भोजन हम जीवन पर्यंत लेते हैं। लेकिन फिर भी क्या खाएँ और कैसे खाएँ, इस संबंध में कुछ जानबूझकर की गई लापरवाही से तो कुछ अनजाने में गलतियाँ करते हैं। भोजन जिस तरह शरीर के लिए आवश्यक है, वैसे ही भजन मन के लिए। लेकिन यहाँ भजन का अर्थ किसी देवता की आराधना में गाए जाने वाले पदों से नहीं है, बल्कि भजन का अर्थ है— वे बातें, विचार या विषय जिन्हें हम हमेशा अपने मन-मस्तिष्क में धारण किए रखते हैं। एक स्वस्थ मस्तिष्क के बिना एक स्वस्थ शरीर की कल्पना नहीं की जा सकती। इसे हम उल्टा भी कह सकते हैं कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है।
भोजन की पाँच सावधानियाँ
पहले बात भोजन की। जीवन चक्र की प्रत्येक अवस्था में हमारे शरीर की एक अलग और विशेष प्रकार की आवश्यकता होती है। इसलिए भोजन के प्रकार में भी अंतर आना स्वाभाविक है। लेकिन जब हम किसी एक प्रकार के भोजन के आदी हो जाते हैं, तो उसे तब तक आसानी से नहीं छोड़ पाते जब तक कि हमें स्वास्थ्य संबंधी कोई परेशानी न हो जाए और डॉक्टर उसे बंद करने की सलाह न दे दें। अगर हम स्वेच्छा से कुछ सावधानियाँ बरत लें, तो संभवतः ऐसे अवसरों की नौबत ही न आए।
सबसे पहले यह देखते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ हमारी भोजन संबंधी आवश्यकताओं में क्या परिवर्तन आते हैं:
- शरीर के हर तंत्र, जिसमें पाचन तंत्र और प्रतिरक्षा तंत्र भी शामिल हैं, की क्षमता कम हो जाती है।
- दाँतों से जुड़ी भी कई तरह की समस्याएँ आने लगती हैं।
- शारीरिक गतिविधियाँ सीमित हो जाती हैं, जिससे शरीर की आवश्यकताएँ बदल जाती हैं।
- इस उम्र तक उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गठिया, हृदय रोग आदि कई तरह की समस्याएँ आ जाती हैं। इसलिए अपनी शारीरिक सीमाओं के अनुसार ही भोजन लेने की विवशता हो जाती है।
- उम्र बढ़ने पर बहुत से लोगों को आर्थिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। इस कारण वे चाहते हुए भी संतुलित आहार नहीं ले पाते।
- कुछ बीमारियों, जैसे पार्किंसंस (Parkinson’s) आदि में लोग भूलने लगते हैं। वे अपने खान-पान का स्वयं ध्यान रखने की स्थिति में नहीं होते।
- कई वरिष्ठ लोग, जिन्हें रात में कम दिखाई देने की समस्या होती है या जिन्हें चलने-फिरने में कठिनाई होती है, वे भोजन और पानी कम करने लगते हैं ताकि उन्हें बार-बार शौचालय न जाना पड़े। प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate gland) का बढ़ जाना या कुछ अन्य समस्याएँ भी होती हैं जिनमें ब्लैडर (मूत्राशय) की क्षमता कम हो जाती है और बार-बार पेशाब जाने की आवश्यकता होती है। ऐसे लोग कई बार जानबूझकर पानी पीना कम कर देते हैं।
- उम्र अधिक होने पर यदि पत्नी की मृत्यु हो जाए या स्त्री स्वयं भोजन बनाने में असमर्थ हो, तब ऐसी स्थिति में जो नया व्यक्ति भोजन बना रहा होता है, वह उनकी पुरानी आदतों को नहीं जानता। फिर उसकी अपनी आदतें और सुविधाएँ भी होती हैं। दूसरी तरफ भोजन करने वाला व्यक्ति अपनी आदतों और उन्हें बदलने की विवशता से उत्पन्न चिड़चिड़ेपन को छोड़ नहीं पाता। कई सामान्य परिवारों में आदतों का यह टकराव गृह-क्लेश का रूप ले लेता है। परिस्थिति के अनुसार अपने स्वभाव और आदतों में बदलाव लाना ही स्वस्थ शरीर और मन का रहस्य है।
वरिष्ठ व्यक्तियों को अपने भोजन में ये सावधानियाँ रखनी चाहिए:
- अपने शरीर की आवश्यकता को समझें: भोजन की मात्रा से अधिक ध्यान उसकी पौष्टिकता पर दें। संतुलित भोजन कैसा हो, यह आपकी शारीरिक स्थिति, दिनचर्या और सामान्य स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। सामान्यतः जिस भोजन में विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा आदि की उतनी मात्रा हो जितनी आपको आवश्यकता है, उसे संतुलित भोजन कहा जाता है। यह अलग-अलग शरीर के लिए अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए— नारियल पानी। इसमें फास्फोरस और कई मिनरल्स की उच्च मात्रा के कारण यह एक स्वस्थ व्यक्ति या मिनरल्स की कमी वाले व्यक्ति के लिए बहुत लाभदायक है। लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को जिसे किडनी की समस्या हो, नारियल पानी बिल्कुल नहीं पीना चाहिए। इसलिए यदि डॉक्टर ने आपको भोजन संबंधी कोई हिदायत दी है, तो उसका पालन अवश्य करें।
- संतुलित भोजन लें: एक स्वस्थ वरिष्ठ व्यक्ति को कम वसा और अधिक पौष्टिकता वाला भोजन लेना चाहिए। भोजन में मौसमी सब्जियाँ और फल, दालें, बीन्स, बीज वाले फल, नट्स, साबुत अनाज, कम वसा वाले दुग्ध उत्पाद, सुपाच्य प्रोटीन आदि शामिल होने चाहिए। फाइबर वाले फल और सब्जियाँ अधिक लें। गेहूँ, ओट्स आदि छिलके सहित हों और चावल व दालें बिना पॉलिश वाली हों तो बेहतर होगा। तली हुई चीजें, गरिष्ठ भोजन (जैसे मांस), डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ, अत्यधिक मीठा, कोल्ड ड्रिंक्स आदि कभी-कभार ही लें।
- आवश्यकतानुसार संपूरक (Supplementary) आहार लें: संतुलित भोजन लेने के बाद भी हो सकता है कि शरीर में कुछ पोषक तत्वों की कमी रह जाए। इसलिए आवश्यकतानुसार विटामिन D, विटामिन B-12, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि सप्लीमेंट्स के रूप में लें। वर्तमान जीवनशैली के कारण हर उम्र के अधिकांश लोगों में विटामिन D की कमी देखी जा रही है। कैल्शियम की कमी युवाओं में भी सामान्य है। लेकिन ध्यान रखें कि ये सप्लीमेंट्स भी आवश्यकता से अधिक मात्रा में न लें।
- डॉक्टर की सलाह के बिना अत्यधिक सप्लीमेंट्स या दवाएँ न लें: कई बार देखा गया है कि तंत्रिका संबंधी या किसी अन्य कारण से हाथ-पैर में कमजोरी आने लगती है। वरिष्ठ व्यक्ति इसे सामान्य कमजोरी समझकर कैल्शियम, विटामिन की दवाएँ या च्यवनप्राश आदि सप्लीमेंट्स केमिस्ट से लेकर अत्यधिक मात्रा में खाने लगते हैं। इससे उनकी मूल बीमारी तो बढ़ती ही है, साथ ही कुछ नई समस्याएँ भी पैदा हो जाती हैं। इसलिए दवाओं या सप्लीमेंट्स की मात्रा का विशेष ध्यान रखें।
- पानी और अन्य तरल पदार्थ पर्याप्त मात्रा में लें: संतुलित भोजन में हम भोजन का तो ध्यान रख लेते हैं, लेकिन पानी और अन्य तरल पदार्थों को भूल जाते हैं। उम्र बढ़ने पर सामान्यतः चार कारणों से लोग पर्याप्त पानी नहीं पीते: (1) खान-पान संबंधी गलत आदतें, (2) संवेदना की कमी (प्यास का अहसास न होना), (3) भूल जाना, और (4) बार-बार पेशाब जाने से बचने के लिए जानबूझकर पानी न पीना। लेकिन शरीर में पानी की कमी कई तरह की बीमारियों और ऊर्जा में कमी का कारण बन सकती है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीएँ। यदि आप ऊपर बताए गए कारणों से पानी नहीं पी पाते, तो अपने पास एक बर्तन (जैसे जग) में कम-से-कम 3 लीटर पानी नापकर रख लें और यह तय करें कि इसे पूरे दिन में समाप्त करना है। पानी बोतल के बजाय गिलास से पीएँ। दिन में पानी अधिक और रात में कम पीएँ। भोजन करने के कम-से-कम आधे घंटे पहले तक पानी न पीएँ। रात का भोजन थोड़ा जल्दी कर लें और उसके आधे घंटे बाद पानी पीएँ। सोने से 2 घंटे पहले पानी पीना बंद कर दें।
भजन (यानि विचारों) की सावधानियाँ
उम्र बढ़ने के साथ-साथ विचार नकारात्मक और जिद्दी होने लगते हैं। इसके मुख्य कारण हैं:
- शारीरिक दुर्बलता और पीड़ा।
- आर्थिक निर्भरता या दुर्बलता।
- परिवार और समाज में अपनी उपयोगिता समाप्त होने का अहसास।
- अपने मित्रों और संबंधियों को एक-एक कर खोना तथा अकेलेपन का भाव।
- अवचेतन मन में मृत्यु का भय।
- जीवन की कटु स्मृतियाँ।
मन का यह स्वभाव है कि इसे जिस दिशा में ले जाया जाए, यह उधर ही दौड़ने लगता है। यदि आप एक बार नकारात्मक सोचने लगें, तो पुरानी से पुरानी नकारात्मक बातें याद आने लगती हैं और उस प्रवाह में सकारात्मक विचार ठहर नहीं पाते। वरिष्ठ व्यक्ति अक्सर अपने दुखों में इतने उलझ जाते हैं कि दूसरों की खुशी से खुद को जोड़ नहीं पाते। कई बार अहम् और झिझक के कारण वे अपने बच्चों से भी मन की बात नहीं कह पाते।
हमारे मस्तिष्क में जो विचार चल रहे हैं, वे किस दिशा में जा रहे हैं, इसके प्रति सचेत रहना आवश्यक है। स्वस्थ विचारों के 5 सूत्र नीचे दिए गए हैं:
- सकारात्मक सोच: हमारी अधिकांश सोच “नकार” वाली होती है; जैसे— “मेरे पास समय नहीं है”, “मेरे पास पैसे नहीं हैं”, “मेरी तबीयत ठीक नहीं है”। इसके स्थान पर यह सोचने का अभ्यास करें कि मेरे पास क्या-क्या है— “मेरे पास परिवार है, अनुभव है, स्वस्थ शरीर है”। जब आपका ध्यान इस बात पर केंद्रित होगा कि आपके पास क्या है, तो आप खुद को बेहतर स्थिति में पाएँगे। हमेशा सकारात्मक और ऊर्जावान लोगों के संपर्क में रहें और नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों से दूरी बनाएँ।
- मस्तिष्क को सक्रिय रखना: शरीर की तरह मस्तिष्क को भी व्यायाम की आवश्यकता होती है। जो लोग एक ही ढर्रे पर जीवन जीते हैं, उन्हें उम्र ढलने पर मानसिक रोग होने की संभावना अधिक होती है। इसके विपरीत, जो लोग मस्तिष्क को नए और चुनौतीपूर्ण कार्यों (जैसे कुछ नया सीखना, शब्द-पहेली या वर्ग-पहेली सुलझाना) में लगाते हैं, उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
- शारीरिक सक्रियता: सही तरीके से टहलना, प्राणायाम और हल्का व्यायाम मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक पाए गए हैं।
- मस्तिष्क को एकाग्र करना: व्यर्थ की बातों से बचने के लिए दिन में कुछ समय मस्तिष्क को बिल्कुल शांत और एकाग्र करने का प्रयास करें। इसे ध्यान या मेडिटेशन कहते हैं। यदि मन अधिक व्यथित हो और ध्यान न लगे, तो अध्यात्म, नाम-जप, पूजा या किसी अच्छी पुस्तक का पाठ करें। इससे ध्यान धीरे-धीरे एकाग्र होने लगता है।
- जीवन में एक उद्देश्य बनाए रखना: जीवन का कोई न कोई लक्ष्य रखना बहुत आवश्यक है। उद्देश्य ऐसा होना चाहिए जो जीवन के अंतिम पड़ाव तक आपका साथ दे और आपको मानसिक रूप से संतुष्टि प्रदान करे।
