जून, 2025

शिवपुरी
मुरादाबाद
वर्तमान में हिंसा के कुछ प्रमुख कारण हैं:
घोर स्वार्थ, लोभ, लालच हिंसा के प्रमुख कारक
इस आपाधापी के वर्तमान युग में घोर स्वार्थ के चलते हिंसा अधिक पनप रही है। जैसे किसी वर पक्ष को मनमाफिक दहेज नहीं मिला तो इसे लेकर कलह का वातावरण तैयार हुआ और हत्या जैसे जघन्य अपराध हो रहे हैं। किसी ने किसी को अपशब्द कहे या मार्ग में कोई दुर्घटना घटित हो गई तो हिंसा हो जाती है। इसी तरह जमीन के विवाद भी हत्या जैसी घटनाओं के कारक बन रहे हैं।
खानपान में हिंसा में कारक
कहते हैं कि जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन।
अधिक मांसाहार की प्रवृत्ति भी खानपान, मद्यपान आदि भी कुछ लोगों में हिंसक व्यवहार करने की प्रवृत्ति बढ़ा रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य और अतीत के कुसंस्कारों के कारण भी हिंसा में बढ़ोतरी हो रही है।
सामाजिक कारक
आज हिंसा में बढ़ोतरी के लिए कुछ सामाजिक असमानता, गरीबी, और बेरोजगारी जैसे कारक हिंसा के लिए जमीन तैयार कर देते हैं।
गलत परम्पराएं भी हिंसा के कारक:
कुछ संस्कृतियों एवं समाज में हिंसा को स्वीकार्य कर लिया गया है, जिसके कारण बलि प्रथा का जन्म हुआ है। वहाँ ज्ञान और शिक्षा का प्रकाश भी कम पहुंच रहा है।
राजनीतिक कारक
वर्तमान में राजनीति हिंसा बढ़ाने में प्रमुख कारण बन रही है। ग्राम प्रधान के चुनाव से लेकर विधानसभा या लोकसभा के चुनाव हों। राजनीतिक दल अपने सत्ता हासिल करने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाते हैं, जिसका उपयोग अक्सर सत्ता हासिल करने या बनाए रखने के लिए ही किया जाता है। बूथों पर धांधलेबाजी, हार-जीत में विवाद आदि आजकल खूब बढ़ रहे हैं।
मद्यपान और अन्य प्रकार के नशे प्रमुख कारक
आर्थिक रूप से वंचित कुछ लोग भी आज नशे करने के कारण हिंसक बन जाते हैं। नशे में गाली-गलौच करने से छोटी-छोटी बातें हिंसा का रूप ले लेती हैं। जिसके कारण आज घरेलू हिंसा बहुत बढ़ गई है। साथ ही अधिक धन के मद में भी लोग अपना कर्तव्यों को भूलकर हिंसक हो जाते हैं।
लिंग में भेदभाव के कारण बढ़ती हिंसा
लिंग के आधार पर भेदभाव और असमानता हिंसा का एक प्रमुख कारण है, खासकर घरेलू हिंसा के मामले में। पुत्र और पुत्री में भेदभाव। आपसी बंटवारे आदि के कारण हिंसा बढ़ रही है।
जातिवाद, भाषा और क्षेत्रवाद के कारण हिंसा
जातिवाद, भाषा और क्षेत्रवाद का नासूर आज भी समाज में जीवित है। जो हिंसा को बढ़ाने में अग्रसर आज भी हैं। तमिलनाडु जैसा राज्य जीता जागता उदाहरण है।
जिद और अनावश्यक क्रोध के कारण हिंसा
जब कोई मनुष्य अपने को अहंकार और मद से लबरेज कर लेता है, तब वह अपना विवेक खो देता है। और अपनी बात मनमाने ढंग से मनवाने के लिए क्रोध और जिद करने लगता है, तब प्रतिकार स्वरूप हिंसा बढ़ जाती है।
साथ ही कुछ लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए या दूसरों को नियंत्रित करने के लिए भी हिंसा का सहारा लेते हैं।
अज्ञान और अशिक्षा के कारण बढ़ती हिंसा
शिक्षा और ज्ञान की कमी के कारण कुछ लोग हिंसा कर बैठते हैं उन्हें परिणामों का ध्यान नहीं रह पाता है कि हिंसा का परिणाम उनके जीवन को बर्बाद कर देगा।
तनाव और दबाव के कारण हिंसा
कभी-कभी अधिक मानसिक तनाव और दबाव भी लोगों को हिंसक व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर देते हैं। हमारे मन की शांति और धैर्य चुक जाता है। इसलिए बढ़ रही है।
ईर्ष्या और घृणा भी हिंसा के कारक
नफरत, घृणा और पूर्वाग्रह भी हिंसा के प्रायः कारण बन जाते हैं।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि समाज में हिंसा के कई जटिल कारण बन रहे हैं, जिनका उल्लेख उपरोक्त बिंदुओं में दर्शाया गया है। वर्तमान में इन्हें समझने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। हिंसा को रोकने के लिए हमें इन कारणों पर विचार-विमर्श कर दूर करने की आवश्यकता है।
हिंसा को रोकने के कुछ उपाय
समाज की कोई भी ऐसी जटिल समस्या नहीं है, जिसका कोई समाधान न हो। हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है कि, अहिंसा परमोधर्मः अर्थात मनुष्य के सुखद जीवन के लिए अहिंसा ही परमोधर्म है, लेकिन धर्म ग्रंथ यह भी आदेशित करते हैं कि हिंसा को सहना भी अपराध और कायरता है, अर्थात हमें पूर्व से हिंसक नहीं होना चाहिए। भगवान राम और कृष्ण ने दुष्ट और आततायियों को सबक सिखाने के लिए हिंसा की। उन्हें दंडित किया। इसी प्रकार आज के संदर्भ में देखा जा सकता है कि आततायी पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारत की सेना को हिंसक बनना पड़ा, आतंकवादियों को पनाह देने वालों और आतंकवादियों को दंडित करना पड़ा। इसलिए दुष्टों को दंडित करने के लिए हिंसा, हिंसा नहीं है।
बुद्धिजीवियों, संतों को आगे आना चाहिए
हिंसा की प्रवृत्ति को रोकने के लिए हमें सम्पूर्ण समाज में समरसता, भाईचारा, प्रेम को बढ़ाने के लिए विशेष रूप से बुद्धिजीवियों और संतों को आगे आना चाहिए। कुछ स्तरों पर काम किया भी जा रहा है। सत्संग आवश्यक है।
बच्चों के पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा को पढ़ाया जाए
बच्चों के पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा अवश्य सम्मिलित करना चाहिए, ताकि बच्चों में अहिंसा, स्वविवेक की सूझबूझ बचपन से ही पनपे। क्योंकि समाज में हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। हाँ अपनी आत्मरक्षा के लिए हिंसा अवश्यभावी हो जाती है। जिसका धर्मग्रंथ उल्लेख करते हैं।
बच्चों को माताएं सुसंस्कार दें
हिंसा की प्रवृत्ति को रोकने लिए सभी माताओं को अच्छे संस्कार देना आवश्यक है। उन्हें मारधाड़ वाले सीरियल और कार्टून न दिखाएं, न देखने दें। मोबाइल से उन्हें दूर रखें। उन्हें प्रारंभ से गीता, रामचरित मानस आदि सद्ग्रन्थों, अच्छी बाल पुस्तकें और बाल पत्रिकाओं को पढ़ने की आदत डालें। क्योंकि बच्चे ही देश का भविष्य हैं। साथ ही उन्हें धार्मिक कट्टरता वाले धर्मग्रंथों से दूर रखें।
धार्मिक कट्टरता से समाज को बचाने की आवश्यकता
धार्मिक कट्टरता से समाज को आज बचाने की अति आवश्यकता है। विशेषकर वह धर्म जो केवल अपने धर्मग्रंथ को ही ईश्वरीय आदेश मानते हैं, दूसरों से धर्म के कारण द्वेष और घृणा करते हैं, काफिर मानते हैं और हिंसक बनकर आतंकवाद फैलाते हैं, जबकि प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर की आत्मा विद्यमान है। हम सब उसकी संतानें हैं। तब इस तरह का भेदभाव क्यों? आज धार्मिक कट्टरता से ही हिंसा का तांडव देखने को मिल रहा है। एक ही विशेष धर्म के लोग धार्मिक कट्टरता के कारण पूरे विश्व में हिंसा फैला रहे हैं। जिससे समझने की आज आवश्यकता है। धार्मिक उन्माद फैलाने की किसी भी धर्म को छूट नहीं दी जा सकती है, इस पर अंकुश जरूरी है, चाहे वह किसी धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र या जाति विशेष से हो।
वर्तमान में जिओ और जीओ देना ही मानव का कल्याण कर सकता है। मानवता ही धर्म है। यही सम्पूर्ण जगत में समरसता, प्रेम, सद्भाव ला सकता है। यही मूलमंत्र है भारत के सभी मूल सद्ग्रन्थों का।
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