वृद्धावस्था और व्यवहार परिवर्तन

दिसम्बर, 2022

आभा कुलश्रेष्ठ
गुरुग्राम, सुशांत लोक, हरियाणा

वृद्धावस्था ऐसी अवस्था है जिससे लगभग सभी को गुजरना है। इससे निपटने की जो तैयारी रखते हैं वे समझदार हैं क्योंकि वे जानते हैं इस अवस्था में ऐसा परिवर्तन आयेगा जो मन पसंद न होगा। योगासन अपना कर, भोजन पर, क्रोध आदि पर अंकुश लगा कर स्वस्थ शरीर एवं स्वस्थ मानसिकता रखने वाले वृद्ध समाज व परिवार के लिए उपयोगी भी होते हैं।
हमारे आध्यात्म जगत में आत्मा को शरीर से ऊँचा स्थान दिया गया है जबकि सांसारिक कार्यों को हम प्रत्यक्ष रूप में शरीर से ही सम्पन्न करते हैं अतः शरीर बहुत महत्वपूर्ण है। वृद्धावस्था में व्यवहार में परिवर्तन भी शरीर के परिवर्तन के अनुसार ही आता है जिसमें बीमारियां, मानसिक व शारीरिक शक्ति का ह्रास, आदि होती हैं। इसके अतिरिक्त अकेलापन, प्रेम की कमी, दूसरों पर निर्भरता आदि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनसे आम तौर पर हर वृद्ध जूझता है।
वृद्धों को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है। एक वे जो वृद्धावस्था में भी शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं; दूसरे वे जो दोनों ही अथवा एक तरह से अस्वस्थ होते हैं। तीसरे वे जो बीमारियों के कारण बिस्तर पकड़ लेते हैं।
जीवन के उतार-चढ़ाव से गुजरता व्यक्ति दैविक, दैहिक व भौतिक तापों से बचते यदि वृद्धावस्था में पहुंच भी गया तो जीवन शक्ति में कमी होने के कारण वह उतना प्रसन्न नहीं रह पाता जितना वह तब हुआ करता था जब वह युवा व स्वस्थ था। धीरे-धीरे बीमारियां घेरने लगती है क्योंकि शरीर एक मशीन है जो धीरे-धीरे घिसकर कमजोर हो जाता है। अतः अस्वस्थता व्यक्ति को चिड़चिड़ा और दुनियादारी से विरक्ति बना देती है। सुख व दुख का असर भी उन पर कम होता है। अनेक वृद्धों को मैंने ये कहते सुना है कि अब जीवन में क्या बचा है अब वो मरना चाहते हैं। शायद शरीर व लोगों से मोहभंग होने के कारण।
शरीर से वृद्ध व्यक्ति मन से बच्चे होते हैं। ऐसा भी कहा जाता है की अगर कोई थोड़ा-सा कोई सम्मान दे दे, हँस कर बात कर ले, गिफ्ट मिल जाए, उतने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। बहुत बड़ी खुशियां उन्हें नहीं चाहिए। कुछ बुजुर्ग, जो अकेलेपन के शिकार होते हैं अंतर्मुखी हो चुप्पी साध लेते हैं। कुछ ज़िद्दी भी हो जाते हैं। जिन्होंने सारा जीवन घर और बाहर रौब दिखाया हो, दूसरों पर मनमानी थोपी हो; वृद्धावस्था में जब उन्हें महत्त्व नहीं मिलता तो ज़िद्दी और हठी हो सकते हैं या फिर मौन धारण कर अंतर्मुखी हो सकते हैं क्योंकि उन्हें पता है जीवन साथी ये व्यवहार सह सकता है लेकिन बच्चे अपशब्द भी कह सकते हैं।
वृद्धावस्था में जीवन साथी से बिछुड़ना सब कुछ लुट जाने के समान होता है। उसकी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। स्त्री हो या पुरुष, अकेलेपन से त्रस्त हो जाते हैं। अधिक उम्र में अकेलेपन से बचने के लिए पश्चिमी सभ्यता की नकल कर कुछ लोग दूसरी शादी भी कर रहे हैं लेकिन ऐसा सावधान रहते हुए व बच्चों की सम्मति से ही करना उचित है। हालाँकि ये कहना विषय से परे है लेकिन कुछ वृद्धों से सम्पत्ति के लालच में धोखा होता है।
जब बच्चे छोटे होते हैं माता-पिता के पास समय नहीं होता। वे नौकरों या दादी-दादा के सानिध्य में पलते हैं। बड़े होने पर बच्चों के पास उनके लिए समय नहीं होता। अगर अच्छा कमाते हैं तो ओल्ड एज होम में माता पिता को रख दिया जाता है। अगर वहाँ का वातावरण अच्छा है तो ये अच्छा विकल्प है बजाय इसके कि घर में रख कर माता पिता पर ध्यान न दिया जाए।
जिन लोगों को घूमने फिरने का शौक होता है यदि वे शारीरिक लाचारी के कारण घर में ही सिमट जाते हैं तो ये उन्हें दुखी करता है। वे सदा पुरानी बातें किया करते हैं। इसीलिए वृद्धो को पुरानी बातें लोगों को बताना अच्छा लगता है। सुन्दरता समाप्त हो जाना, विशेषरूप से स्त्रियों के लिए, दुखदाई और अवसाद में जाने का करण बनता है। एक पंक्ति याद आ रही है “मन को घायल कर जाता है तन पर हंसता दर्पण”।
खाने-पीने के शौकीन लोग वृद्धावस्था में सादा भोजन व दवाईयों पर सिमट जाते हैं। कई लोग बिस्तर पर सारा जीवन दूसरों पर बोझ बन गुजारते हैं। जो लोग मल-मूत्र त्याग व भोजन के लिए आवाज लगाते रहते हैं, दूसरों पर निर्भरता का कष्ट कोई उनसे पूछे।
अनेक उदाहरण मेंने अपने जीवन में देखें हैं। वास्तव में ये मार्मिक विषय है। वृद्धों की दशा जानने के लिए घर-घर सर्वे की आवश्यकता है लेकिन क्या घरवालों के सामने वे अपनी परेशानियां बता पायेंगे, ये भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
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