कुसंस्कारों से जूझती पुरानी पीढ़ी

सितंबर, 2025

व्यग्र पाण्डे
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी, राज.

जब अधिकतर लोग अशिक्षित थे तो सभी अशिक्षितों के मन में एक कुण्ठा सदैव बनी रहती थी कि अनपढ़ का भी कोई जीवन है। समय बदला राज सत्ताओं में परिवर्तन आया। वह परिवर्तन एक नवजीवन सा था। जो इंसान सदियों से अंधकारमय जीवन जी रहे थे उनके जीवन में शिक्षा, रोशनी बनकर आई।
हमारे देश में शिक्षा न केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित थी वरन् चरित्र- निर्माण भी उसका अभिन्न अंग रहा। आजादी के बाद वो सब भी पढ़ने लगे जिनके पढ़ने पर प्रतिबंध तो नहीं पर अवसर नहीं होता था। पर अब शिक्षा की गाड़ी द्रुत गति से बढ़ने लगी। कुछ वर्षों बाद परिवर्तन के नाम पर कुछ बदलाव शिक्षा-पाठ्यक्रम में भी दिखने लगे। अब शिक्षा का रुख चरित्र-निर्माण से दूर होने लगा था। शिक्षा के मायने केवल पढ़-लिखकर कोई अच्छी सी नौकरी मिल जाये और नौकरियां मिलने भी लगी। आरंभ के कुछ दसक ठीक-ठाक निकल गये और अभिभावक भी प्रसन्न थे। लेकिन जैसे ही पीढियाँ बदलने लगी पुरानी व नयी पीढ़ी की सोच में अंतर साफ दिखाई देने लगा।
फिर भी प्रत्येक माँ-बाप अपनी संतान को अच्छे से अच्छा पढ़ाकर ऊँचे ओहदे पर बिठाना चाहते रहे और वे अपने जीवन में कठोर मेहनत से कमाई संपत्ति को बेटे-बेटियों की शिक्षा पर बेझिझक खर्च करते रहे। अब पुरानी सोच से माँ बाप भी निकलना चाहते थे साथ ही बच्चों को भी पुराने विचारों से परे ले जाना चाहने लगे। आधुनिकता के नाम पर पुराने संस्कार उन्हें भी दकियानूसी दिखने लगे थे। सभी संस्कारविहीन शिक्षा के दुष्प्रभाव से अंजान थे। पर जब उन गलतियों के प्रभाव समाज में हर जगह दिखाई देने लगे तो आँखें खुलने लगी पर अब क्या होने वाला था तीर तो निकल चुका था। अब मैं, आपको कुसंस्कारों से जूझती पुरानी पीढ़ी के दर्शन कराता हूँ … जिनके पात्र कल्पित हैं पर घटनाएं वास्तविक …
प्रथम दृश्य
मई का महीना दोपहर का समय मुझे आवश्यक काम से बाजार जाना हुआ। चिलचिलाती धूप के कारण सड़क पर कम ही आवागमन था। मुझसे कुछ आगे सड़क पर एक वृद्ध सज्जन चलते चलते रुक गये मैंने अपनी बाइक उनके पास जाकर रोकी तो पता चला की वो तो मेरे परिचित मीठालाल जी थे। उनके दो बेटे जिनमें एक का निजी व्यवसाय दूसरा सरकारी नौकर। स्वयं मीठालाल जी को रिटायर हुए पांच छ: साल हो गए थे। मैंने नमस्ते कर उनसे पूछा इस गर्मी में इस समय आप कहाँ जा रहे हो? तो उनने पसीने पोछते हुए कहा- छोटे बेटे का बालक इस पास के स्कूल में पढ़ता है उसे लेने जा रहा हूँ। मैंने पूछा बालक कौनसी कक्षा में पढ़ता है उन्होंने कहा-पाँचवीं में। चलो बैठो में आपको छोड़ देता हूँ। नहीं, धन्यवाद! आप जाइये और वो चल दिए। लगभग एक घंटे बाद मैं बापस आ रहा था तो दोनों बाबा-पोता जाते हुए दिखाई दिए। पर ऐसा लग रहा था कि बाबा को पोता ले जा रहा है न कि बाबा पोते को….
द्वितीय दृश्य
हमारी कालोनी में मिस्टर एस.के. साहब को रिटायर हुए लगभग आठ-दस वर्ष हो गये होंगे, मकान बड़ा आलिशान एक रूतबे के धनी, शहर में अच्छा खासा सम्मान जिनका। जीवन में एक ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई या उनने अपनी मर्जी से की, ये पता नहीं। पर कोई कोर कसर नहीं छोड़ी उसके लालन-पालन में। बालक भी प्रतिभाशाली था। बड़ा होकर बालक का जॉब विदेश में लग गया उसने वहाँ ही शादी कर ली और वह वहीं रहने लग गया था। कुछ वर्ष पहले मि. एस.के. की पत्नी जब गुजरी तो बालक परिवार सहित पाँचवें दिन आकर पहुँचा। पत्नी की मृत्यु के पश्चात एस के साहब टूट चुके थे यद्यपि रोटी पानी व झाड़ू पोछा हेतु नौकरानी रख छोड़ी थी। एक दिन अचानक मि. एस. के. साहब की अटैक से मृत्यु हो जाती है। पड़ोसियों ने डायरी से ढूंढ कर मोबाइल नंबर लेकर बालक को सूचना दी। भैया! आपके पिताजी की मृत्यु हो गयी है अतः आप आ जाइये। तो बालक जबाब देता है अंकल मेरी मजबूरी है मैं आ नहीं सकता। मैं आपको दाग-क्रिया में जो खर्च होगा उसके लिए फोन-पे कर देता हूँ। कृपया आप इस कार्य में पड़ोसी का दायित्व निभा कर मुझ पर कृपा कीजिए।
तृतीय दृश्य
एक विशेष पर्व पर मुझे अपने साथियों के साथ वृद्धाश्रम जाना हुआ। वहाँ अधिकतर वृद्धाएं ही थी। मैंने एक वृद्धा माँ के पास जाकर पूछा- अम्मा आप कहाँ से हो? उसने कहाँ-क्या करोगे पूछा कर रहने दो बेटा, और उसकी आँखों में आंसू आ गए। मेरे विशेष आग्रह पर उसने कहा- पड़ोस के शहर की रहने बाली हूँ दो बेटों की माँ हूँ नाती-पोते हैं। मेरे पति को गुजरे दो वर्ष हो गये। शुरू में बेटों ने छ:-छ: महीने मुझे रखा, मर अब एक साल पहले यहाँ छोड़ गये कभी-कभी मिलने आते हैं। अबकी बार तो बहुत दिन हो गये उन्हें यहाँ आये। मुझे घर/बच्चों की बहुत याद आती है बेटा …अम्मा की आँखों में अनवरत पानी बह रहा था। मेरी भी आँखें नम हो गयी थी।
चतुर्थ दृश्य
जवानी के दिनों में जिनका सारे गाँव में डंका बजता था वो वीरू काका अब पिचेहत्तर के लगभग हो चुके थे। लड़के- लड़कियों की शादी-विवाह से वर्षों पहले फ्री हो चुके थे। अब उन्हें चलने-फिरने, दिखने में भी परेशानी रहने लगी थी पर अभी भी गाँव के स्त्री-पुरुष उनका सम्मान करते थे। अक्सर उनके घर से गाली-गलौज की ध्वनियां पिछले कई महीनों से यदा-कदा आती तो समझा जाता कि हर घर में होता है, लड़ते होंगे बहु-बेटे। पर एक दिन नहीं रहा गया तो मैं चला ही गया। पता चला कि बड़ा बेटा अपने बाप से अभद्र भाषा में बात कर रहा था। उनके तीनों बेटे पढ़े-लिखे थे। मुझे देखकर वीरु काका की आँख भर आई और कहने लगे। देखा, इनको इसलिए ही दूर-दूर तक पढ़ाया था। और ये ही नहीं तीनों की पत्नियां भी मुझसे गलत बोलती हैं। सभी चाहते हैं मैं जल्दी मरूँ…अब मैं कैसे मरूँ …मौत आती नहीं … मैं निरूत्तर ही घर से बाहर आ गया।
दृश्य तो और भी लिखे जा सकते हैं जैसे सुबह-शाम बुजुर्गों को दूध व सब्जियां लाते हुए इससे भी ज्यादा कुत्तों को घुमाते हुए भी देखे जा सकते हैं। बड़ी उम्र की अम्माएं घरों में नौकरानी बनी हुई हैं। ये हमने कैसी शिक्षा प्राप्त की है समझ नहीं आती। आज ‘पुरानी पीढ़ी’ पढ़े-लिखे आधुनिक परिवारों में अधिक पीड़ित हैं। अच्छे जीवन के लिए शिक्षा जितनी महत्वपूर्ण है ठीक उतने ही सुसंस्कार का होना भी जरुरी है। इस पर भी सभी को ध्यान देना होगा। तब सभी मनुष्य, मनुष्य कहलाने के हकदार बन पायेंगे।
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