सितंबर, 2022
महाभारत के एक बहुत ही विशिष्ट पात्र कर्ण हैं। वे एक अद्वितीय वीर और दानवीर थे, लेकिन इतिहास में नायक के बजाय एक दुखांत नायक (tragic hero) के रूप में याद रखे गए। इसका कारण सामाजिक पदानुक्रम में उनका तथाकथित छोटी (शूद्र) मानी जाने वाली “सूत” जाति से होना माना जाता है। ऐसा स्वयं कर्ण भी मानते थे। उनका यह मानना कितना सही था, इसकी तुलना उस समय के ही दो अन्य पात्रों से करके देखी जा सकती है। पहले पात्र थे स्वयं भगवान कृष्ण और दूसरे पात्र थे, रोमहर्षण सूत।
जब द्रौपदी ने कर्ण को स्वयंवर में भाग लेने से मना कर दिया, तब इस अपमान से व्यथित होकर उन्होंने दुर्योधन द्वारा दिए गए “अंग” देश का राज्य स्वीकार कर लिया और स्वयं को राजवंशियों के समकक्ष बनाने का प्रयास किया। ऐसा करके उन्होंने अपने समस्त पराक्रम को दुर्योधन के अहसान तले दबा दिया। उनमें इतनी क्षमता थी कि वे अपने बल पर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया; क्योंकि उनमें इतनी सहनशक्ति नहीं थी कि वे एक स्त्री द्वारा किए गए अपमान को सह सकें और शांत होकर अपने पराक्रम के सही उपयोग के बारे में सोच सकें।
जाति के मामले में कृष्ण भी तीसरे वर्ण में आते थे। उनका बचपन एक ग्वाल-मुखिया के घर साधारण गोपालकों के बीच ही बीता था। यहाँ तक कि कंस का वध करने तक उन्होंने न तो कोई औपचारिक शिक्षा ली थी और न ही युद्ध या किसी अन्य प्रकार का कोई प्रशिक्षण। कृष्ण का वंश भी कोई बहुत अधिक प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था। शिशुपाल और जयद्रथ जैसे प्रतिद्वंद्वी उन्हें कई बार कुल को लेकर ताने भी मारते थे।
लेकिन कृष्ण ने कभी इन तानों को गंभीरता से नहीं लिया; न ही कभी उनका आत्मविश्वास कम हुआ और न ही समाज के प्रति कोई द्वेष भाव आया। गोवर्धन पर्वत को उँगली पर उठाने का सामर्थ्य रखने के बाद भी कृष्ण को रणभूमि से हटकर “रणछोड़” कहलाने में कोई संकोच नहीं हुआ, क्योंकि कभी-कभी पीछे हटना या अपमान सह लेना भी दीर्घकालिक विजय के लिए आवश्यक होता है। शायद यही बात कर्ण नहीं समझ सके थे।
यदि मान भी लें कि कृष्ण भगवान थे और कर्ण की तुलना उनसे नहीं की जा सकती, तो दूसरा उदाहरण एक अन्य “सूतपुत्र” रोमहर्षण का है। यदि शूद्र वर्ण के लिए क्षत्रिय का कर्तव्य वर्जित था (जैसा कि कर्ण मानते थे), तो ब्राह्मणों के लिए निर्धारित धर्म-ग्रंथों का पठन-पाठन भी अनुमत नहीं होना चाहिए था। लेकिन उस दौर में भी रोमहर्षण ने न केवल इन ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त किया, बल्कि ब्राह्मणों को भी इन ग्रंथों का उपदेश दिया। वे संभवतः भारत के सबसे सफल कथावाचक हुए। इतना ही नहीं, उसी समाज के ब्राह्मणों ने उन्हें “ब्राह्मण” का पद भी प्रदान किया।
सामाजिक स्तर पर ये तीनों लगभग समान पृष्ठभूमि से थे, लेकिन इनकी सोच ने इन्हें अलग बनाया। कर्ण में हमेशा यह हीनभावना रही कि वे जो सम्मान या उपलब्धि पाने के अधिकारी थे, वह केवल अपनी निम्न जाति के कारण नहीं पा सके। उच्च जाति का “न होने” का भाव उनमें इतना गहरा था कि वे अपने शौर्य और सद्गुणों के “होने” का लाभ नहीं उठा सके। स्पष्ट है कि कर्ण केवल इस बात पर ध्यान देते रहे कि उनके पास क्या “नहीं है”, जबकि कृष्ण और रोमहर्षण जैसे लोग यह सोचते थे कि उनके पास “क्या है”।
हम लोग भी अपने जीवन में अक्सर यही करते हैं। हमारे पास जो नहीं होता, हम उसी के विषय में अधिक सोचते हैं; जबकि प्रकृति का नियम है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही फल पाते हैं। इसलिए क्यों न हम उन वस्तुओं, क्षमताओं और गुणों पर अपना ध्यान केंद्रित करें, जो हमारे पास हैं।

