गुप्ता जी और मिश्रा जी, राज्य सरकार के एक ही विभाग में क्लर्क के रूप में 35 वर्ष की सेवा देने के बाद एक साथ रिटायर हुए। दोनों की जॉइनिंग भी साथ हुई थी। दोनों समवयस्क थे, इसलिए उनके बच्चों की उम्र भी लगभग एक समान थी।
एक साधारण पारिवारिक जीवन बिताते हुए दोनों का सपना बस इतना-सा था कि रिटायर होने तक बच्चे अपने-अपने जीवन में सेटल हो जाएँ, ताकि सेवानिवृत्ति के बाद वे तनावमुक्त जीवन बिता सकें।
गुप्ता जी के दो बेटे थे। दोनों प्राइवेट नौकरी करते थे और अपने परिवार के लायक कमा लेते थे, लेकिन छोटे बेटे की आमदनी कम थी। गुप्ता जी समय-समय पर उसकी आर्थिक सहायता करते रहते थे। रिटायर होने के बाद मिले पैसों से उन्होंने एक आरामदायक घर बना लिया और सोचा कि पेंशन से उनका और उनकी पत्नी का गुजारा आराम से हो जाएगा। लेकिन आर्थिक मंदी के दौर में उनके बड़े बेटे की नौकरी चली गई। छोटे बेटे की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। गुप्ता जी दोनों बेटों की आवश्यकतानुसार सहायता करने का प्रयास करते थे। इससे एक तरफ तो उनकी पेंशन पर दबाव पड़ने से आर्थिक तंगी होने लगी, वहीं दूसरी तरफ दोनों बेटे पिता पर एक-दूसरे के प्रति पक्षपात का आरोप लगाने लगे। फलस्वरूप, पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण हो गया।
मिश्रा जी ने भी गुप्ता जी की तरह बेटियों की शादी की और बेटों को व्यवसाय के लिए पैसे देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया। उन्हें इस बात का संतोष था कि रिटायर होने तक वे अपनी सभी जिम्मेदारियाँ निभा चुके थे। केवल एक ही जिम्मेदारी बाकी थी— बेटे द्वारा घर खरीदने के लिए लिए गए बैंक लोन की किस्तें। उस समय बेटे ने सोचा था कि बैंक लोन से घर खरीदने पर किराया बचेगा, जिससे लोन चुकता हो जाएगा। लेकिन उसकी आय इतनी पर्याप्त और स्थायी नहीं थी कि बैंक उसे लोन देता, इसलिए उसने पिता से सहायता माँगी। पिता तैयार हो गए। लेकिन एक बेटे को घर के लिए पैसे देकर दूसरे को न देना उचित नहीं लगता, इसलिए रिटायरमेंट के बाद उन्होंने दूसरे बेटे को भी पैसे दिए। इस तरह उनके पास केवल पेंशन बची, जिसमें से बैंक की किस्त भी जाती थी। ऐसे में जब उनकी पत्नी को लिवर की गंभीर बीमारी हुई, तो इलाज के लिए फिर कर्ज लेना पड़ा। अब कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया कि वे अपने इलाज के लिए भी तंगी महसूस करने लगे।
इन दोनों से अलग दुबे जी की कहानी है। वे एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छे पद पर थे। उनकी तीन बेटियाँ थीं, जिनकी शादी उन्होंने अच्छे घरों में कर दी थी। कंपनी रिटायरमेंट के बाद पेंशन नहीं देती थी, लेकिन उन्होंने नौकरी के दौरान ही एक अच्छा घर बना लिया था, जिसकी एक मंज़िल किराए पर दी हुई थी। जमा पूँजी भी अच्छी-खासी थी। उन्हें विश्वास था कि किराए और बैंक के ब्याज से इतना पैसा आ जाएगा कि उन्हें या उनकी पत्नी को कभी बेटियों या दामादों के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। लेकिन जिस किडनी की बीमारी ने उनकी जान ली, उसने उनकी अधिकांश बचत भी समाप्त कर दी। उनकी मृत्यु के बाद पत्नी के पास गुजारे का एकमात्र स्रोत घर का किराया ही बचा। अब उनकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती। तीनों बेटियाँ चाहती हैं कि माँ उनके पास आकर रहें, लेकिन आने से पहले उस घर को बेचकर पैसे तीनों में बाँट दिए जाएँ।
ये कुछ सामान्य उदाहरण हैं, जो आम जीवन में अक्सर देखने को मिलते हैं। पूरी तैयारियों के बावजूद, वृद्धावस्था में उम्मीद के विपरीत आर्थिक कठिनाइयाँ आने लगती हैं। ये उदाहरण ऐसे लोगों के हैं, जिन्हें हम आर्थिक रूप से “सुरक्षित” श्रेणी में रखते हैं।
कुल वरिष्ठ जनसंख्या में ऐसे लोगों की संख्या मात्र 41.43% है, जिन्हें किसी-न-किसी रूप में पेंशन मिलती है। इस उम्र में आर्थिक सुरक्षा का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत किराया है। करीब 12% वरिष्ठ लोगों का गुजारा किराए से होने वाली आय से होता है। शेष के पास आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं होता और वे पूरी तरह दूसरों पर निर्भर रहते हैं।
एक अध्ययन के अनुसार, देश में 26.03% वरिष्ठ नागरिक आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं, 20.3% आंशिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, जबकि 53.4% पूरी तरह अपने बच्चों पर निर्भर हैं।
वरिष्ठ नागरिकों में आर्थिक कठिनाई के कारण
वरिष्ठ लोगों के विषय में सामान्यतः यह माना जाता है कि वे बच्चों पर निर्भर होते हैं, लेकिन अध्ययन बताते हैं कि बहुत-से वरिष्ठ लोग इस उम्र में भी अपने बच्चों की जिम्मेदारियाँ उठाते हैं। पेंशन या किराए से होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा लोन चुकाने या बच्चों के परिवार पर खर्च हो जाता है। भारत में इसका सटीक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन अमेरिका में हुए एक अध्ययन के अनुसार करीब 33% वरिष्ठ नागरिक वह कर्ज चुका रहे हैं, जो उनके बच्चों ने लिया था। आवश्यकता के समय बच्चों की मदद करना गलत नहीं है, लेकिन जब इन बुजुर्गों को स्वयं पैसों की जरूरत पड़ती है, तो वे कठिनाई में पड़ जाते हैं। कई बार उनके साथ दुर्व्यवहार भी होता है।
अमेरिका के The National Council on Aging के सर्वे के अनुसार— कम जमा पूँजी, निश्चित निवेश पर कम ब्याज दर, कर्ज और अनसेटल्ड बच्चे— 60 से अधिक आयु वर्ग के लोगों के लिए आर्थिक समस्या के मुख्य कारण हैं। इसी सर्वे के अनुसार, एक-तिहाई वरिष्ठ नागरिक गिरवी रखे गए या लोन पर लिए गए घर की किस्तें अब भी भर रहे हैं। ये घर या तो उनके बच्चों के लिए हैं, या पोते-पोतियों के लिए, अथवा उनके अपने लिए। Pew Research Center के एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 40% वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों के बिलों के भुगतान में मदद करते हैं। ये ऐसे अनपेक्षित खर्च होते हैं, जो उनकी बचत और रिटायरमेंट योजनाओं को प्रभावित करते हैं।
वास्तव में वरिष्ठ नागरिकों में आर्थिक कठिनाई के 7 सबसे सामान्य कारण हैं:
- कम आय और कम बचत
- स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में वृद्धि
- घर की कमी या घर का लोन
- बच्चों की उन पर निर्भरता
- अपने वित्तीय दस्तावेजों और व्यवसायों को व्यवस्थित न रख पाना
- वित्तीय धोखाधड़ी
- सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की कमी
इनके अलावा कुछ अन्य कारण भी समस्या बढ़ाते हैं; जैसे— ऐतिहासिक रूप से कम ब्याज दरें, शेयर बाजार की अस्थिरता, सामाजिक सुरक्षा की कमी, विपरीत जॉब मार्केट, युवाओं का पलायन और अपर्याप्त आवास आदि। यद्यपि वृद्धाश्रम कोई आदर्श व्यवस्था नहीं है, फिर भी इनकी संख्या आवश्यकता की तुलना में बहुत कम है। प्राइवेट वृद्धाश्रम इतने महँगे हैं कि साधारण व्यक्ति उनके बारे में सोच भी नहीं सकता। अधिकांश राज्यों में मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन भी आवश्यकता से बहुत कम है।
आर्थिक कठिनाई कम करने के उपाय: स्वर्णिम नियम (Golden Rules)
1. संबंधों और संपत्ति में संतुलन उम्र बढ़ने पर जब शरीर साथ छोड़ने लगता है, तब पैसों की जरूरत तो होती ही है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरत किसी ऐसे व्यक्ति की होती है, जो अपनत्व, प्रेम और सम्मान के साथ देखभाल कर सके।
कुछ लोग सोचते हैं कि पैसा होगा तो देखभाल करने वाले मिल जाएँगे, जबकि कुछ लोग अपने पास कुछ न रखकर सारा पैसा बच्चों की जिम्मेदारियों में खर्च कर देते हैं। इन दोनों अतिवादी विचारों से बचना चाहिए। यदि बच्चों को अच्छे संस्कार दिए गए हैं और उनकी समस्याओं को समझा गया है, तो वे आवश्यकता पड़ने पर अपनी जिम्मेदारी जरूर निभाएँगे। अपने पोते-पोतियों की चिंता उनके माता-पिता पर छोड़ दें। अपने लिए कुछ पैसे जरूर बचाकर रखें, क्योंकि हो सकता है कि जरूरत के समय बच्चे चाहकर भी मदद न कर पाएँ या आपकी आवश्यकताओं को न समझ पाएँ। इसलिए संबंधों और संपत्ति में संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।
पश्चिमी देशों के विपरीत, हमारे देश में अधिकांश वरिष्ठ नागरिक परिवार के साथ ही रहते हैं। विशेषकर जब दंपत्ति में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है, तो दूसरा बच्चों के साथ रहने लगता है। ऐसे में स्वेच्छा से या दबाववश वे अपनी संपत्ति या बचत बच्चों को दे देते हैं। देश में 2.2% वरिष्ठ नागरिक अकेले और करीब 10% केवल अपने पति या पत्नी के साथ रहते हैं। वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा घर बनाने या खरीदने में लगा देते हैं, लेकिन बाद में बच्चों पर निर्भर हो जाते हैं। कई बार तो उन्हें उसी घर से बेदखल कर दिया जाता है। इसलिए अपनी पूरी संपत्ति या जमा पूँजी किसी को न दें, ताकि दूसरों पर निर्भर न होना पड़े। आय और व्यय में भी संतुलन बनाए रखें।
2. स्वास्थ्य खर्चों को कम और व्यवस्थित करना उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती हैं। संतुलित भोजन, शारीरिक व मानसिक सक्रियता, उचित आराम और नियमित दिनचर्या से शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है। इस उम्र में गिरने या हल्की चोट से भी हड्डी टूटने का जोखिम रहता है, इसलिए विशेष सावधानी बरतें। तंबाकू और शराब जैसे मादक पदार्थों से परहेज करें। इन प्रयासों से स्वस्थ रहकर इलाज के खर्चों को कम किया जा सकता है। इसके अलावा, अचानक आने वाली बीमारियों के खर्च से बचने के लिए स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) अवश्य लें।
3. आर्थिक दस्तावेजों को व्यवस्थित रखना माता-पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी पारिवारिक कलह का बड़ा कारण बनती है। बच्चे एक-दूसरे के प्रति पक्षपात का आरोप लगाते हैं। अव्यवस्थित दस्तावेजों के कारण माता-पिता के बाद बच्चों को कानूनी परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। इसलिए जमीन, मकान, दुकान, बैंक खाते, लॉकर और कर्ज के लेनदेन से जुड़े दस्तावेजों को शुरू से व्यवस्थित और सुरक्षित रखें। इन्हें डिजिटल रूप में ऑनलाइन भी सहेजा जा सकता है। भविष्य के विवादों से बचने का सबसे सही तरीका है— अपनी वसीयत (Will) समय पर बनवा लेना।
4. अपनी जिम्मेदारियों के लिए प्रतिनिधि चुनना कई लोग अपने सारे काम खुद ही करते हैं और किसी को अपना विश्वासपात्र नहीं बनाते। ऐसे में आकस्मिक दुर्घटना, बीमारी या शारीरिक/मानसिक क्षमता कम होने पर उनके वित्तीय कार्य अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। इसलिए किसी विश्वसनीय व्यक्ति को अपने कार्यों की जानकारी दें और धीरे-धीरे कुछ जिम्मेदारियाँ सौंपें। यदि आप कोई व्यवसाय चलाते हैं, तो लेन-देन, बैंक एफडी (FD) और निवेश की जानकारी अपने किसी भरोसेमंद व्यक्ति को ज़रूर दें, ताकि जरूरत पड़ने पर वह कार्य सँभाल सके।
इसके अलावा, आजकल वरिष्ठ नागरिक मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग करने लगे हैं, जिससे वे ऑनलाइन ठगी के ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन रहे हैं। अनजान लोगों और संदिग्ध संदेशों पर आँख मूँदकर भरोसा न करें।
अन्य आवश्यक सावधानियाँ:
- घर के “मुखिया” की भूमिका से धीरे-धीरे हटकर बच्चों के “सलाहकार और मित्र” की भूमिका में आ जाएँ।
- अधिक उम्र होने पर उच्च जोखिम वाले निवेश से बचें।
- जहाँ तक संभव हो, कर्ज लेने से बचें।
- एक छोटा ही सही, पर घर अपने नाम पर अवश्य रखें।
- घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखें, पड़ोसियों और मित्रों से मिलते-जुलते रहें।
- आवश्यकता पड़ने पर सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएँ।
- बच्चों के बच्चे होने पर उन्हें उनका स्पेस (Space) दें और उनकी जिम्मेदारियाँ अपने सिर पर न लें।
