आइए तैयारी करें स्वयं अपनी रस्म पगड़ी की (जीने की कला)

मार्च, 2025

सीताराम गुप्ता
पीतमपुरा, दिल्ली

प्रायः देखा जाता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत होने वाले कार्यक्रमों में मृतक की प्रशंसा ही नहीं की जाती अपितु उसके योगदान को बढ़ाचढ़ा कर भी पेश किया जाता है।
कई बार कुछ लोगों की एकदम झूठी प्रशंसा की जाती है और वो भी ऐसे लोगों की जिनका समाज में कोई सकारात्मक योगदान नहीं होता। कई बार तो अपराधियों तक की प्रशंसा में ऐसे-ऐसे क़सीदे पढ़े जाते हैं कि कोई जवाब नहीं।
आख़िर क्यों? एक व्यक्ति जो जीवनभर ग़लत कामों में लिप्त रहा, झूठ, ठगी, चोरी, बेईमानी, हिंसा, व्यभिचार जैसे कार्यों में लिप्त रहा यदि उसके बारे में कहा जाए कि वह एक सत्यवादी, ईमानदार, संवेदनशील, दयालु व सबकी मदद करने वाला शख़्स था तो क्या ये बात ठीक है?
ये ठीक है कि मरने के बाद किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसकी बुराई करना बेकार है लेकिन ग़लत व्यक्ति का महिमामंडन भी क्यों? यदि हम ग़लत का विरोध नहीं कर सकते या ग़लत का विरोध करते हुए डरते हैं तो ग़लत को प्रतिष्ठित करने की भी क्या ज़रूरत है? इससे समाज में न केवल ग़लत संदेश जाता है अपितु सही लोग हतोत्साह भी होते हैं। ग़लत आदमी की बिना वजह तारीफ़ करने से तो बेहतर है कि हम ख़ामोश रहें।
रस्म पगड़ी पर प्रायः ये नाटक किया जाता है। मृतक की तारीफ़ में क़सीदे पढ़े जाते हैं। उसे महान आत्मा कह कर संबोधित किया जाता है। इसी दौरान मृतक के उत्तराधिकारी विशेष रूप से ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी बाँधी जाती है। ये पगड़ी क्या है? पगड़ी वास्तव में उत्तरदायित्व का प्रतीक होती है।
पगड़ी पहनाकर ही किसी व्यक्ति का सम्मान भी किया जाता है क्योंकि पगड़ी सम्मान का भी प्रतीक है। सम्मान किसे दिया जाना चाहिए? सम्मान उसी व्यक्ति को दिया जाता है या दिया जाना चाहिए जो ईमानदारी से अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करे। पगड़ी पहनाने का अर्थ है आप अपने उत्तरदायित्वों को वहन करते हैं या कम से कम आगे अवश्य करेंगे। आप पिता के उत्तराधिकारी होंगे। उनके दिखाए गए मार्ग पर चलते हुए, उनकी इच्छाओं को आदर देते हुए, उनके अपूर्ण कार्यों को पूर्ण करेंगे। बड़ी अच्छी बात है। हर समाज में किसी न किसी रूप में ये प्रथा व्यवहार में लाई जाती है। हर व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत शोक सभा, चौथा, दसवाँ, तेरहवीं या सत्रहवीं होती है और इसी दौरान रस्म पगड़ी भी होती है।
उत्तराधिकारी या बड़े बेटे को पगड़ी भी बाँधी जाती है। लेकिन ज़रूरी तो नहीं कि हर व्यक्ति का जीवन अनुकरणीय हो, उसके बताए हुए मार्ग पर चला जाए। लेकिन फिर भी कहा जाता है कि मृतक द्वारा दिखलाए गए मार्ग पर चला जाए।
हर चोर, डाकू, लुटेरे, व्यभिचारी, बलात्कारी, तस्कर अथवा देशद्रोही की भी रस्म पगड़ी होती ही है तो क्या उसके परिवारजन को मृतक के पगचिह्नों पर चलने का संकल्प लेना या दिलाना किसी भी व्यक्ति, क़ौम, समाज या राष्ट्र के हित में होगा? कदापि नहीं। कोई नहीं कहता कि तुम्हारा बाप ग़लत था अतः उसके पगचिह्नों पर मत चलना। पगड़ी व रस्म पगड़ी के महत्त्व को समझकर इसका ठीक इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जहाँ ज़रूरत न हो इसको ग़लत रूप में प्रदर्शित न किया जाए। कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है:
रस्मे-पगड़ी की क्या ज़रूरत है,
फ़र्ज़ अपना ख़ूब निभा रहे हैं आप,
ख़ून चूसते थे अजदाद आपके सबका,
ख़ून की नदियाँ बहा रहे हैं आप।
एक ऑफिस में एक कर्मचारी की मृत्यु हो गई। जैसे ही लोग ऑफिस में पहुँचे उन्हें ये दुखद समाचार दिया गया। एक व्यक्ति ने मौक़े की नज़ाकत का फ़ायदा उठाने की ग़रज़ से कहा, ‘‘बहुत अच्छा इंसान था। हमेशा हँसता रहता था।’’ लोगबाग़ चुपचाप खड़े थे। उसने आगे जोड़ा, ‘‘हमेशा अपने काम में लगा रहता था।’’ वास्तविकता ये है कि मृतक किसी भी तरह से प्रशंसा का पात्र नहीं था। वह किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता था। हँसी अथवा मुस्कराहट से उसका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। जहाँ तक काम की बात है उसे कुछ नहीं आता था और जो आता था उसे भी बिलकुल नहीं करता था। सच पूछो तो वह ऑफिस के कामों में सहयोगी नहीं बाधक था। फिर ऐसे व्यक्ति की झूठी प्रशंसा क्यों? ख़राब से ख़राब किसी व्यक्ति की मृत्यु पर भी ख़ुशी मनाना या उसकी घोर निंदा करना व्यावहारिक नहीं लेकिन झूठी प्रशंसा करना प्रशंसा करने वाले व्यक्ति का मूल्यांकन कर देती है।
कई लोग इसलिए भी मृतक की झूठी प्रशंसा करते हैं ताकि लोग उनकी मृत्यु पर उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करें अर्थात् उनकी झूठी प्रशंसा में कमी न रहे। कई बार लगता है लोग किसी डर के मारे अथवा मृतक के परिवार के प्रभाव के कारण भी मृतक की प्रशंसा करने को विवश होते हैं।
कई लोग किसी ज़िंदा व्यक्ति से तो नहीं डरते लेकिन मरने के बाद पता नहीं क्यों डरने लग जाते हैं। उन्हें लगता होगा कि कहीं उसकी प्रशंसा न करने से उसकी प्रेत आत्मा कोई हानि न पहुँचा दे। जो भी हो मृतक की झूठी प्रशंसा में लोग रिकार्ड तोड़ देते हैं।
कई लोग रस्म पगड़ी अथवा अन्य संस्कारों के बहाने अपनी अमीरी का भी जम कर प्रदर्शन करते हैं विशेष रूप से वे लोग जो जीते जी तो बूढ़े माँ-बाप को पानी तक नहीं देते लेकिन उनकी मृत्यु पर घड़ियाली आँसू ही नहीं बहाते शाही भोज देने में भी लाखों ख़र्च कर डालते हैं।
वास्तव में ऐसे आयोजनों का मुख्य उद्देश्य रिश्तेदारों व परिचितों के साथ मिलकर बैठना व उनका दुख-दर्द बाँटना और मृतक के परिवार के सदस्यों को उनके दायित्वों से अवगत करवाना ही होता है।
मृतक के मूल्यांकन के बहाने से ये स्वयं के मूल्यांकन का अवसर भी है। इस अवसर पर हम मनुष्य जीवन की एक बहुत बड़ी सच्चाई से रूबरू भी होते हैं। किसी भी व्यक्ति के संस्कार में सम्मिलित होने पर आभास होता है कि मृत्यु एक दिन सबको आनी है। इससे ग़लत कार्यों से बचने का संदेश भी मिलता है।
मृत्यु के बाद हम कोई कार्य नहीं कर सकते अतः इच्छित शेष कार्यों को शीघ्र पूरा करने की प्रेरणा भी मिलती है। यदि मृतक में वास्तव में कुछ अच्छाइयाँ थीं तो हमें उन्हें अपनाने और उसकी बुराइयों से दूर रहने की प्रेरणा भी मिलती है।
हमें लगता है कि हम कुछ ऐसा करें जिससे जब हमारे लिए ऐसी ही शोक सभा हो तो लोगों को हमारी प्रशंसा में झूठ न बोलना पड़े। यदि ऐसा हो सके तभी ऐसे आयोजनों को सार्थक कहा जा सकता है।
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