बबीता झा
जून, 2025
एक निर्धन व्यक्ति से एक मुस्लिम व्यक्ति कहता है कि उसे ‘वेटरनरी डॉक्टर’ को देने के लिए एक मृत सूअर चाहिए। यदि वह सूअर मारकर उसे दे दे, तो उसे 5 रुपये मिलेंगे। वह व्यक्ति तैयार हो जाता है। बड़ी कठिनाई से रात के अंधेरे में वह सूअर मारता है और सोचता है कि डॉक्टर इस सूअर का क्या करेगा? फिर स्वयं को तसल्ली देता है कि उसे क्या, उसे तो पैसे मिल रहे हैं।

अगली सुबह दृश्य बदलता है। कांग्रेस की प्रभातफेरी निकल रही है, जिसका उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम समुदायों में शांति स्थापित करना है। तभी उनकी दृष्टि मस्जिद की सीढ़ियों पर रखे मृत सूअर पर पड़ती है। इसके भयानक दुष्परिणामों की कल्पना से वे सिहर उठते हैं। वे विचार-विमर्श करने लगते हैं कि कोई इसे देखे, उससे पूर्व ही इसे यहाँ से हटा दिया जाए। किंतु तभी उन्हें एक गाय के पीछे भागता हुआ व्यक्ति दिखाई देता है—वे समझ जाते हैं कि स्थिति अब उनके हाथ से निकल चुकी है। ‘आकाश में गिद्ध और कौवे लंबे समय तक मँडराएंगे।’ वह व्यक्ति, जिसने चंद रुपयों के लिए उस सूअर को मारा था, अपनी अज्ञानता पर सिर पीट लेता है। नफ़रत और दंगों का एक भयावह दौर पुनः प्रारंभ हो जाता है।
यह मूल कथा है ‘तमस’ की—जो भीष्म साहनी जी का सबसे कालजयी और प्रसिद्ध उपन्यास है। भारत-पाक विभाजन के समय का अंधापन, तर्कहीन भावनाएँ और सांप्रदायिक उन्माद का जीवंत विवरण भीष्म साहनी के लेखन की मुख्य विशेषता है, जो पाठकों को ठहरकर सोचने पर विवश कर देती है। केवल ‘तमस’ ही नहीं, उनकी अन्य रचनाएँ भी इस त्रासदी का सजीव चित्रण करती हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘अमृतसर आ गया है’ में ट्रेन के डिब्बे में बैठे यात्रियों (सरदार जी और दुबला-पतला बाबू) का बदलता व्यवहार यह सोचने पर मजबूर करता है कि लोग किस बात का और किससे प्रतिशोध ले रहे हैं।
भीष्म साहनी के लेखन में यह तीखापन और पैनापन संभवतः इसलिए था क्योंकि उन्होंने स्वयं विभाजन और दंगों के दंश को भोगा था। सब कुछ अपनी आँखों से देखा और महसूस किया था। किंतु उनका यह देखना एक संवेदनशील रचनाकार के तटस्थ दृष्टिकोण से था। इसीलिए भुक्तभो

गी होने के बावजूद वे किसी एक पक्ष का समर्थन न करके इस त्रासदी को धार्मिक चश्मे के बजाय शुद्ध ‘मानवीय दृष्टिकोण’ से देखते हैं।
इसी कारण उन्हें मुंशी प्रेमचंद की परंपरा का संवाहक माना जाता है। अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को उन्होंने कभी अपने साहित्य पर हावी नहीं होने दिया। वामपंथी विचारधारा से गहरे जुड़े होने के बावजूद उनकी रचनाओं में सदैव सार्वभौमिक मानवीय मूल्य ही सर्वोपरि रहे।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी
भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के शीर्ष स्तंभों में से एक थे। वे न केवल एक महान लेखक थे, बल्कि एक कुशल अभिनेता और रंगकर्मी भी थे। उनके उपन्यास ‘तमस’ पर इसी नाम से सुप्रसिद्ध धारावाहिक/फ़िल्म बनी, जिसमें उन्होंने स्वयं भी अभिनय किया था। प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता बलराज साहनी उनके बड़े भाई थे।
व्यक्तिगत जीवन एवं सफर
भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915 को रावलपिंडी (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की शिक्षा वहीं से प्राप्त की। प्रारंभ में वे अवैतनिक रूप से अध्यापन करते थे और जीविकोपार्जन के लिए व्यापार संभालते थे।
भारत आगमन और अध्यापन: देश के विभाजन के पश्चात वे भारत आ गए। यहाँ उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की और समाचार पत्रों में लिखने लगे। इसके साथ ही वे ‘भारतीय जन नाट्य संघ’ (इप्टा – IPTA) से सक्रिय रूप से जुड़े। अंबाला और अमृतसर में अध्यापन के पश्चात वे दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में अंग्रेज़ी साहित्य के प्रोफेसर नियुक्त हुए।
मॉस्को प्रवास: सन 1957 से 1963 (लगभग 6 वर्षों) तक वे मॉस्को में ‘फॉरेन लैंग्वेजेस पब्लिशिंग हाउस’ में अनुवादक के रूप में कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने लगभग 2 दर्जन उत्कृष्ट रूसी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया।
संपादकीय व संगठनात्मक योगदान: सन 1965 से 1967 तक उन्होंने ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका का संपादन किया। वे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ तथा ‘अफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन’ से भी जुड़े रहे। सन 1993 से 1997 तक वे साहित्य अकादेमी की कार्यकारी समिति के सदस्य रहे।
प्रमुख साहित्यिक योगदान
उपन्यास: झरोखे, तमस, बसंती, मय्यादास की माड़ी, कुंतो, नीलू नीलिमा नीलोफर आदि।
कहानी संग्रह: मेरी प्रिय कहानियाँ, भाग्यरेखा, वांगचू, निशाचर, पटरियाँ आदि।
प्रसिद्ध नाटक: हानूश (1977), माधवी (1984), कबीरा खड़ा बाज़ार में (1985), और मुआवज़े (1993)।
बाल साहित्य व आत्मकथा: बाल-कथा ‘गुलेल का खेल’ तथा अपने बड़े भाई पर केंद्रित आत्मकथा ‘बलराज माय ब्रदर’ (Balraj My Brother)।
अनुवाद: लगभग 24 रूसी साहित्यिक कृतियों का हिंदी में प्रामाणिक अनुवाद।
पुरस्कार एवं सम्मान
1975: उपन्यास ‘तमस’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार।
1975: पंजाब सरकार द्वारा ‘शिरोमणि लेखक अवॉर्ड’।
1980: अफ़्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन का ‘लोटस अवॉर्ड’।
1983: ‘सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड’।
1998: भारत सरकार द्वारा देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित।
11 जुलाई 2003 को भीष्म साहनी जी का निधन हो गया, किंतु वे अपने पीछे हिंदी साहित्य की एक अक्षुण्ण और समृद्ध विरासत छोड़ गए।
