हे स्त्री! ये तो तुम्हारी प्रकृति नहीं

जून, 2025

डॉ लता अग्रवाल ‘तुलजा’
शोलापुर महाराष्ट्र
वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद

पिछले दिनों भारतीय समाज में अलग ही उथल पुथल मची, जो स्त्री जननी, प्रेयसी, सहचरी और बहन के रूप में गरिमा पाती थी आज उसी स्त्री के हाथ अपने सुहाग के लहू से रंगे जा रहे हैं, कम से कम भारतीय समाज के लिए तो यह चौका देने वाली खबर है। जहाँ किसी सुहागन के लिए उसका सिंदूर अनमोल होता है, उसके लिए ओपरेशन सिंदूर जैसी मुहीम चल जाती है वहीँ दूसरी ओर उसी भारत की स्त्रियाँ अपने ही सिंदूर के लिए किलर साबित हो रही हैं। सचमुच चिंता का विषय है, प्रसाद की वो पंक्तियाँ,
“तुम दान कर चुकी पहले ही, जीवन के सोने-से सपने।
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग पगतल में।”
आज स्वयं में अपना वजूद तलाश रही हैं …क्या मेरा रचयिता नारी मनोविज्ञान को सही से पढ़ नहीं पाया?नारी के लिए तो कहा गया है उसका मन तितली सा कोमल होता है, आँसू उसकी पलकों पर रखे होते हैं। फिर क्या कारण हुआ कि नारी इतनी कठोर हो गई कि जिसके साथ सात फेरे लिए उसके साथ सात दिन भी नहीं गुजार पाई और चौथे दिन ही उस पति के मौत की सुपारी दे दी! पिछले दिनों ‘अतुल सुभाष’ से आरम्भ हुआ यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा।
श्रध्दा आज ताड़का कैसे हो गई?
प्रश्न उठता है क्या स्त्री इस हद तक कुंठित हो चुकी है कि वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठी है और इस तरह के हिंसक कार्यों को अंजाम दे रही है? मानती हूँ भारतीय नारी काफी संघर्षों को झेलती हुई आज यहाँ तक पहुँची है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं यथा – उसका बचपन अभावों या मानसिक संत्रासों के बीच रहा, वह अपनों से शोषित रही, उसकी योग्यता को कुचला गया। विवाह के पश्चात् उसके निजी सम्बन्धों में अपनेपन का अभाव रहा हो, उस पर पारिवारिक या सामाजिक दवाब रहा हो। सारी बातें मंजूर हैं किन्तु आज की अपेक्षा प्राचीन दौर में उनकी प्रताड़ना अधिक थी …लेकिन इस तरह की हिंसा उनके द्वारा कभी सुनने में नहीं आई। आज स्त्री को काफी आजादी है, वह अपनी बात समाज के सामने कह सकती है। फिर उसे यह कदम उठाने की क्या आवश्यकता? क्या वह नहीं जानती एक जीवन को जनम देने की प्रक्रिया कितनी कष्टकारी होती है? फिर वह कैसे किसी के प्राण हर सकती है? लेकिन यह हो रहा है, पिछले दिनों अख़बार की सुर्ख़ियों में यह घटनाएँ बहुत छाई रहीं, सुर्खियाँ या शर्मिंदगी-
“मेरठ में एक महिला ने अपने ही प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी और शव के पास सांप छोड़ दिया ताकि यही तस्वीर बने कि सांप के काटने से मृत्यु हुई है।”
“हरियाणा के भिवानी में एक महिला ने अपने यूट्यूबर प्रेमी के संग मिलकर अपने पति की हत्याकर दी, दोनों मिलकर वीडियो बनाया करते थे। एक दिन पति ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ लिया बस इसीलिए उन्होंने पति को मौत के घाट उतार दिया।”
“हिसार में बॉक्सर पत्नी ने खुलेआम थाने में पति की पिटाई की।”
“मध्य प्रदेश सतना का वह वीडियो बहुत वायरल हुआ जिसमें पत्नी अपने पति की छाती पर बैठकर उसको पीट रही है और वह पति मदद के लिए गुहार लगा रहा है।”
“44 साल की उम्र में 4 शादियाँ की और कहीं भी 6 माह से अधिक नहीं टिकी। शादी को बनाया व्यवसाय।”
“दुबई से लौटे पति को पत्नी ने पहले नींद की दवाई देकर बेहोश किया फिर अपने प्रेमी के साथ मिलकर न केवल मार डाला बल्कि उसके 15 टुकड़े करके उसे एक ड्रम में सीमेंट के साथ फिक्स कर दिया।”
“पत्नी ने सुहागरात के चौथे दिन पति को दे दिया जहर और घर से नगदी जेवर लेकर फरार हो गई।”
“यूपी औरैया में पत्नी ने शादी के 14 वे दिन बाद ही रची पति के हत्या की साजिश, दो लाख रूपये की सुपारी दी किलर को, हैरानी की बात यह अदायगी मुँह दिखाई और शादी में मिले पैसों से हुई।”
रिश्ते कैसे बोझ हो गए?
ऐसी अन्य घटनाओं से अब हमारे अखबार भरे रहते हैं, सच मन कसैला हो जाता है। कहाँ जा रहे हैं हम, कभी रिश्तों को सहेजने वाली स्त्री पर क्या रिश्तों का बोझ इतना भारी हो गया है कि उसी के हाथों सांसों की डोर टूटने लगी है? जिस पति के लिए करवा चौथ जैसे व्रत रखती थी अब उसी पति की प्राण घातिनी हो गई? कैसी सोच है कि पति को प्रताड़ित कर, मानसिक रूप से इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह स्वयं को ही समाप्त कर दे। हैरानी की बात यह है कि इनमें से कई युगल तो वो हैं जिन्होंने लव मैरिज की है माता-पिता की मर्जी के विरुध्द जाकर।
संस्कारों के वृक्ष को दीमक खा रही
दूसरी बात इनमें कई युवा जिन्होंने जिन्दगी से हार मान ली, वे उच्च शिक्षित थे, अच्छे पद पर थे। अर्थात वे कानून भी जानते थे, सच के हक़ में आवाज उठाना भी जानते थे। फिर क्यों कर उन्होंने अपनी सारी सम्भावनाओं को पल में किसी पंखे से लटका दिया? क्या इसके लिए हमारी शिक्षा जिम्मेदार नहीं? जो केवल बच्चों को कंप्यूटर में पारंगत कर पाई उन्हें; जीवन के मैदान में तो वे कच्चे खिलाड़ी ही रहे। यह सवाल कई मुद्दों की परत खोलता है, आई टी सेक्टर में काम करने वाले अतुल सुभाष हाइ पॅकेज में थे, यही उनके लिए मुसीबत बन गया। उनकी पत्नी और ससुराल वालों का लोभ इनकी प्रताड़ना का कारण बना। न सबने मिलकर अतुल को मानसिक रूप से इतना कमजोर कर दिया कि वह जीवन से हार मान बैठा। यहाँ कटघरे में केवल अतुल के ससुराल वाले ही नहीं, वो माता-पिता भी हैं जो बेटियों की गृहस्थी में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं, वह समाज भी दोषी है जिसकी जानकारी में अतुल की परेशानियाँ थीं किन्तु किसी ने आकर उसकी सहायता नहीं की। हमारी कानून व्यवस्था जो अंधी होने के साथ बहरी भी है। वह जज जिसने अतुल की परेशानियों को कम करने के बजाय और बढ़ाया …किस किस को दोष दें। सभी मानवता के दोषी हैं। अतुल अपनी बात कहता रहा मगर किसी ने नहीं सुनी, यहाँ तक कि मरने के बाद भी उसकी बात अनसुनी ही रह गई। अफ़सोस है।
हिंसा का कोई जेंडर नहीं
ये घटनाएँ एक बात तो साबित करती ही हैं कि हिंसा का कोई लिंग नहीं होता, पुरुष भी घर हिंसा के शिकार होते हैं। अब तक हम देखते रहे कि दहेज प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न के रहते अक्सर स्त्रियां आत्महत्या करती थी। अब तक यही विषय देश के लिए समस्या का विषय बना हुआ था, जिससे निपटने कानून ने घरेलू हिंसा अधिनियम पारित किया।
किंतु पिछले दिनों से जो घटनाएं सामने आ रही हैं वह चौका देने वाली है, विडम्बना यह की इसके लिए कोई कानून भी नहीं। यह बात आज भी कईयों के गले नहीं उतर रही कि पत्नी भी इतनी हिंसक हो सकती है? क्या पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार हो सकते हैं? जबकि सच्चाई हमारे सामने हैं। यह सिलसिला थम नहीं रहा।
स्त्रियों ने अपनी छवि धूमिल की
मैंने देखे हैं कई पुरुष जो पत्नियों द्वारा निरंतर प्रताड़ित हो रहे हैं, मानसिक उत्पीड़न सह रहे हैं किंतु अपनी सामाजिक छवि बनी रहे इस वजह से कहीं मुँह नहीं खोलते कारण समाज ने एक अवधारणा बना ली है कि मर्द को दर्द नहीं होता…ऐसे में वह मर्द अपना दर्द किसी से साझा करने में घबराते हैं कि कहीं उनसे मर्द का लेवल ना छिन जाए। पुरुषसत्ता ने ही पुरुष को मजबूत और स्त्री को कमजोर की संज्ञा दी है अत: पुरुष कमजोर कैसे हो सकता है? लड़के अपना रोना नहीं रोते इसलिए लड़के विवश हैं न रोने के लिए। इसलिए वे सबकुछ सहकर भी चुप्पी धारण किए हुए हैं। किंतु इस चुप्पी का नतीजा पिछले दिनों अतुल सुभाष और मेरठ से इस भयानक रूप में सामने आई।
रिश्तों से खिलवाड़
मैंने तो वो परिवार भी देखें हैं जहाँ नई ब्याहता अपने गर्भ में प्रेमी का अंश लेकर आई और आते ही ससुराल वालों को झूठे हिंसा के केस में फंसा कर पहले तो करोड़ों रूपये की मांग की जब यह सफल न हुआ तो पति, सास को दहेज की प्रताड़ना में फंसाकर अपनी राह निकल गई। निर्दोष परिवार कानून के दाव पेंचों से कई वर्षों तक उलझता रहा और वह निर्दोष पति जेल की सलाखों के पीछे अपनी जवानी काटता रहा। तो कई जगह पूर्व प्रेमी होते हुए सिर्फ इसलिए उन लड़कियों ने ब्याह कर धनवानों को फंसाया कि पैसा एंठ कर अपने प्रेमी के साथ आराम से जिंदगी बसर करें। पति को विवाह के पश्चात् पास आने नहीं दिया यहाँ तक कि रोज रात दूध में नशीली दवा मिलाकर उसे सुला दिया जाता और कोर्ट में कह दिया कि उसका पति उसे वैवाहिक सुख देने में असमर्थ हैं।
अफसोस यह कि कानून ने भी अब तक एक तरफ का चश्मा लगा रखा है। वर पक्ष अपनी सच्चाई साबित करना चाहता है मगर कानून अंधे के साथ-साथ बहरा जो हुआ पड़ा है।
कानून पर सवाल
प्रश्न उठता है, क्यों औरतों के लिए कानून… मर्दों के लिए नहीं। मर्द अपनी बात किसे कहें? कई खबरें आ रही है, रिश्तों के बिखराव की। कभी पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास की डोर से बंधा होता था आज विश्वास की डोर इतनी कमजोर पड़ गई है कि पत्नी, पति की खुले आम पिटाई कर रही है उसे काट कर ड्रम में भर रही है! सास के बाल पकड़कर नोच रही है! पति की हत्या की सुपारी दे रही है! एक समय था जब बड़े घर से आई बेटियां, ससुराल में दो कमरे के घर में पूरी उम्र गुजार दिया करती थीं, उन्हें ही प्रेमचन्द ने इतिहास में अंकित कर दिया ‘बड़े घर की बेटी’ के रूप में लेकिन आज की लड़कियां दिल की लंबाई चौड़ाई नहीं देखतीं, प्लाट की लंबाई चौड़ाई देखते हैं। तो क्या पैसा ही सब कुछ् है या केवल शारीरिक तृष्णा की पूर्ति ही जीवन का चरम सुख है? ऐसे कितने उदाहरण हमारे सामने हैं जहाँ हम सुनते हैं, पिछले 5-7 बरस से यहाँ तक कि स्कूल समय से इनका रोमांस चल रहा है, माता पिता अगर विरोध करते हैं तो उनका जवाब होता है कि हम एक दूसरे के बगैर नहीं रह सकते? फिर क्यों शादी होते ही ये युवा एक दुसरे से इतनी नफरत करने लगते हैं? उनके बीच दूरियां इतनी बढ़ जाती है कि नौबत तलाक तक पहुंच जाती हैं। मुझे जो कारण देखने में आया उसमें अधिकांश यह कि हाई प्रोफाइल लाइफ न जी पाने के कारण उनके बीच विवाद शुरू हो जाते हैं, महत्वाकांक्षाएँ उन्हें एक दूसरे से दूर ले जाती हैं।
मर्द खुलकर कहें दर्द होता है
विडम्बना यह है कि पत्नी सताए तो बेचारा पति कहाँ जाएं, किससे कहे कि मर्द को भी दर्द होता है भाई, क्यों पत्नियों की बेवफाई मर्डर तक आई? ये वो प्रश्न हैं जिस पर आज समाज को जागरूक हो जाना चाहिए। कानून जिसका काम है दो लोगों के बीच की मानसिक क्रूरता को दूर कर एक सुखी गृहस्थ जीवन के लिए तैयार करे। किसी ने अपने वक्तव्य में कहा है कि ‘बहुत बचा ली बेटियां अब दामाद को बचाओ।’
क्यों हमें इस तरह किसी के कहने की आवश्यकता पड़ती है, यह हमारा समाज है, इसे हमें ही रहने योग्य बनाना है। अब चारों ओर से आवाजें आने लगी हैं कि सुनो पतियों अब तुम्हें कोई डराए, धमकाए, डरो नहीं अब कानून तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारे हाथों अधिकार का अस्त्र है। क्या यह अधिकार पहले नहीं थे? थे। किन्तु जैसा कि हमारी जटिल, बोझिल और कहूँगी लापरवाह न्याय व्यवस्था के रहते अधिकार कागजों की फाइलों में ही सिमटकर रह जाते हैं। पति के पास भी कानून है, ये 6 अधिकार हैं:
1. हिंसा उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत का अधिकार;
2. खुद से बनाई संपत्ति पर उसका अपना पूरा अधिकार है;
3. मेंटल हैरासमेंट पर वह पुलिस या कोर्ट में शिकायत का अधिकार रखता है;
4. तलाक के लिए याचिका दायर करने का अधिकार;
5. हिंदू मैरिज एक्ट के तहत पत्नी से मेंटेनेंस का अधिकार;
6. एक तरफा तलाक होने पर बच्चों की कस्टडी का अधिकार। कुल मिलाकर उसके पास पत्नी के बराबर अधिकार तो नहीं है किंतु वह इन 6 अधिकारों का प्रयोग तो कर ही सकता है। बशर्ते कानून ईमानदार हो। अन्यथा अतुल सुभाष जैसे युवा प्रताड़ित होते रहेंगे।
आवश्यकता है कानून में बदलाव की
महत्वपूर्ण बात यह कि जिस तरह राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना हुई, इसी तरह राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठबंधन की मांग की गई है। हवाला दिया गया है कि 2021 में देश भर में 1,64,033 लोगों ने आत्महत्या की इनमें से विवाहित पुरुषों की संख्या 81,063 है अर्थात लगभग 33.02% प्रतिशत पुरुषों ने पारिवारिक कारणों से और 4.8% प्रतिशत पुरुषों ने शादी से जुड़े मसलों से परेशान होकर अपनी जान दी है।
निष्कर्ष
देश के नीतिकारों को चाहिए किसी विशेष पक्ष के लिए न होकर सबके लिए समान अधिकार बनाएं, अन्याय, अत्याचार, प्रताड़ना सभी को बराबर कष्ट देती है चाहे स्त्री हो या पुरुष। फिर उन माता-पिताओं से मेरी अपील है कि बेटियों को चाहे एक डिग्री कम दिलवाओ, एक जोड़ कपडा खरिदाओ किन्तु संस्कारों में कमी न करो। मैं न किसी पुरुष वर्ग की ओर से न महिला समाज के विरोध में जाकर यह बात कह रही हूँ बल्कि भारत की पहचान जिन संस्कारों से हैं उसके हित में कह रही हूँ। माना यह कलयुग है कुछ अपराधी समाज की लापरवाही से खुले आम घूम रहे हैं किन्तु ऊपर वाले की अदालत में किसी तरह का अन्याय नहीं चलता इस बात को हमें ध्यान में रखकर चलना चाहिए।
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