जीवन का उत्सव (प्रेरक कहानी)

बबीता झा
सितंबर, 2025

एक राजा ने किसी बात से क्रुद्ध होकर अपने एक बुद्धिमान मंत्री को मृत्युदंड की सजा सुना दी। राजा के आदेशानुसार, इस दंड का क्रियान्वयन (फाँसी) उसी दिन सायं काल को होना तय हुआ।

संयोगवश, उसी दिन उस मंत्री का जन्मदिन भी था। जन्मदिन का उत्सव मनाने के लिए उसके घर पर परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और पड़ोस के अनेक लोग एकत्र हुए थे। जब मंत्री को मृत्युदंड दिए जाने की यह दुखद सूचना उसके घर पहुँची, तो उत्सव के माहौल में अचानक निराशा, भय और शोक की लहर दौड़ गई। किंतु मंत्री स्वयं बिल्कुल शांत और सामान्य बना रहा; उसके चेहरे पर चिंता की एक शिकन तक नहीं थी।

सभी लोग उसके इस व्यवहार को देखकर अचरज में थे। मंत्री ने अत्यंत सहजता से लोगों से कहा—”फाँसी तो शाम को होनी है, अभी शाम तक का समय तो हमारे पास शेष है। इस बहुमूल्य समय को रो-धोकर नष्ट करने से अच्छा है कि जिस उत्सव को मनाने के लिए मेरे प्रियजन यहाँ एकत्र हुए हैं, उसे सहर्ष मनाते हुए इस समय का सार्थक उपयोग किया जाए। मैं तो अत्यंत भाग्यशाली हूँ कि मुझे मृत्यु से पूर्व उसकी सूचना मिल गई, जबकि अधिकांश लोग तो ऐसे होते हैं जिन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के काल कवलित होना पड़ता है। इसलिए मृत्यु जैसे अटल सत्य से भयभीत होने के बजाय, हमें जीवन के प्रत्येक क्षण को आनंद और पूर्णता के साथ जीना चाहिए।”

मंत्री के इन विचारोत्तेजक और सकारात्मक वचनों को सुनकर वहाँ उपस्थित लोग पुनः उत्साह के साथ उत्सव मनाने लगे। यह अद्भुत दृश्य देखकर राजा के गुप्तचर व दूत दंग रह गए। उन्होंने तुरंत राजदरबार जाकर राजा को पूरी स्थिति से अवगत कराया।

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राजा ने आश्चर्यचकित होकर मंत्री को दरबार में बुलवाया और पूछा कि कुछ ही घंटों में मृत्यु सामने होने के बावजूद वह जश्न क्यों मना रहा था? मंत्री ने अत्यंत विनम्रता और सहज भाव से अपने तर्क राजा के समक्ष रखे। उसने राजा का आभार भी व्यक्त किया कि उन्होंने उसे मृत्युदंड से पूर्व कुछ घंटों का समय दिया, जिसे वह अपने प्रियजनों के साथ प्रेमपूर्वक बिता सका।

राजा मंत्री के जीवन को उसकी संपूर्णता में जीने की इस अदम्य इच्छाशक्ति, निर्भीकता और सकारात्मक दृष्टिकोण से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उसने सहर्ष उसके मृत्युदंड के आदेश को वापस ले लिया और उसे पुनः सम्मानित पद पर बहाल कर दिया।

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