचनाओं का तेलुगु, उड़िया, कन्नड़, नेपाली, इत्यादि भाषाओँ में अनुवाद। बच्चों के चैनल किडलॉजिक्स और बैडटाइम स्टोरी के लिये आप पटकथा लेखन।)

गर्व करो खुद पर…
कि स्त्री हो तुम…

पर…
चुप क्यों रहती हो तुम?
घाव क्यों सहती हो तुम?
क्या दर्द नहीं होता तुम्हें?
या…
तुमने दर्द से दोस्ती कर ली है?

या सच में—
मिट्टी की बनी हो तुम?
वही मिट्टी…
जिसे कोई भी आकार दे दे?

नहीं!
तुम मिट्टी नहीं—
तुम सृजन हो!

गर्व करो खुद पर—
कि स्त्री हो तुम!

बताओ…
इस देह के भीतर
कोई आत्मा है… या नहीं?
क्या वो आत्मा
तुमसे सवाल नहीं करती?
क्या वो तुम्हें झकझोरती नहीं—
कि ‘बस! अब और नहीं!’

जानती हो ना—
जुल्म करने वाला जितना दोषी है,
जुल्म सहने वाला…
उससे कम नहीं!
तो फिर…
क्यों सहती हो तुम?

गर्व करो खुद पर—
कि स्त्री हो तुम!

कुछ तो बोलो…
लब तो खोलो!
कहो—
कि तुम सिर्फ एक देह नहीं हो!
एक धड़कता हुआ दिल हो!
एक जीवित आत्मा हो!
कहो—
कि दर्द तुम्हें भी होता है—
जब बिना बात सताई जाती हो…
जब कोख में ही मिटा दी जाती हो…
जब दहेज के नाम पर
जिंदा जलाई जाती हो!

कहो…
कहो ना!

जब गिद्ध-सी नज़रें
तुम्हें नोचती हैं…
जब वासना
तुम्हारे अस्तित्व को रौंदती है…
और…
जब उँगलियाँ
गुनाहगारों पर नहीं—
तुम पर उठती हैं…

तब…
कैसा लगता है तुम्हें?
पर तुम बोलोगी कैसे?
तुम्हें तो बचपन से सिखाया गया है—
‘शर्म… ही स्त्री का गहना है।’
‘सीमा में रहो…’
‘लक्ष्मण रेखा मत पार करो…’

यह भी पढ़ें  उज्ज्वल भारत: नारी योगदान

पर ये किसी ने नहीं सिखाया—
कि अन्याय के सामने
चुप रहना… पाप है!

संस्कारों की बेड़ियाँ पहनकर
घुट-घुटकर जीना…
और फिर पूछना—
‘लोग क्या कहेंगे?’

सुनो…
लोग कुछ नहीं कहते!
लोग कुछ नहीं सोचते!

क्योंकि—
तुमने खुद को ही
सोचना छोड़ दिया है!

कभी देवी बना दी गई…
कभी देह बना दी गई…
कभी ‘डायन’ कहकर
सरेआम अपमानित कर दी गई…

जिसे जब जो चाहिए था—
तुम्हें वैसा बना दिया!
और तुम…
उसे ही अपना भाग्य मान बैठीं!

नहीं!
अब नहीं!
माँ हो…
बेटी हो…
बहन हो…
पत्नी हो…
पर सबसे पहले—
तुम… तुम हो!
तुम्हारा भी एक अस्तित्व है…
एक पहचान है…
एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है!
उसे पहचानो…

किस बात की कमी है तुममें?
धरती से लेकर अंतरिक्ष तक—
तुमने इतिहास लिखा है!
तुमने असंभव को संभव किया है!

तुम ईश्वर की रचना नहीं—
उसकी सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति हो!
उसके हस्ताक्षर हो तुम!

तो उठो…
खुद को पहचानो…
और…
गर्व करो खुद पर—

कि स्त्री हो तुम!
*****

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top