दिसंबर, 2025

पीतमपुरा, दिल्ली
उत्तुंग पर्वत-शृंखलाओं की बर्फीली चाटियों के स्पर्श से स्नात सुबह की शीतल हवा सबसे बेख़बर अपनी ही मस्ती में बहती हुई जा रही थी। जब वह जंगल से गुज़र रही थी तो फूलों से लदी ख़ुबसूरत-सी अल्हड़ एक वन्य लता ने अपनी ख़ूशबू बिखेरते हुए और अपने रंगों को झलकाते हुए उसे आवाज़ दी और कहा, ‘‘ऐ शीतल हवा! तनिक मेरे समीप आओ और मेरी ख़ूशबू से ओतप्रोत होकर इस संसार को शीतल ही नहीं सुगंधित भी करती हुई चली जाओ।’’ लेकिन गर्वोन्नत वायु ने सुगंध बाँटने को आतुर लता की एक न सुनी और इठलाती हुई आगे बढ़ गई। कुछ देर के बाद हवा वापस वहीं लौटकर आ गई जहाँ वन्य लता से उसका वार्तालाप हुआ था। हवा की सारी मस्ती हवा हो चुकी थी। उसकी चंचलता जाती रही थी और वह एकदम उदास थी। वह चुपचाप उस वन्य लता के समीप बैठ गई।
हवा को इस हालत में देखकर वन्य लता ने उससे पूछा, ‘‘अभी कुछ देर पहले ही तो तुम यहाँ से गुज़री थीं और अत्यंत प्रसन्नचित्त लग रही थीं और अब इतनी उदासमना दिखलाई पड़ रही हो। क्या बात है? क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकती हूँ?’’ यह सुनकर हवा की आँखों से अश्रु झरने लगे। वायु ने कहा, ‘‘मैंने अहंकारवश तेरी बात ही नहीं सुनी और न तेरी ख़ुशबू को ही साथ लिया। लेकिन मैं जैसे ही आगे बढ़ी गंदगी और बदबू में घिर गई। किसी तरह गंदगी और बदबू से बचकर आगे बढ़ी और घरों तक जा पहुँची लेकिन लोगों ने मेरा स्वागत करने की बजाय अपने घरों की खिड़कियाँ और दरवाज़े बंद कर लिए। इसमें उनका भी कोई दोष नहीं। मुझमें ही दुर्गंध व्याप्त हो गई थी। भला दुर्गंधयुक्त वायु का कोई कैसे स्वागत कर सकता है?’’
वायु का आत्मालाप जारी था। वह कहे जा रही थी, ‘‘काश! मैंने तुम्हारी बात मान ली होती। तुम्हारा सहयोग ले लिया होता! लेकिन आज मैं संकल्प लेती हूँ कि मैं सबके सहयोग का स्वागत करूँगी क्योंकि एक दूसरे के सहयोग के बिना हम न तो समृद्ध हो सकते हैं और न ही स्वयं आगे बढ़कर समाज के लिए ही कुछ कर सकते हैं।’’
हम सबकी स्थिति भी कुछ-कुछ वायु और लता जैसी ही होती है। जैसे लता व अन्य वनस्पतियों के फूलों की ख़ुशबू के अभाव में वायु अपूर्ण व अग्राह्य है और वायु के अभाव में लता व अन्य वनस्पतियाँ अपनी सुगंध वितरित करने में असमर्थ अथवा विवश हैं हम सब भी एक दूसरे के सहयोग के बिना एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा सकते।
पिछले दिनों एक रिश्तेदार घर आए। साथ में उनकी पत्नी भी थीं। दो-तीन दिन रुके। कई सालों बाद आए थे। ख़ूब आत्मीयतापूर्ण बातें हुईं। अच्छा लगा। पहले आर्थिक स्थिति पतली थी क्योंकि न तो कभी ख़ुद ही कोई काम किया और न ही कभी उनके पिताश्री ने कोई काम किया था। जब से उनके बच्चों ने सत्ता सँभाली आर्थिक स्थिति में बदलाव आया। बातों से झलकता था कि अब आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है लेकिन जब तक रुके पति-पत्नी दोनों की एक ही शिकायत बार-बार प्रतिध्वनित होती रही, ‘‘हमें तो माँ-बाप और दादा-दादी से कुछ नहीं मिला। हमारी जो संपत्ति है वह सब हमने स्वयं अर्जित की है। हमारी समृद्धि हमारे स्वयं के परिश्रम का ही परिणाम है।’’ इसी प्रकार की शिकायत करने वाले अनेक लोगों से मुलाकात होती ही रहती है। अधिकांश का ये कहना होता है कि दे आर कंप्लीटली सेल्फमेड। यह मात्र अहंकार है। यह आंशिक सत्य हो सकता है पूर्ण सत्य कदापि नहीं हो सकता।
जहाँ तक माँ-बाप और दादा-दादी से विरासत में संपत्ति के मिलने की बात है उसके कई पहलू हो सकते हैं। यदि माँ-बाप और दादा-दादी के पास संपत्ति होती तो वह अवश्य ही तुम्हें मिलती लेकिन यदि उनके पास कुछ था ही नहीं तो वे कहाँ से तुम्हें कुछ देते। एक और प्रश्न उठता है कि क्या मात्र धन-दौलत अथवा पैसा ही वास्तविक विरासत है। धन-दौलत अथवा पैसा न मिलने पर भी माँ-बाप से बहुत कुछ मिलता है हम ये भूल जाते हैं। हम ये भूल जाते हैं कि हमारे अस्तित्व में आने के मूल में हमारे माता-पिता ही तो होते हैं। हम जो भाषा बोलते हैं वह हमने किसी स्कूल या मदरसे में नहीं अपितु माता-पिता के सान्निध्य में ही सीखी होगी। उन्होंने ही उँगली पकड़कर चलना भी सिखाया होगा। उन्होंने अपनी हैसियत के अनुसार न केवल अच्छी परवरिश की होगी अपितु शिक्षा-दीक्षा दिलाने का प्रयास भी अवश्य किया होगा। घोर ग़रीबी की हालत में भी माँ ख़ुद भूखी रहकर अपने बच्चों का पेट भरने की जी तोड़ कोशिश करती है इसमें संदेह नहीं। ऐसे माँ-बाप से संपत्ति नहीं मिली तो क्या विषम परिस्थितियों में जीने का साहस और प्रेरणा तो अवश्य मिली होगी। फिर कैसे कहा जा सकता है कि हमें माँ-बाप से कुछ नहीं मिला?
कुछ लोगों को माँ-बाप से ही नहीं पूरे समाज से शिकायत होती है। उनका पूछना है कि दुनिया ने उनके के लिए आख़िर किया ही क्या है? ऐसे लोग प्रायः स्वयं में, स्वयं के द्वारा और स्वयं के लिए निर्मित होते हैं। उनके लिए सबकी जिम्मेदारी होती है लेकिन वे ख़ुद किसी के लिए जिम्मेदार नहीं होते। वे कभी ये सोचने की ज़हमत नहीं उठाते कि उन्होंने समाज के लिए क्या किया है अथवा करना चाहिए।
यह सही है कि आपने स्वयं अपना विकास किया। आपने अपने समय का सदुपयोग किया, ख़ूब मेहनत करके पढ़ाई की और एक अच्छी सी नौकरी अथवा व्यवसाय में आ गए। यह ठीक है कि आपने पुरुषार्थ किया। वैसे भी आप पुरुषार्थ नहीं करते तो आपका ही अहित होता। पुरुषार्थ करके आपने अपने लिए अच्छा किया लेकिन क्या इसके पीछे किसी उत्प्रेरक तत्त्व ने काम नहीं किया? क्या आपको इसके लिए कहीं से प्रेरणा और प्रोत्साहन नहीं मिला? क्या अनेक व्यक्तियों और समाज ने आपको आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध नहीं कराए?
जहाँ पर आपने शिक्षा प्राप्त की वे स्कूल, कॉलेज, संस्थान और विश्वविद्यालय क्या आपने स्वयं निर्मित किये थे? जिस कार्यालय अथवा प्रतिष्ठान में आप कार्यरत हैं क्या वह आपके ही परिश्रम का प्रतिफल है? आप जो व्यवसाय कर रहे हैं क्या वह अन्य लोगों के सहयोग के बिना संभव है? आप जो उद्योग चलाते हैं क्या उसके उत्पाद स्वयं उपभोग में लाकर पैसा कमा रहे हैं? माना आपके पास अथाह संपत्ति है पर क्या मात्र पैसे के बल पर बिना एक डॉक्टर की मदद के रोगी होने पर स्वस्थ हो पाए हैं? आप एक डॉक्टर हैं तो क्या बिना मजदूरों की मदद के ये आलीशान घर और क्लीनिक ख़ुद बना सकते है? एक मजदूर ही क्या बिना किसान की मेहनत के अन्न का एक दाना भी मुँह में डाल सकेगा? एक किसान को भी अच्छी खेती के लिए न जाने कितने लोगों पर निर्भर होना पड़ता है। एक विद्यार्थी को भी पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के लिए कापी-किताब और क़लम-दवात आदि न जाने कितनी चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है जिसके लिए वह दूसरों पर निर्भर होता है।
बिजली के जिस प्रकाश से हम रात को दिन में परिवर्तित कर देते हैं, पंखे, कूलर व एसी की ठंडी हवा का आनंद लेते हैं, हवाई जहाज़ में बैठ कर मिनटों में हज़ारों मील दूर जा पहुँचते हैं, समाचार पत्र जिसका हम अवलोकन कर रहे हैं, इन सब का आविष्कार हमने नहीं किया लेकिन फिर भी इन आविष्कारों से लाभांवित हो रहे हैं और कह रहे हैं कि हम सेल्फमेड हैं। हमारे महान पूर्वजों ने हमें श्रेष्ठ जीवन शैली से अवगत कराया, माता-पिता ने जन्म दिया, शिक्षकों ने शिक्षा दी, इन सब का ही नहीं अपितु समाज, देश और इस संपूर्ण सृष्टि का हम पर भारी ऋण है जिससे हमें उऋण होना होता है पर क्या देवऋण, ऋषिऋण, मातृऋण, पितृऋण, भूतऋण आदि ऋणों से हम पूरी तरह से उऋण हो पाते हैं? यदि नहीं तो फिर हम सेल्फमेड कैसे हो सकते हैं?
बड़ी-बड़ी चीज़ों की बात छोड़िए छोटी-छोटी चीज़ों और ज़रूरतों के लिए भी हम दूसरों पर निर्भर होते हैं। एक मामूली सी लगने वाली क़मीज़ जो हमने पहन रखी है उसे हमारे तन पर सुशोभित करने में सैकड़ों लोगों का योगदान है। खेत में बीज बोने से लेकर पौधे उगने और उनसे कपास मिलने तथा कपास से कपड़ा और क़मीज़ बनने के बीच असंख्य हाथों का परिश्रम है। कपड़े से क़मीज़ बनाने के लिए एक सिलाई मशीन की ज़रूरत पड़ती है। वह लोहे तथा अन्य कई पदाथों से बनती है। खनिकों द्वारा लोहा और अन्य खनिज पदार्थ खानों से निकाले जाते हैं। बड़े-बड़े करखानों में मजदूरों द्वारा लोहा साफ किया जाता है। फिर दूसरे बड़े-बड़े करखानों में लोहे से बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा छोटी मशीनें बनती हैं। उन्हीं में से एक मशीन पर कारीगर कपड़े से एक अच्छी सी क़मीज़ सिलकर आपको पहनाता है।
सहयोग के अभाव में हम शून्य हैं। औरों के सहयोग के अभाव में हम निरर्थक हैं जैसे पैट्रोल के अभाव में एक मोटरगाड़ी।
चलिए मान लेते हैं कि समाज ने आपको कुछ नहीं दिया। यहाँ सब स्वार्थी हैं। बिना कारण कोई किसी को कुछ नहीं देता। लेकिन एक जगह है जहाँ से आपको बहुत कुछ मिलता है और वो भी उपयोगी और बिलकुल मुफ़्त। प्रकृति तो हमें बहुत कुछ देती है पर हम उसे क्या देते हैं सिवाय उसे प्रदूषित और नष्ट करने के। फिर समाज को भी प्रदूषित और नष्ट करें, उसकी उपेक्षा करें तो कौन सी बड़ी बात है?
लेकिन वास्तविकता ये है कि हम सब एक दूसरे के सहयोग के बिना अपूर्ण हैं। हमारे विकास में हमारा पुरुषार्थ ही नहीं अन्य सभी का सहयोग अपेक्षित है। क्या माता-पिता, क्या भाई-बंधु, क्या समाज और क्या प्रकृति इन सब के सम्मिलित प्रयासों से ही हमारा जीवन गति पाता है। इन सब के सहयोग के बिना एक साँस लेना भी मुमकिन नहीं। आओ इस भ्रम को तोड़ें कि हम सेल्फमेड हैं। हम सबको महत्त्व देंगे और सबकी रक्षा करेंगे तभी हमारी सुरक्षा संभव है। तभी अहंकार से भी बचे रहेंगे अन्यथा सारी भौतिक प्रगति निरर्थक होगी।
*****
