प्रतीक्षारत आँखें

जून, 2025

प्रीति चौधरी “मनोरमा”
जनपद बुलंदशहर
उत्तरप्रदेश

सुधा देवी के पति का देहांत लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व हो गया था, उन्होंने अकेले ही अपनी तीनों बेटियों मालती, मीठी, और मोहनी का पालन-पोषण किया था। उस समय उनकी उम्र अधिक न थी चाहतीं तो बेटियों को लेकर मायके चलीं जातीं किंतु वे ससुराल में ही रहीं। उन्होंने सिलाई- कढ़ाई करके, अचार-मुरब्बे बना-बना कर अपना व अपनी बेटियों का भरण-पोषण किया। उनके हाथ के बनाए हुए अचार बाजार में खूब दिखते थे। बेटियाँ कब बड़ी हो गयीं.. कब उनकी शिक्षा-दीक्षा हो गई.. इस बात का उन्हें आभास ही नहीं हुआ। वह तो बस सूरज के साथ दौड़-धूप करते, कर्म की ज्वाला में जलते, प्रतिदिन धीरे-धीरे स्वयं को जीवन की चक्की में पीस रही थीं। जब बेटियाँ विवाह योग्य हुईं तो उन्होंने योग्य वर तलाशने शुरू कर दिए। तीनों बेटियाँ स्वभाव से बड़ी ही शालीन थीं। तीनों ही माँ को बहुत अधिक चाहती थीं। बड़ी बेटी मालती आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहती थी, किंतु उन्होंने ही विवश करके उसका विवाह करा दिया। वे बेटी को समझाने के लिए कहतीं
“बेटी तो किसी राजा की भी घर नहीं बैठती.. बेटियों को तो विवाह करना ही होता है, क्योंकि वे दूसरे के घर की शोभा होतीं हैं”
किंतु मालती अक्सर माँ से कहती “माँ! आप मेरा विवाह मत कीजिए। हम तीनों के विवाह के बाद आप बिल्कुल अकेली हो जायेंगी।”
“अकेली कैसे हो जाऊँगी.. तीन बेटे भी होंगे ना मेरे, जो तुम तीनों को ब्याह कर ले जाएँगे.. क्या उन पर मेरा अधिकार न होगा.. वही मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे..”
ऐसे ही समय व्यतीत होता गया और मालती देवी ने तीनों बेटियों का विवाह संभ्रांत परिवारों में कर दिया। बेटियाँ अपने परिवार में खुश और मुतमईन थीं। इधर कुछ दिनों से सुधा देवी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। इतना बड़ा कोठीनुमा घर और उस घर की नीरवता उन्हें अंदर ही अंदर खोखला बनाए दे रही थी। जब तक बेटियाँ थीं तो घर स्वर्ग जैसा था, किंतु अब अकेलेपन के कारण यह घर नारकीय यातनाएँ देता हुआ प्रतीत होता। जब सुधा देवी का हृदय अत्यधिक उचाट हो जाता तो वह घर से बाहर आकर उन सीढ़ियों पर बैठ जातीं, जहाँ सामने के लॉन में उन्होंने झूला डाला हुआ था। इस झूले पर तीनों बेटियों के बचपन व्यतीत हो गए। कभी कभार वे भी संध्या काल में झूले पर आकर बैठ जाया करतीं और उस स्पर्श को महसूस किया करती, जो बेटियों को झूला झुलाते हुए उन्हें अनुभूत होता था। उनके तिक्त हृदय पर मानो मरहम सा लग जाता।
आज जब से वे अस्पताल से घर लौटी हैं और उन्हें यह ज्ञात हुआ है कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है, उन्होंने जब यह दुखद खबर अपनी तीनों बेटियों के साथ साझा की। उन्हें पूर्ण विश्वास था की खबर सुनते ही बेटियाँ दौड़ी चली आयेंगी। किंतु तीनों ने ही अपनी विवशता माँ को बता दी। मालती ने कहा कि “अभी तो साँस लेने की फुर्सत नहीं है माँ। यह बाहर टूर पर गए हुए हैं और बच्चों का ख्याल मेरे बिना कौन रखे।”
मीठी ने भी बच्चों की परीक्षा होने के कारण आने में असमर्थता जता दी और मोहिनी अपने पति के साथ पंद्रह दिन के लिए घूमने स्विट्जरलैंड गई हुई है।
आज सुधा देवी मूक होकर उसी झूला के पास बैठ गईं। सफेद सूती साड़ी में, झुर्रियों से भरा हुआ चेहरा, चश्मे से झाँकती दो आँखें, आनन पर विषाद की रेखाएँ, मानो किसी अपने की प्रतीक्षा कर रही हों, जो आकर इस दुखद घड़ी में उनके कंधे पर हाथ रख के कह दे “मैं हूँ ना माँ आप चिंता क्यों करती हैं..?” किंतु बेटी अपने घर-गृहस्थी में रम चुकी हैं और फिर दामादों से इतने अधिकारपूर्वक वे नहीं कह नहीं सकतीं कि उनका इलाज करा दें, या उनकी देखभाल करें। एक तो तीनों ही दामाद नौकरी पेशा हैं, तीनों के पास ही समय का अभाव है।
सावन की बूँदें लॉन के फर्श पर बिखरी हुई हैं, चंद बूँदें उनके चेहरे को भिगो रहीं हैं। यह कह पाना मुश्किल है कि कपोलों पर बारिश की बूंदों के अक्स हैं या अकेलेपन के दंश से उपजा हुआ पीड़ के दर्द का स्राव…?
दो नयनों से प्रतीक्षा झलक रही है, प्रतीक्षा किसी अपने के आने की …प्रतीक्षा एकाकी जीवन से मुक्ति की… प्रतीक्षा इस भयावह बीमारी से निजात की।
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