औरों के साथ-साथ अनिवार्य है स्वयं का विकास भी (जीने की कला)

सितंबर, 2023

सीताराम गुप्ता
पीतमपुरा, दिल्ली

“कर्तव्य से यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं को नष्ट कर ले और अपने जीवन को अपने हिसाब से व्यतीत न करे।”
— नेपोलियन हिल
जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो उसकी स्वयं से भी अधिक परवाह करते हैं। उसकी प्रसन्नता के लिए हम क्या कुछ नहीं कर गुज़रते! हम चाहते हैं कि उसे न केवल संसार की समस्त ख़ुशियाँ मिलें, अपितु उसकी हर प्रकार की उन्नति के लिए भी हम निरंतर प्रयत्नशील और चिंतित रहते हैं। यह अत्यंत स्वाभाविक है और इसके अभाव में प्रेम का कोई अर्थ नहीं रह जाता। किसी की स्वयं से अधिक चिंता करना और उसकी परवाह करना ही प्रेम का वास्तविक मानदंड है।
प्रेम के अतिरिक्त, उत्तरदायित्व और ज़िम्मेदारी की भावना भी हमें अपनों की परवाह करने के लिए प्रेरित करती है। इनके बिना एक सुखी परिवार और स्वस्थ समाज की कल्पना असंभव है। एक माँ अपने बच्चे के प्रति जितनी समर्पित और चिंतित रहती है, उसका दूसरा उदाहरण अन्यत्र नहीं मिल सकता। कई माताएँ अपने बच्चों की देखरेख में इतनी अधिक व्यस्त हो जाती हैं कि स्वयं उनका अपना स्वास्थ्य प्रभावित होने लगता है। परंतु प्रश्न यह उठता है कि यदि उनका स्वयं का स्वास्थ्य बिगड़ जाए, तो क्या वे लंबे समय तक अपने बच्चों की सही देखभाल करने में सक्षम रह पाएँगी? शायद नहीं! अतः यह सोचना अनुचित या अव्यावहारिक नहीं है कि हमें किस सीमा तक दूसरों के लिए स्वयं को समर्पित करना चाहिए?
ऑक्सीजन मास्क का सिद्धांत: पहले स्वयं की सुरक्षा
विमान की हर उड़ान से पूर्व यात्रियों को सुरक्षा संबंधी निर्देश दिए जाते हैं, ताकि आपात स्थिति में वे न केवल स्वयं सुरक्षित रह सकें, अपितु आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की सहायता भी कर सकें। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण निर्देश है:
“वायुयान में हवा का दबाव कम होने पर ऑक्सीजन मास्क नीचे आ जाएँगे; किंतु दूसरों को ऑक्सीजन मास्क पहनने में मदद करने से पूर्व स्वयं अपना मास्क पहन लें।”
आपात स्थिति में हम प्रायः अपने आश्रितों की मदद सबसे पहले करने का प्रयास करते हैं। यह मानवीय संवेदना है; किंतु यदि हम स्वयं ही असहाय या चेतनाहीन हो जाएँगे, तो न अपनी रक्षा कर पाएँगे और न अपने प्रियजनों की!
हमें हर हाल में अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि हम स्वयं सक्षम और सुरक्षित रहकर ही दूसरों की सहायता कर सकते हैं। स्वास्थ्य का प्रश्न हो या जीवन के किसी अन्य क्षेत्र में विकास का, यह सिद्धांत हर जगह समान रूप से लागू होता है। जितना ध्यान दूसरों पर देना अनिवार्य है, उससे अधिक ध्यान स्वयं पर देना आवश्यक है। यह स्वार्थ नहीं, अपितु व्यावहारिक दृष्टि से अनिवार्य जीवन-शैली है।
दूसरों के विकास में स्वयं का पतन नहीं
कुछ लोग स्वभाव से अत्यंत सहृदय होते हैं; वे सबको साथ लेकर चलते हैं और सभी को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। अपने बच्चों और भाई-बहनों की ही नहीं, बल्कि मित्रों और रिश्तेदारों की भी सहायता करते हैं। इससे अच्छी बात कोई हो ही नहीं सकती! परंतु यदि हम केवल दूसरों की उन्नति के प्रयासों में ही लगे रहें और अपना सारा समय व संसाधन उसी में लगा दें, तो प्रायः हमारा स्वयं का विकास अवरुद्ध हो जाता है और हमारी व्यक्तिगत इच्छाएँ अपूर्ण रह जाती हैं।
सब लोग आगे बढ़ें—यह बहुत अच्छी बात है। हमारे स्वजन और परिवार के सदस्य प्रगति करें—यह और भी संतोष की बात है। किंतु इस प्रक्रिया में यदि हम स्वयं पिछड़ने लगें या अपने अस्तित्व के प्रति उदासीन हो जाएँ, तो यह अनुचित है।
माता-पिता अपनी संतान की शिक्षा-दीक्षा और उन्नति के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। कई बड़े भाई-बहन भी अपने छोटे भाई-बहनों की आवश्यकताओं का ध्यान अपने बच्चों से बढ़कर रखते हैं। परंतु कई लोग अपनों की ख़ुशी के लिए अपनी ही ख़ुशियों का गला घोंटते रहते हैं। उन्हें त्याग करने से आत्मसंतोष तो मिलता है, किंतु जीवन के उत्तरार्द्ध में जब उन्हें उपेक्षा, कृतघ्नता या दोषारोपण मिलता है, तो उन्हें गहरा आघात पहुँचता है।
अपनी संतान भी इसका अपवाद नहीं है। कई बार बच्चे माता-पिता के त्याग का मूल्य न समझकर उनकी परवरिश में कमियाँ ही निकालते हैं। यदि समर्पित भाव से कार्य करने वाला व्यक्ति अपना स्वयं का आर्थिक या व्यक्तिगत विकास नहीं कर पाता, तो भविष्य में उसे भारी संकट झेलना पड़ सकता है। जिनके लिए उसने अपना जीवन खपा दिया, उन्हीं के आगे हाथ फैलाने की नौबत आ सकती है।
त्याग की सीमा और सामाजिक यथार्थ
अनेक परिवारों में माता-पिता के असमय निधन के पश्चात बड़े भाई या बहनें पूरे परिवार को सँभालने के लिए अपने करियर और सपनों को दाँव पर लगा देती हैं। वे भरण-पोषण के लिए कोई भी नौकरी कर लेते हैं, जिससे छोटे भाई-बहन पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं, उनकी शादियाँ हो जाती हैं और वे अपनी गृहस्थी बसाकर दूर चले जाते हैं।
किंतु इस प्रक्रिया में उस बड़े भाई या बहन के जीवन का स्वर्णिम काल निकल जाता है और वह अकेली रह जाती है। क्या उसके प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं था? क्या थोड़ा सँभलने के पश्चात परिवार के अन्य सदस्यों को उसका हाथ नहीं बँटाना चाहिए था?
संतुलित दृष्टिकोण ही समझदारी है
इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हमें अपनों की परवाह करना छोड़ देना चाहिए या केवल स्वार्थी बन जाना चाहिए। कर्तव्यों से मुँह मोड़ना उचित नहीं है। बच्चों, छोटे भाई-बहनों और आश्रितों का सर्वांगीण विकास करना हमारा पावन दायित्व है। किंतु स्वयं की उपेक्षा की कीमत पर किया गया त्याग कभी कल्याणकारी नहीं होता।
स्वयं की उन्नति और आवश्यकताओं के प्रति सचेत रहें:
स्वास्थ्य और व्यक्तित्व: अपने शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य तथा व्यक्तित्व के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रहें। यदि आप स्वयं व्यवस्थित और सशक्त होंगे, तभी दूसरों की बेहतर देखभाल कर पाएँगे।
आर्थिक सुदृढ़ता: अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी पर निर्भर न होना पड़े।
उत्तरदायित्व का अहसास: जिनकी आप मदद कर रहे हैं, उन्हें भी समय के साथ उनकी ज़िम्मेदारियों का बोध कराएँ।
स्वीकार्यता: यदि आपके द्वारा आगे बढ़ाए गए लोग किसी कारणवश आपको छोड़कर चले भी जाएँ, तो निराश होकर जीवन तबाह न करें; उपलब्ध विकल्पों के साथ आगे बढ़ें।
“तुम्हें आगे बढ़ाने के चक्कर में मैंने स्वयं को तबाह कर लिया”— यह बात न तो कोई सुनना पसंद करेगा और न ही इसे कहने का कोई औचित्य होगा। इसलिए प्रारंभ से ही सहानुभूति, कर्तव्य और स्व-विकास के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण बनाकर चलना ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है!

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