सितंबर, 2025

गुरुग्राम, हरियाणा
नमस्कार मित्रों
जैसा कि आप सब जानते हैं कि राष्ट्रभाषा किसी भी देश को एकता के सूत्र में बांधती है। वह हमें हमारी परम्पराओं एवं साहित्य से जोड़ती है। सितंबर का महीना हिंदी भाषा के नाम है, क्योंकि 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। कहीं हिन्दी पखवाड़ा मनाया जाता है तो कहीं पूरा मास हिंदी से संबंधित कार्यक्रमों का आयोजन होता है।
भारत की राजधानी दिल्ली की मुख्यमंत्री सुश्री रेखा गुप्ता का कहना है “हिंदी मन और माटी की भाषा है जिस प्रकार माँ जैसा प्यार कोई और नहीं दे सकता, उसी तरह मातृभाषा का स्थान कोई नहीं ले सकता।”
हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी के शब्दों में “हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति की धरोहर है।” इतिहास साक्षी है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी के जोशीले नारों ने जैसे ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’, ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’, ‘वंदे मातरम्’, भारतीयों के मन में देशभक्ति की अलख जगाई। उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित किया।
परंतु भारत एक बहुभाषी देश है। कश्मीर में कश्मीरी बोली जाती है, पंजाब में पंजाबी, गुजरात में गुजराती, बंगाल में बंगाली और महाराष्ट्र में मराठी बोली जाती है। कहने का अभिप्राय है कि विभिन्न प्रांतों की विभिन्न भाषाएं हैं। ऐसे में राष्ट्रभाषा हिंदी की चुनौतियां बढ़ जाती हैं। पूरे देश को एक भाषा के सूत्र में बांधना कठिन होता जा रहा है।
इसके अतिरिक्त हिंदी के सम्मुख और भी चुनौतियां हैं। पाश्चात्य सभ्यता का आकर्षण बढ़ता जा रहा है। हमारी युवा पीढ़ी हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी को अधिक महत्व देने लगी है। उन्हें लगता है कि अंग्रेज़ी बोलने वाला आधुनिक कहलाता है और हिंदी जानने वाला दकियानुसी। अभिभावक भी अपने बच्चों को अंग्रेज़ी मीडियम वाले स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं।
ब्रेन ड्रेन समस्या ने हिंदी के लिए एक और चुनौती बढ़ा दी है। आजकल का युवा सोचता है कि उसे तो कुछ वर्षो बाद विदेश चले जाना है, फिर वह हिंदी क्यों सीखे। अनेक विद्यालयों में तो बच्चों को हिंदी के स्थान पर जर्मन, फ़्रेंच या रशियन जैसी विदेशी भाषाएं पढ़ने का विकल्प दिया जा रहा है। हमारे युवा हिन्दी फिल्मों और हिंदी गानों पर थिरकना तो खूब जानते हैं, लेकिन शुद्ध हिंदी पढ़ने या सीखने से दूर रहते हैं।
हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में सशक्त बनाना है तो पूरे देश में दसवीं कक्षा तक हिंदी पढ़ना-लिखना अनिवार्य कर देना चाहिए। प्रत्येक प्रांत में अपनी भाषा के साथ साथ हिंदी भी पढ़ाई जानी चाहिए।
यह एक सुखद अनुभूति है कि हिन्दी भाषा भी डिजिटल दुनिया से जुड़ गई है। हिंदी की 500 से अधिक वेबसाइट्स चल रहीं हैं। हिंदी ब्लॉग्स, जनसत्ता, स्पीकिंग ट्री की सहायता से हिंदी प्रेमी विश्व के किसी भी कोने में बैठकर हिंदी की रचनाओं का आनंद ले सकते हैं। गूगल ट्रांसलेटर की सहायता से आप किसी भी भाषा की विषयवस्तु को हिंदी में अनुवादित कर सकते हैं।
कहने का अभिप्राय है कि हिंदी निरंतर विकास के पथ पर आगे बढ़ रही है परंतु उसे अपने ही देश में गैर हिन्दी भाषी प्रांतों में विरोध सहना पड़ता है। मेरे विचार में राष्ट्रभाषा हिंदी एक सशक्त धागा बने जिसमें अन्य भाषाएं रंगबिरंगे मोती जैसी सजी हों। हर भाषा का सम्मान हो। परन्तु राष्ट्रभाषा हिंदी को यथोचित महत्व एवं सम्मान मिले।
धन्यवाद।
