जून, 2024

अवकाशप्राप्त प्रधानाचार्य
ल ना मिथिला विश्वविद्यालय, बिहार
मानवीय सभ्यता आज अपने अस्तित्व के गंभीर संकट से गुजरती प्रतीति हो रही है। यह संकट प्राकृतिक कम स्वयं मानवनिर्मित अधिक है। उत्तर भारत में इस बार तापक्रम 48-49 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच चुका है। लू चलने के दिनों की संख्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है। अब यह प्रश्न भी पीछे छूट गया है की एसी लगाना एक विलासिता (luxury) है या आवश्यकता। अब यह प्रश्न समीचीन हो गया है की एसी को घरों या व्यावसायिक उपक्रमों में इस तरह लगाया जाय कि उससे वैश्विक तापवृद्धि में स्वयं बढ़ोतरी न हो।
तापमान में बढ़ोतरी में जब ‘सापेक्ष आर्द्रता (humidity)’ का जुड़ाव होता है तो स्थिति और भयावह हो जाती है। वायु तापमान में वृद्धि के साथ बढ़ी हुई सापेक्ष आर्द्रता के कारण बेचैनी की स्थिति उत्पन्न होती है। अब तो महानगरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index) के साथ-साथ ताप सूचकांक (Heat Index) की सूचना प्रदान करने की मांग उठने लगी है।
हालांकि वृक्षारोपण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है और बहुत से लोग व्यक्तिगत या सामूहिक स्तर पर ये कार्य कर रहे हैं। बिहार के अरवल जिले के धर्मेन्द्र कुमार के नेतृत्व में “नीम पीपल तुलसी अभियान” के तहत टीम के सदस्य ‘सीड बॉल’ बना कर उचित स्थान पर जहां अद्रर्ता भी हो डाल देते हैं ताकि वृक्षाच्छादन बढ़े और पीपल, नीम कॉरीडोर बन सके। समारोहों में गुलदस्तों की जगह पौध देने, जन्मदिन, विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर वृक्ष लगाने आदि की परिपाटी ज़ोर पकड़ रही हैं। बिहार के भागलपुर जिले के धरहरा गाँव में बेटी के जन्म पर वृक्षारोपण की परंपरा है जो हाल के वर्षों में विशेष प्रचारित हुई है।
बिहार सरकार ने राज्य में हरित पट्टी बढ़ाने के लिए ड्रोन एवं हेलिकॉप्टर से राज्य के पहाड़ों पर दस लाख ‘सीड बॉल’ गिराने का निर्णय किया है। भारतीय रेलवे द्वारा भी खाली जगहों पर हरित पट्टी विकसित किया जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह अब आवश्यक हो गया है कि प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) का प्रयोग कम करते हुए उस पर निर्भरता समाप्त कर दी जाय। कोयला, डीजल, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस आदि के स्थान पर नई एवं नवीकरणीय ऊर्जा के सभी रूपों को विकसित करना समय की मांग है। भारत सभी प्रकार की ऊर्जा, जैसे सौर ऊर्जा, बायो फ्यूल, हाइड्रोजन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू तापीय ऊर्जा आदि को विकसित और उपयोग करने के अभियान की अगुआई कर रहा है। सरकार जरूरत अनुसार सब्सिडी भी दे रही है। शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की प्राप्ति जीवाश्म ऊर्जा पर निर्भरता समाप्त किए बिना नहीं किया जा सकता है। वर्तमान में (वित्तीय वर्ष 2024-25) भारत में जीवाश्म स्रोतों से कुल 243.22 गीगावाट जीवाश्म स्रोतों से और कुल 190.57 गीगावाट गैर जीवाश्म स्रोतों से विद्युत ऊर्जा का उत्पादन होता है।
विद्युत वाहनों में प्रयुक्त लिथियम आयन बैटरियों ने 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास के तापक्रम पर या तो काम करना बंद कर दिया या फिर उनकी क्षमता प्रभावित हुई। आमतौर पर ये बैटरियाँ 35 डिग्री सेल्सियस पर पूरी क्षमता से क्रियाशील होती है। इसलिए अब इन बैटरियों के लिए निर्धारित मानकों में संशोधन की मांग उठने लगी है। उत्तर एवं पूर्वी भारत में सापेक्ष आर्द्रता अधिक होने से इन बैटरियों की आयु क्षमता घटने की बात भी सामने आई है। इसलिए इनके डिजायन में बदलाव और शीतलन प्रक्रम (cooling system) को संशोधित करने की भी आवश्यकता है। भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक दुपहिया वाहनों में आग लगने की कई घटनाएँ सामने आने के बाद ऐसी मांग बढ्ने लगी है। भारत जैसे गर्म देश में किसी ईंधन या तकनीक को अनुमति देने से पहले यहाँ के अलग अलग वातावरण में उसका अच्छे से परीक्षण किया जाना बहुत ही आवश्यक है।
विश्व की बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए अनाज का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। देश में हरित क्रांति से अनाज में तो हम आत्मनिर्भर हो गए लेकिन रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण एक तो दीर्घ काल में भूमि की उत्पादन क्षमता घटी, दूसरा ऐसा खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अनेक समस्याएँ खड़ी करने लगा। भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन के कारण जल स्तर बहुत नीचे चला गया। कहीं-कहीं तो भूमिगत जल लगभग समाप्त हो चुका है। हरित क्रान्ति के अग्रणी राज्यों, जैसे पंजाब, हरियाणा और निकतवर्ती क्षेत्रों में यह अधिक देखा जा रहा है। प्रदूषित भूमिगत जल के कारण आज पंजाब कैंसर की राजधानी बन गया है। यही कारण है कि एक बार फिर से वहाँ पूर्व की तरह धान की खेती बंद करने की मांग की जा रही है क्योंकि इसमें अधिक पानी की जरूरत होती है।
कृषि के कुछ गलत तरीके भी पर्यावरण संबंधी समस्याओं को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए पंजाब, हरियाणा और निकटस्थ क्षेत्रों में पराली यानि कृषि अवशिष्ट जलाने से हर साल दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्रों में तबाही मचती है।
अब लोग फिर से जैविक और प्रकृतिक खेती को महत्त्व देने लगे हैं। बिहार में गंगा के दोनों किनारों पर जैविक खेती का कॉरीडोर विकसित किया गया है। यहाँ नीम के खाद का उपयोग किया जा रहा है जिससे नाइट्रस ऑक्साइड प्रदूषण एवं उससे उत्पन्न ग्रीन हाउस प्रभाव में कमी आई है।
अभी हाल में ही 22 अप्रैल 2024 को विश्व स्तर पर प्लास्टिक के उत्पादन एवं निष्पादन से सम्बद्ध समस्याओं पर वैश्विक विमर्श हुआ। 23-29 अप्रैल को कनाडा के ओटावा शहर में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में कानूनी रूप से बाध्यकारी एक समझौता हुआ जिसमें दुनिया भर के 175 देशों ने भाग लिया। आज क्या समुद्र और क्या पहाड़, कोई भी जगह प्लास्टिक से अछूती नहीं है। आज तो मानव भ्रूण और रक्त में भी माइक्रो प्लास्टिक पहुँच चुका है। 1950 के दशक में प्लास्टिक उत्पादन की शुरुआत हुई और यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो 2040 तक इसका आच्छादन 70% तक बढ़ जाने की संभावना है।
लोगों को पर्यावरण एवं उससे जुड़े विभिन्न आयामों के संरक्षण हेतु उत्प्रेरित करने के लिए वैश्विक स्तर पर अनेक दिवस चिन्हित किए गए हैं। उदाहरण के लिए; 5 जून पर्यावरण दिवस, 22 अप्रैल पृथ्वी दिवस, 11 जुलाई जनसंख्या दिवस, 22 मई जैव विविधता दिवस, 17 जून मरुस्थलीकरण एवं सूखा निवारण दिवस इत्यादि। इसी तरह बाघ (29 जुलाई), सिंह (10 अगस्त) सहित अन्य जीव जंतुओं हेतु भी अनेक दिवस मनाए जाते हैं।
पिछले प्रायः 30 वर्षों से हर वर्ष नवंबर-दिसंबर महीने में विश्व के शासनाध्यक्ष, राष्ट्राध्यक्ष, योजनाकार एवं वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन रोकने और एक सतत विकास योग्य पृथ्वी बनाने के लिए सम्मेलन करते हैं। इस सम्मेलन को UNFCC (United Nations framework Convention on Climate Change) आयोजित करता है। इस सम्मेलन को Conference of Parties (CoP) कहा जाता है। 2024 में यह CoP अजरबैजान की राजधानी बाकू में 11-22 नवंबर को आयोजित होगा। इन सम्मेलनों का मुख्य लक्ष्य है सान 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना। वैश्विक स्तर पर 2023 तक 45% तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 45% तक कम करने पर सहमति बनी है। भारत भी इसमें अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन फिर भी कई कारणों से इस दिशा में व्यावहारिक रूप से धीमी गति से ही विश्व बढ़ पा रहा है।
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