जून, 2025

अहमदाबाद
(श्री संदीप श्रीवास्तव जी को सादर श्रद्धांजलि स्वरूप)
जिस पल में हम जीने लगे। जो पल सत्य बन जाये उसे ही एक अंतिम सत्य मानकर जीना चाहिए। जो पल अपने आगे आने वाले पल की आहट भी न सुनने दे और अतीत के पलों का अहसास न कराये जो, सूर्य की तपन, चन्द्र की शीतलता को विस्मृत करते हुए अपने होने का अहसास देता हुआ जीवन में उल्लास, प्रफुल्लता, ताजगी भरता हुआ मन को जीवन जीने हेतु विवश कर दे वही पल जीवन का सच्चा एवं वास्तविक पल है। जीवन की व्याख्या, दार्शनिकता, कल्पना, यथार्थ सभी कुछ बेईमानी हो जाये तो सम्पूर्ण रूप से उन क्षणों को आत्मसात कर लेना ही जीवन का उद्देश्य होता है।
यूँ तो सूरज की किरणों में तेज है। झुलसाती भी है, तपन भी देती है परन्तु वर्षा ऋतु के आगमन के काल में, कभी वर्षा के आगमन के समय में अपने वास्तविक रूप को प्रकट करती है। साथ ही अपने अन्दर समाहित सात रंगों को इंद्रवक्षु के माध्यम से शीतलता एवं सौन्दर्य प्रदान करती है। उसी तरह जीवन के पलों में कुछ अनुभव ऐसे भी होते हैं जो सूरज की गर्मी की तरह तपन जैसे होते हैं परंतु उसके भीतर अंतर्निहित सप्तरंगीय इंद्रधनुष के दर्शन कर लेना जीवन है। जीवन का वही पल अपना है जो व्यतीत हो रहा है, जीवन का जो पल बीत गया है उसे वापस लाया नहीं जा सकता है और जो कल आने वाला है उसकी कल्पना करना और कल्पना में डूबे रहना व्यर्थ है। अब जो पल हमारे पास है उसे संपूर्ण रूप से जीना लक्ष्य है और जीवन को समझना, जीवन जीना एक कला है। प्रत्येक पलों का अपने तरीके से आनंद उठाना भावों की पूर्णता है। संपूर्ण भावनाओं का केंद्र हृदय है और हृदय को आंदोलित करके उसको कैसे अलग किया जाये उसे व्यर्थ गवाना सृजन को विनाश में परिवर्तित करना है।
सृजन को सौंदर्य प्रदान करना व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य है। व्यक्ति की चाहत मधुर प्रियता है। मधुरता स्थिर हो जाये उसी प्रयास एवं लक्ष्य प्राप्ति का नाम जीवन है। प्रत्येक पल जो बीता जा रहा है, वह आने वाले फल को व्यर्थ न कर दे, ऐसी चाहत रखने वाले व्यक्ति जीवन जी सकते हैं। उसके लिए पीछे से नज़र हटा लेनी होगी और आगे की तरफ सोचना नहीं होगा। मात्र वर्तमान को सत्य मान कर उसे अंगीकार करके उसी में डूब जाना ही जीवन है।
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