सितंबर, 2023

छात्र- ग्यारहवीं कक्षा
जय नारायण व्यास कॉलोनी, बीकानेर, राजस्थान
अनेक विविधताओं से भरा भारत अपनी ‘अनेकता में एकता’ के लिए जाना जाता है। यही भावात्मक एकता देश को स्वाधीनता की ओर ले गई और आज भारत अपनी आज़ादी की हीरक जयंती (Diamond Jubilee) मना चुका है।
भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य है। संविधान सभा के सदस्य 1935 में स्थापित प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से चुने गए थे। तत्पश्चात, दिसंबर 1946 में संविधान सभा का विधिवत गठन किया गया। कुल 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिनों के अथक परिश्रम व गहन चिंतन के बाद निर्मित संविधान को संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया, जिसे 26 जनवरी 1950 से पूर्णतः लागू कर दिया गया। हमारे दूरदर्शी संविधान निर्माताओं ने भविष्य की चुनौतियों और आवश्यकताओं को परखकर ही इस संविधान की नींव रखी थी।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: एक मौलिक अधिकार
‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ इसी संविधान का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग है। संविधान का अनुच्छेद 19 भारत के सभी नागरिकों को यह मौलिक अधिकार प्रदान करता है कि वे बिना किसी अनुचित दबाव के अपने विचार व्यक्त कर सकें, भाषण दे सकें और किसी भी मुद्दे पर स्वस्थ चर्चा व परिचर्चा कर सकें।
परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या हम इस स्वतंत्रता का उचित और जिम्मेदार उपयोग कर पा रहे हैं? क्या यह स्वतंत्रता केवल कागज़ी है? मेरे विचार से बिल्कुल नहीं! देशवासियों को उनके मौलिक अधिकारों का बोध कराता हमारा संविधान उन्हें यह पूर्ण अधिकार देता है कि यदि उन्हें सरकार या किसी संस्था के किसी निर्णय अथवा नीति से असहमति हो, तो वे तर्कसंगत और शांतिपूर्ण ढंग से उसका विरोध करें तथा उसमें आवश्यक बदलाव या उसे वापस लेने की माँग करें।
वैचारिक दृढ़ता और श्रोताओं का दायित्व
यहाँ यह आवश्यक है कि विचारक या वक्ता मन से सुदृढ़ और सत्य के पथ पर अडिग रहे। जब आप समाज को कोई नई या सही राह दिखाएंगे, तो उँगली उठाने वाले और असहमत होने वाले लोग भी सामने आएँगे। कई बार किसी की बात को दबाने का प्रयास किया जाता है, उसकी गलत व्याख्या की जाती है या उसे डराने-धमकाने की कोशिश होती है।
दूसरी ओर, बहुत बार ऐसा भी देखा गया है कि जब किसी वक्ता के विचार श्रोताओं की भावना के अनुकूल नहीं होते, तो वे उग्र हो जाते हैं और तुरंत सरकार पर यह आरोप लगाने लगते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त हो गई है। जबकि आदर्श स्थिति यह है कि श्रोताओं को वक्ता की बात को केवल एक ‘दृष्टिकोण’ या ‘विचार’ के रूप में ग्रहण करना चाहिए। साथ ही, वक्ता का भी यह नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने तथ्य रखे, न कि श्रोताओं को भड़काने या उकसाने का कार्य करे।
हम भारतीय सिनेमा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक सशक्त उदाहरण मान सकते हैं। इसके साथ ही, हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा संचालित ‘मन की बात’ कार्यक्रम भी देश के युवाओं और आम नागरिकों को अपने विचार साझा करने का एक अनूठा मंच प्रदान करता है, जिससे लोग अपनी अभिव्यक्ति से वंचित न रहें।
स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमाएँ
यह स्मरण रखना अत्यंत आवश्यक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित या निरपेक्ष नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति का अधिकार तो देता है, किंतु अनुच्छेद 19 के खंड 2 से 6 में इस पर उचित प्रतिबंधों (Reasonable Restrictions) का भी स्पष्ट उल्लेख है। देश की संप्रभुता, अखंडता, लोक-व्यवस्था (Public Order), शिष्टाचार और न्यायालय की अवमानना जैसे विषयों के हित में इस अधिकार की अपनी मर्यादाएँ तय की गई हैं।
निष्कर्ष
अंत में निष्कर्ष के रूप में यही कहना समीचीन होगा कि—
“अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अभाव में हम स्वतंत्र रहकर भी मानसिक रूप से परतंत्र हैं।”
अतः प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह परम कर्तव्य है कि वह अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का प्रयोग करते समय इसकी गरिमा, मर्यादा और संवैधानिक सीमाओं का पूर्ण रूप से पालन करे, ताकि हमारा लोकतंत्र और अधिक सशक्त हो सके।
