सितंबर, 2022

हैदराबाद
बारह ज्योतिर्लिंगों में से दूसरा है श्रीशैलम स्थित मल्लिकार्जुनम्। पुराणों के साथ-साथ, इतिहास के पन्नों में भी इस पवित्र धाम का अपना विशिष्ट महत्व है। आंध्रप्रदेश के कर्नूल जिले में नल्लमलै के नाम से विख्यात पूर्वी घाटियों के सघन वनों में स्थित इस पावन धाम में कृष्णा नदी पाताल गंगा के नाम से उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित है।
इस प्रदेश में भगवान शंकर कुछ लघु आकार में मल्लिकार्जुन के नाम से और माता पार्वती भ्रमरांबा के नाम से विराजमान हैं। इस प्रदेश की गणना ज्योतिर्लिंगों में से एक के रूप में ही नहीं बल्कि भ्रामरी शक्तिपीठ के रूप में भी की जाती है।
भूलोक के कैलाश कहलाने वाले श्रीशैलम धाम की गणना पृथ्वी मंडल की “नाभि” के रूप में होती है। अखंड शिला से बनी नंदी की मूर्ति के दर्शन के पश्चात ही शिवजी के दर्शन किये जाते हैं। यहाँ सहस्र लिंग स्थापित हैं।
त्रेतायुग में भगवान राम ने रावण (ब्राह्मण) के वध के कारण लगे दोष का निवारण करने के लिए शिवलिंग की स्थापना की थी। फिर भी बचे पाप के अंश को मिटाने के लिए यहाँ विराजमान मल्लिकार्जुन के दर्शन करने आये थे।
एक ही पंक्ति में पाँच पाण्डवों से स्थापित शिवलिंग हैं। मंदिर के प्रांगण में स्थित बिल्व वृक्ष के नीचे दत्तात्रेय ने तप किया था और उन्हें ज्ञान की सिद्धि हुई थी।
आदि शंकराचार्य जी ने इसे अपनी तपोभूमि बनाकर शिवानंदलहरी और सौंदर्यलहरी स्तोत्रों की रचना की थी।
तेलुगु और कन्नड भाषाओं में विस्तृत साहित्य श्रीशैलम और यहाँ विराजमान शिव और पार्वती की महिमाओं के संबंध में रचा गया है।
श्रीशैलम मंदिरों के साथ-साथ मठों के लिए भी प्रसिद्ध है। इनकी संख्या कभी सौ से अधिक थी। पर आज इक्के-दुक्के ही बचे हैं।
यहाँ विराजमान साक्षी गणपति भक्तों के आगमन के बारे में कैलाश में शिवजी को संदेश पहुंचाने का भार उठाते हैं।
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