टूटता धैर्य, बढ़ती हिंसा

जून, 2025

प्रीति मिश्रा

हिंसा केवल शारीरिक आक्रमण नहीं है, बल्कि वह हर विचार, शब्द और कर्म है जिससे किसी जीव की चेतना आहत होती है। यह किसी की आत्मा को चोट पहुँचाने वाली प्रवृत्ति है, जो क्रोध, ईर्ष्या, भय और असहिष्णुता से उपजती है। महात्मा बुद्ध ने कहा था—”हिंसा का जन्म अज्ञानता से होता है”, और यही अज्ञानता आज वैश्विक समस्या बन चुकी है।
आधुनिक जीवन की भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा ने मनुष्य को भीतर से असुरक्षित बना दिया है। यह असुरक्षा असहिष्णुता को जन्म देती है, जो विचारों, धर्म, जाति और यहां तक कि छोटे-छोटे मतभेदों को भी टकराव में बदल देती है। पहले समाज में सहनशीलता को नैतिक मूल्य माना जाता था, आज उसे कमजोरी समझा जाने लगा है। शायद यही कारण है कि पहले की तुलना में आज हिंसा के स्वरूप अधिक जटिल, प्रच्छन्न और सर्वव्यापी हो गए हैं।
आज हमारे घरों की चारदीवारी में भी मौन हिंसा पल रही है। भावनात्मक उत्पीड़न, अपमान, दबाव और नियंत्रण जैसी घरेलू हिंसाएँ, जो विशेषतः महिलाओं और बच्चों पर होती हैं, अब सामान्य हो गई हैं। यह दुखद है कि पीड़ित अक्सर चुप रहते हैं, क्योंकि या तो उन्हें सिखाया गया है सहना, या डर बैठा दिया गया है तोड़े जाने का। परंतु सच यह है कि हिंसा को सहना भी उसे बढ़ावा देना है। श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा—“अधर्म का समर्थन न करना ही धर्म है।” मौन स्वीकृति भी हिंसा को वैधता देती है।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि डिजिटल युग ने संवाद के पुल तो बनाए, परंतु आत्मीयता की डोर कमजोर कर दी। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर भाषा की कटुता और मानसिक आक्रोश एक नए प्रकार की मानसिक हिंसा को जन्म दे रहे हैं। व्यक्ति अपने विचारों को सर्वोपरि मानता है और दूसरे के मत के प्रति सहिष्णुता का भाव खो बैठता है। यही मानसिकता जब समूहों में बदलती है, तो वह धार्मिक, राजनीतिक और जातीय संघर्ष का रूप ले लेती है।
भारत के संतों और विचारकों ने इस विषय पर गहरी दृष्टि दी है। श्रीकृष्ण ने गीता में क्रोध को विनाश की जड़ बताया—”क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, और स्मृति भ्रम से बुद्धि नष्ट हो जाती है।” उनकी यह सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कुरुक्षेत्र के युद्ध में थी। वहीं भगवान बुद्ध ने घृणा के स्थान पर मैत्री भावना को अपनाने का संदेश दिया और कहा, “घृणा से घृणा नहीं मिटती, केवल प्रेम से ही मिटती है।”
ब्रह्माकुमारी शिवानी दीदी मानती हैं कि हिंसा की जड़ हमारे विचारों में होती है। वे कहती हैं—“जब तक हम अपने मन को शुद्ध और शांत नहीं करेंगे, तब तक बाहरी हिंसा का समाधान नहीं होगा।” उनकी शिक्षाओं में आंतरिक परिवर्तन को सबसे बड़ा उपाय माना गया है। ओशो की दृष्टि और भी गहरी है। वे मानते हैं कि हिंसा को दबाना नहीं, बल्कि समझना चाहिए। उनके अनुसार सजगता ही एकमात्र उपाय है जो भीतर के अंधकार को मिटा सकती है।
वैश्विक परिदृश्य में भी हिंसा एक गंभीर समस्या बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति प्रयासों के बावजूद दुनिया में युद्ध, आतंकवाद और नस्लीय संघर्ष की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रहीं। पश्चिम एशिया, यूक्रेन, सूडान जैसे क्षेत्रों में लगातार हो रही हिंसा न केवल राजनीतिक अस्थिरता, बल्कि मानवीय त्रासदी का कारण बन रही है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतरेस ने हाल ही में कहा—“शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं है, बल्कि न्याय, समानता और संवाद की उपस्थिति है।” परंतु दुखद सत्य यह है कि इन मूल्यों को स्थापित करना आज की सबसे कठिन चुनौती बन चुकी है।
विदेशों में भी सामाजिक हिंसा जैसे नस्लीय भेदभाव, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी घटनाएं और स्कूलों में गोलीबारी जैसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। अमेरिका, ब्राज़ील और यूरोपीय देशों में नागरिक समाज, संस्थाएं और शिक्षाविद् मिलकर हिंसा-रहित संस्कृति के निर्माण में प्रयासरत हैं। कई देशों में स्कूली पाठ्यक्रमों में ‘भावनात्मक साक्षरता’ और ‘करुणा शिक्षण’ को शामिल किया जा रहा है।
आने वाली पीढ़ी को हिंसा से दूर रखने के लिए हमें घर, विद्यालय और समाज तीनों स्तर पर कार्य करना होगा। बच्चों को केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि जीता-जागता उदाहरण देना होगा। योग, ध्यान, सेवा और सहानुभूति को जीवन का हिस्सा बनाना होगा। टेक्नोलॉजी का उपयोग मानसिक उन्नति के लिए करना होगा, न कि मानसिक प्रदूषण के लिए।
श्रीकृष्ण के शब्दों में—“शांत मन ही सच्चा योद्धा है।” यह शांति बाहर नहीं, भीतर से आती है। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर की हिंसा को पहचानकर उसका रूपांतरण करेगा, तभी समाज और विश्व में सच्ची अहिंसा का उदय होगा। यह लेख उसी जागृति की एक विनम्र अभिव्यक्ति है।
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