मिसाइलमैन ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’: डॉ अब्दुल कलाम

दिसंबर, 2023
बबीता झा

वर्तमान उत्तराखंड का एक पवित्र शहर ऋषिकेश और गंगा का सुरम्य तट—जहाँ एक युवक अत्यंत बेचैन सा टहल रहा था। उसका ध्यान प्रकृति के सौंदर्य पर नहीं, बल्कि अपने जीवन की उलझनों पर था।


वह सुदूर दक्षिण के समुद्र तटीय जिले रामेश्वरम से यहाँ भारतीय वायुसेना (Dehradun) में पायलट पद का साक्षात्कार देने आया था। उसका परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं था। उसके पिता की आय का मुख्य साधन मछुआरों को नाव किराए पर देना था, जिससे नाममात्र की कमाई होती थी। उस युवक की बहन ने अपने सोने के गहने गिरवी रखकर उसे ऋषिकेश भेजने के लिए पैसों का प्रबंध किया था। युवक ने पैसे केवल जाने के लिए ही लिए थे, क्योंकि उसे पूर्ण विश्वास था कि उसे नौकरी मिल जाएगी। किंतु, उसका चयन नहीं हो सका (वे 9वें स्थान पर रहे और केवल 8 सीटें उपलब्ध थीं)।
अब उसके पास वापस घर लौटने के पैसे भी नहीं थे। निराशा के उस घने अंधकार में उसके मन में गंगा में डूबकर जीवन लीला समाप्त कर लेने का विचार आ रहा था। तभी वहाँ से गुज़र रहे एक संत (स्वामी शिवानंद) की दृष्टि उस युवक पर पड़ी। वे उसे अपने आश्रम ले गए, भोजन कराया और दिलासा देते हुए कहा—”एक नौकरी न मिलने से जीवन समाप्त नहीं हो जाता। ईश्वर ने निश्चित ही तुम्हारे लिए कुछ और, कुछ नया और कुछ बहुत बड़ा तय कर रखा होगा।” संत के विचारों से संबल पाकर वह युवक एक नए मनोबल के साथ वापस लौट आया।
प्रारंभिक जीवन, सादगी और शिक्षा
उस युवक का नाम था अबुल पकीर जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम, जिन्हें संपूर्ण विश्व ‘मिसाइल मैन’ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से जानता है।
जन्म: उनका जन्म तमिलनाडु के रामेश्वरम जिले के धनुषकोडी (Rameswaram) गाँव में 15 अक्टूबर 1931 को हुआ था।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: पाँच भाइयों और पाँच बहनों वाले बड़े परिवार में पिता की आय बहुत सीमित थी। यद्यपि उनके पिता अधिक शिक्षित नहीं थे, किंतु उनके विचार अत्यंत उच्च और उदार थे। इन्हीं पारिवारिक संस्कारों ने बालक कलाम के जीवन में सादगी, अनुशासन और मूल्यों की नींव रखी।
शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम में पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से स्नातक और मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की।
वैज्ञानिक यात्रा: ‘मिसाइल मैन’ के रूप में पहचान
ऋषिकेश से लौटने के बाद उन्होंने पायलट बनने के बजाय अपना पूरा ध्यान अंतरिक्ष और रक्षा अनुसंधान की ओर मोड़ दिया:
‘रोहिणी’ उपग्रह (1980): भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV-3) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में उन्होंने ‘रोहिणी’ उपग्रह का सफल प्रक्षेपण कराया।
मिसाइल कार्यक्रम (DRDO): रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में रहते हुए उन्होंने ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ जैसी स्वदेशी मिसाइलों के निर्माण का सफल नेतृत्व किया।
पोखरण-द्वितीय (1998): राजस्थान के पोखरण में वर्ष १९९८ में हुए द्वितीय सफल परमाणु परीक्षण (‘ऑपरेशन शक्ति’) में उन्होंने वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में मुख्य भूमिका निभाई।
४. ‘जनता के राष्ट्रपति’ (People’s President) और उच्च आदर्श
कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद ‘भारत के राष्ट्रपति’ (2002-2007) के रूप में सुशोभित किया। सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बाद भी उनकी सादगी और अनुशासन अद्वितीय था:
अनुशासन व सादगी: राष्ट्रपति भवन के उद्यान में उन्होंने लकड़ी और सरकंडों का एक छोटा-सा कमरा बनवा रखा था, जहाँ वे अपनी किताबों और कंप्यूटर के साथ अध्ययन करते थे।
निजी खर्च का वहन: जब उनका परिवार कुछ दिनों के लिए राष्ट्रपति भवन आया, तो उनके रहने-खाने का संपूर्ण खर्च उन्होंने अपनी व्यक्तिगत जेब से दिया, न कि सरकारी कोष से।
छात्रों व युवाओं से लगाव: प्रोटोकॉल की सीमाओं को तोड़कर वे हमेशा बच्चों और युवाओं के बीच जाते थे और उन्हें विज्ञान तथा राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा देते थे। इसी सहृदयता के कारण उन्हें ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ (जनता का राष्ट्रपति) कहा गया।
५. सम्मान, रचनाएँ और अमर संदेश
रचनाएँ: उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में ‘विंग्स ऑफ फायर’ (Wings of Fire), ‘इंडिया 2020’, ‘इग्नाइटेड माइंड्स’ (Ignited Minds) और ‘माय जर्नी’ अत्यंत लोकप्रिय हैं।
पुरस्कार व सम्मान: उन्हें ४८ विश्वविद्यालयों से मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त थी। भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म भूषण (1981), पद्म विभूषण (1990) और देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ (1997) से सम्मानित किया गया।
निधन:
27 जुलाई 2015 को आईआईएम शिलांग (IIM Shillong) में विद्यार्थियों को संबोधित करते समय हृदय गति रुकने (Cardiac Arrest) से उनका निधन हो गया।
डॉ. कलाम आज भले ही हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित न हों, किंतु उनकी वैज्ञानिक सोच, उनकी सादगी और ‘विंग्स ऑफ फायर’ जैसी पुस्तकें युगों-युगों तक भारत के युवाओं को अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।

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