समझाइश (लघुकथा)

दिसंबर, 2024

टीकेश्वर सिन्हा “गब्दीवाला”
व्याख्याता (अंग्रेजी)
घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)

“इतने दिनों से मैं तुम्हें समझा रही थी; बात समझ नहीं आ रही थी? मेरे तन को खोखला तो कर डाला। मैंने तुम्हारे लिए कितना कष्ट सहा! दुःख सहा! कितनी पीड़ा हुई है मुझे! मैं ही जानता हूँ।”
“लेकिन आपने मुझे कभी क्यों नहीं दुत्कारा? क्यों नहीं भगाया मुझे? मेरे प्रति स्नेह व अपनतत्व क्यों जताया? आज बहुत रोना आ रहा है मुझे अपनी हालत पर।”
“मैंने कई बार तुम्हें अवगत कराया कि किसी को कष्ट पहुँचाकर मिला सुख लम्बी अवधि तक नहीं टिकता। शायद तुम यही सोचते रहे कि मेरे करीब रहकर तुम्हारा जीवन ठसके के साथ बीत जाएगा। जीवन भर तुम्हें कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। तुम्हारी यह बहुत बड़ी भूल थी। हरेक को स्वयं के लिए जीवन में कुछ न कुछ करना ही पड़ता है। अब रही बात अपनतत्व की; तो भला मैं कब किसके प्रति अपनत्व नहीं रखता?”
“अब मैं क्या करूँ… क्या न करूँ…? मुझे कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। मैं भाग भी तो नहीं सकता। मेरा अंत अब तो निश्चित है। सम्भव हो तो मुझे क्षमा कर देना।”
चुल्हे में जलती हुई लकड़ी की बातें सुन दूसरे छोर में लगे घुन (वुड वॉर्म) अपना सिर धुन रहा था।
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