जून, 2025

हैदराबाद, तेलंगाना
हिन्दी साहित्यकार एवं स्वतंत्र पत्रकार
वर्तमान समय में अगर भारतीय समाज के बदलते स्वरूप पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि समाज में हो रहे अन्य परिवर्तनों के साथ-साथ हिंसात्मक गतिविधियों में भी जबरदस्त वृद्धि हो रही है। आए दिन हमें समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और न्यूज़ चैनलों में पढ़ने और सुनने को मिलता है कि मामूली सी बात को लेकर हुए झगड़े में लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं और फिर हत्या तक कर देते हैं। और तो और अब महिलाओं और बच्चों में भी हिंसा की यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कुछ समय से महिलाओं द्वारा अपने पति की हत्या के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं।
इसलिए भारतीय समाज में बढ़ती हुई सामूहिक हिंसा को देखते हुए उन स्थितियों का आकलन करना बहुत जरूरी है, जिनके कारण समाज में हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह हिंसा अफवाहों के आधार पर निरपराध लोगों पर की गई हिंसा के रूप में भी प्रकट होती है तो कभी जातिगत या सम्प्रदायगत विद्वेष के कारण। वह सदैव नियोजित अथवा किसी साजिश का परिणाम ही नहीं होती है लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है।
आइए जानते हैं कि इन सबके पीछे क्या कारण हो सकते हैं कि एक व्यक्ति हिंसा पर उतारू हो जाता है?
नकारात्मक तत्वों की विद्यमानता
मनुष्य की मानसिक प्रवृत्तियां जैसे- लोभ, लालच, स्वार्थ, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा और क्रूरता आदि भी हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं। ये प्रवृत्तियां एक तरह से मानसिक कुंठाओं के रूप में मनुष्य के स्वभाव में मौजूद रहती हैं और समय और परिस्थितियों के अनुसार भड़क जाती हैं।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और आस-पास का वातावरण
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति है। व्यक्तियों के समूह से परिवार बनता है और परिवारों के समूह से समाज। समाज से गाँव और गाँवों से मिलकर राष्ट्र का निर्माण होता है। तो सर्वप्रथम व्यक्ति के मन पर उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और आस-पास के वातावरण का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। एक बच्चा बचपन से ही अगर अपने घर में हिंसा, मारपीट और गाली-गलौज देखता और सुनता है तो सुनते-सुनते वह भी इनका अभ्यस्त हो जाता है और बड़ा होकर वैसा ही आचरण करने लगता है। वैज्ञानिक मान्यतानुसार एक बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में पचास प्रतिशत उसके आनुवंशिक गुण काम करते हैं तो पचास प्रतिशत आस-पास का वातावरण उसे प्रभावित करता है। तो अगर आपके आस-पास रात-दिन हिंसक माहौल बना रहेगा तो उसका आपकी सोच पर प्रभाव पड़ना निश्चित है।
हिंसा और भय
हिंसा और भय का परस्पर गहरा रिश्ता है, दोनों एक-दूसरे को बढ़ाते हैं। हिंसा की क्रियान्विति से पहले वह घटना हमारे मन में घटित होती है। हिंसा पर मनोवैज्ञानिक और तंत्रिका वैज्ञानिक (न्यूरोलॉजिकल) अध्ययनों का निष्कर्ष है कि मनुष्य में हिंसा करने का सामर्थ्य तो है, लेकिन यह उसका अन्तर्जात स्वभाव नहीं है। वह किसी-न-किसी प्रकार के बाह्य कारण से उत्तेजित और सक्रिय होती है।
इसका तात्पर्य यह है कि यदि समाज में हिंसा को उत्तेजित करने वाली परिस्थिति या परिवेश न हो तो ऐसे समाज में हिंसा न्यूनतम होगी। कभी-कभी केवल वैयक्तिक स्तर पर उसके सामूहिक रूप लेने की सम्भावना न्यूनतम होगी।
नृतत्वशास्त्री ब्रॉस डी बोंटा ने शोध के दौरान ऐसे सैंतालीस जनजातीय समाज खोजे हैं, जहां हिंसा बहुत कम देखने को मिलती है। यदि हिंसा मनुष्य के स्वभाव का मूल गुण होती तो ऐसा नहीं हो सकता था। तब अन्य प्रकार के समाजों में भी प्रत्येक व्यक्ति हिंसक होता लेकिन ऐसा नहीं है।
जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और सम्प्रदायवाद
ये सब तत्त्व हमारे भारतीय समाज को बनाने और बदलने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मेरी जाति, मेरा क्षेत्र, मेरी भाषा और मेरा सम्प्रदाय ही सर्वश्रेष्ठ है। जब ऐसी भावना व्यक्ति के मन में घर कर जाती है तो बहकावे में आकर वह हिंसा पर उतारू हो जाता है। सांप्रदायिक दंगे इसी तरह की हिंसा के जीते-जागते उदाहरण हैं। आए दिन भाषा को लेकर झगड़े होते रहते हैं और राजनीतिक नेता जान-बूझकर ऐसी घटनाओं को चिंगारी देते हैं। सामंतवाद और जातिवाद हमारे समाज में इतनी गहराई तक अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है कि इनकी वजह से आए दिन दो समुदायों में झड़प होती रहती है और मारपीट व हत्या करना आम बात हो गई है। सामाजिक भेदभाव के कारण उपजा असंतोष भी कभी-कभी हिंसक गतिविधियों का कारण बन जाता है।
सोशल मीडिया पर फैलती अफवाहें
आजकल सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक समूह सक्रिय हो गए हैं, जो जान-बूझकर समाज में ऐसी अफवाहें फैलाते हैं, जो देखते ही देखते बड़ी हिंसक घटनाओं का रूप ले लेती हैं। किसी भी घटना के पीछे कुछ तात्कालिक कारण होते हैं तो कुछ अप्रत्यक्ष कारण भी होते हैं। जो धीरे-धीरे असंतोष और क्रोध पैदा करते रहते हैं और किसी भी छोटी-सी तात्कालिक घटना के बहाने से हिंसक रूप में फूट पड़ते हैं।
असुरक्षा की भावना
वर्तमान समय में समाज का कमजोर वर्ग अपने आपको असुरक्षित महसूस करता है। सत्ता और न्याय की कुर्सियों पर बैठे शक्तिशाली लोग समर्थ और ऊंची पहुंच वाले लोगों की ही बात सुनते हैं इसलिए उनके मन में एक असुरक्षा ग्रंथि पनपने लगती है और प्रतिकूल समय में वह सामूहिक हिंसा के रूप में परिणत हो जाती है। सच तो यह है कि औसत भारतवासी आज़ प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था से अपने आपको न केवल ठगा हुआ महसूस करता है बल्कि कहीं-न-कहीं वह इस बात पर से विश्वास खोता जा रहा है कि व्यवस्था उसके हितों की, उसके जीवन की रक्षा करने में कोई वास्तविक रुचि रखती है।
व्यवस्था के प्रति उसका यह अविश्वास उसके भीतर और भय पैदा करता है, जिसके कारण वह अपने द्वारा की जा रही हिंसा को आक्रामक नहीं बल्कि आत्मरक्षात्मक मान कर उसे अपने मन में वैधता दे देता है। फिर मौका मिलते ही किसी छोटी-सी घटना पर भी समूह में शामिल होकर उसका यह भय, यह असुरक्षा-ग्रंथि हिंसक आचरण में तब्दील हो जाती है। वह कानून इसलिए भी समूह के रूप में अपने हाथों में लेने लगता है क्योंकि उसे विश्वास नहीं है कि व्यवस्था अपराधी को दंडित करेगी या समाज में अपराध नहीं होने देगी।
जहाँ आए दिन राजनेताओं, नौकरशाहों और अपराधियों की मिलीभगत (नेक्सस) आम चर्चा में हो, वहाँ औसत आदमी इन्हीं लोगों द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था पर कैसे भरोसा कर सकेगा। राजनीति में अपराधियों के प्रभाव-दबाव के बारे में तो हम सब जानते ही हैं।
सामान्य जनता में आर्थिक असुरक्षा, बेरोजगारी या अल्प रोजगार, किसानों की आत्महत्याएं, भूमंडलीकरण और मानव-निरपेक्ष तकनीकी आदि समस्याएं और उनके प्रति व्यवस्था की उदासीनता भी एक असुरक्षा-बोध पैदा करती है, जो अंतत: किसी भी बहाने से विस्फोटक रूप धारण कर लेती है। इसलिए, असल समस्या समाज के मन में बढ़ रहा विफलता-बोध, असुरक्षा, व्यवस्था के प्रति अविश्वास आदि वे मुख्य कारण हैं, जो हमें भीतर से हिंसक बनाते हैं और जिसकी अभिव्यक्ति किसी भी बहाने से हो सकती है।
यौन कुठाएं और विवाहेत्तर सम्बन्ध
अभी-अभी घटित हत्या की घटनाओं पर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे कि एक शादीशुदा औरत ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर जिस बेरहमी से अपने पति की हत्या कर दी और उसके शव को ड्रम में डालकर उसे सील कर दिया, यह साबित करता है कि मनुष्य के मन में दबी हुई यौन इच्छाएं जब पूर्ण नहीं होती हैं तो वह ऐसे अनैतिक और घृणित कार्यों को अंजाम देता है। नारी, जो स्वभाव से कोमलांगी होती है, ममता, दया, स्नेह और त्याग की भावना उसके स्वाभाविक गुण हैं, वह अपनी दबी हुई यौन इच्छाओं की पूर्ति हेतु सामाजिक और नैतिक मूल्यों को ताक पर रखकर इस तरह के घृणित और हिंसक कृत्य को अंजाम देती है तो सभ्य समाज को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि समाज कहाँ जा रहा है?
इसी तरह से रिलेशनशिप में रहने वाले युवा अपनी प्रेमिका का क़त्ल करके उसके टुकड़े-टुकड़े करके उसे जला रहे हैं, पकाकर खा रहे हैं, यह हिंसा और अमानवीयता की पराकाष्ठा है।
अश्लील फिल्में और ओटीटी सीरीज
आज़ इंटरनेट पर अश्लील फिल्मों और ओटीटी सीरीज की भरमार है। बच्चों से लेकर युवा और प्रौढ़ तक सबके पास स्मार्टफोन है। जहाँ किसी पर किसी का नियंत्रण नहीं है। जो स्वयं शिक्षा और अपने कैरियर को लेकर गंभीर हैं, उनको छोड़कर अन्य बच्चे और युवा अपने लक्ष्य से भटक रहे हैं। वे गलत संगत में पड़कर अनैतिक और अवांछित कार्यों में लिप्त होते जा रहे हैं। शराब, सिगरेट, हुक्का और अन्य नशीली चीजों का सेवन आम बात हो गई है। जब इनकी पूर्ति के लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते हैं तो वे अनैतिक कार्य करने लगते हैं और उनमें बाधा आने पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।
हिंसक प्रवृत्तियों का निवारण
हिंसक प्रवृत्तियों की रोकथाम हेतु सर्वप्रथम व्यक्ति का शिक्षित होना अति आवश्यक है। शिक्षा के माध्यम से उसकी सोच में परिवर्तन होता है और वह अपना भला-बुरा सोचने में सक्षम होता है। परन्तु वर्तमान में हमारी शिक्षा प्रणाली केवल किताबी ज्ञान ही प्रदान करती है, उसमें चरित्र निर्माण पर बल नहीं दिया जाता। शिक्षक स्वयं भी उतने चरित्रवान नहीं रहे, जितने पहले होते थे। शिक्षा में नैतिक और चारित्रिक मूल्यों का अभाव है। स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि तीसरी और चौथी कक्षा के बच्चे अपने से छोटी बच्ची के साथ न केवल दुष्कर्म कर रहे हैं बल्कि उसकी हत्या तक कर रहे हैं। इस एक उदाहरण से ही हम सोच सकते हैं कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। इसलिए ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए न केवल शिक्षकों को सजग रहना आवश्यक है अपितु अभिभावकों को भी अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। इतने छोटे बच्चों को मोबाइल किसी भी कीमत पर नहीं देना चाहिए।
बेरोज़गारी और सामाजिक असमानता को दूर करना
युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई को अगर समय रहते नहीं पाटा गया तो हिंसक प्रवृत्तियों में और बढ़ोतरी होगी इसलिए सरकार और समाज दोनों को चाहिए कि वे रोजगार के नए अवसर तलाश कर युवाओं को रोजगार दें। अन्यथा वह कहावत सत्य सिद्ध होगी कि खाली दिमाग शैतान का घर है। उसे किसी भी तरफ़ मोड़ा जा सकता है। चंद पैसों की खातिर युवा न केवल आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं अपितु देशद्रोही गतिविधियों को भी अंजाम दे रहे हैं।
इसके साथ-साथ हमें अपने खान-पान की प्रवृत्ति को भी बदलना होगा। कहते हैं कि जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।
मांसाहार की बढ़ती प्रवृत्ति निश्चित रूप से हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है। उत्तेजक और तामसिक आहार के सेवन से हार्मोन्स में परिवर्तन होता है और उनका प्रभाव व्यक्ति की बुद्धि पर पड़ता है। वह शीघ्र उत्तेजित होने लगता है और उत्तेजना के क्षणों में अपनी सोचने-समझने की शक्ति पर नियंत्रण खो बैठता है। अतः हमें शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देनी होगी।
हिंसा की रोकथाम हेतु ‘अहिंसा परमो धर्म’ का पाठ बच्चों को प्रारम्भ से ही पढ़ाना चाहिए। साथ ही साथ दिन प्रतिदिन बढ़ती संवेदनहीनता को रोकने के लिए उनमें सामाजिक सह अस्तित्व और सहिष्णुता की भावना का बीजारोपण करना होगा। इन कुछ उपायों के माध्यम से हम समाज में बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों पर कुछ हद तक अंकुश लगा सकते हैं।
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