दिसंबर, 2025

“हरि अनंत हरि कथा अनंता…”
भक्ति साहित्य में जब-जब तुलसीदास जी का नाम लिया जाता है, तब-तब उनके समकालीन या पश्चातवर्ती अनेक संतों की तपस्या, साधना और साहित्यिक योगदान कहीं छाया में रह जाते हैं। ऐसी ही एक विलुप्त होती प्रकाश-रेखा हैं संत बनादास जी, जिन्होंने अपने समस्त जीवन और लेखनी को रामभक्ति को समर्पित कर दिया, किंतु आज उनकी रचनाएँ उपेक्षा और अनभिज्ञता के कारण गुमनामी के अंधकार में खोती जा रही हैं।
संत बनादास जी का जन्म सन् 1821 में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के अशोकपुर गाँव में हुआ था। बचपन से ही वे धार्मिक प्रवृत्ति के थे। युवावस्था में उन्होंने भिनगा (बहराइच) राज्य की सेना में भी सेवा दी। लेकिन जीवन की दिशा तब पूरी तरह बदल गई जब उनके इकलौते पुत्र का निधन मात्र 12 वर्ष की आयु में हो गया।
वर्ष 1851, पुत्रशोक से व्यथित बनादास जी अपने पुत्र के शव के साथ अयोध्या पहुँचे। अंतिम संस्कार के उपरांत उन्होंने वहीं निवास करना शुरू कर दिया और रामघाट पर एक कुटी बनाकर कठोर तपस्या में लीन हो गए। वर्षों की साधना और आत्मसमर्पण के बाद उन्हें रामदर्शन की दिव्य अनुभूति प्राप्त हुई। बनादास जी स्वयं को विद्वान नहीं मानते थे। उन्होंने लिखा:
“काव्य ग्रंथ नहि कर छुयों, नहि विद्या अधिकार।
मति ऊंचि गति अवर नहि, उर प्रेरक सरकार॥’’
किन्तु ईश्वरीय प्रेरणा से उनकी लेखनी ऐसी प्रवाहित हुई कि उन्होंने 64 ग्रंथों की रचना कर डाली। उनका साहित्य केवल रामभक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें वेदांत, आत्मबोध, नीति, दर्शन और संत साहित्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं: रामछटा, अनुराग विवर्धक रामायण, आत्मबोध, नाम मुक्तावली, ब्रह्मायन वेदांत ग्रंथमाला, संत समिरनी, विस्मरण सम्हार। दुर्भाग्यवश, इन 64 ग्रंथों में से अब तक केवल दो ही प्रकाशित हो सके हैं; शेष पांडुलिपियाँ उपेक्षा के कारण नष्ट होने की कगार पर हैं।
संत बनादास जी का जीवन धन, यश और वैभव से कोसों दूर रहा। एक बार जब रीवा नरेश उन्हें 10,000 रुपये भेंट स्वरूप देने आए, तो उन्होंने विनम्रता से यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया:
“जांचब जाब जमाति जर, जोरु जाति जमीन।
जतन आठये जरर सम, बनादास तजिदीन॥’’
उन्होंने अयोध्या में तुलसी उद्यान के निकट भवहरण कुंज नामक आश्रम की स्थापना की और जीवन पर्यंत भजन, सत्संग और साहित्य सेवा में लीन रहे। उनका साकेतगमन सन् 1892 में हुआ।
रामलला की अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के बाद एक बार फिर देशभर में राम नाम की गूंज सुनाई दे रही है। यह समय है भक्ति साहित्य के पुनर्जागरण का — और यह तभी संभव होगा जब तुलसी, सूर, कबीर के साथ-साथ बनादास जैसे उपेक्षित संतों की साहित्यिक विरासत को भी उचित स्थान दिया जाए। उनके ग्रंथों का डिजिटलीकरण, संरक्षण और प्रकाशन न केवल आज की पीढ़ी को भक्ति का मार्ग दिखाएगा, बल्कि उन्हें भारतीय अध्यात्म और सांस्कृतिक परंपरा की गहराई से भी परिचित कराएगा। राम नाम — जपने की ही नहीं, समझने की भी वस्तु है।
जैसा कि संत बनादास जी ने लिखा:
“हरि कृपा जब होइ, तब पंथ चलै सच्चा।
न ध्यान रहे निज तन को, न मोह रहे कच्चा॥’’
संत बनादास जी के साहित्य को संग्रहालयों और शोध प्रबंधों तक सीमित न रखते हुए उसे जन-जन तक पहुँचाया जाए। राम नाम पर रचित साहित्य की प्रासंगिकता ‘राम-राम’ से लेकर ‘राम नाम सत्य है’ तक बनी रही है — और बनी रहेगी।
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