जून, 2025

पीतमपुरा, दिल्ली
वृद्धावस्था में प्रायः शरीर में लोच कम हो जाती है और हड्डियाँ भी अपेक्षाकृत कमज़ोर और भंगुर हो जाती हैं अतः थोड़ा-सा भी पैर फिसल जाने पर गिर पड़ना और हड्डियों का टूट जाना स्वाभाविक है। गिरने पर बच्चों और युवाओं में जहाँ हाथ में फ्रेक्चर होने की घटनाएँ आम होती हैं वहीं बुज़ुर्गों में कूल्हे की हड्डी टूटना अथवा हिप बोन फ्रेक्चर सामान्य-सी बात है जो अत्यंत पीड़ादायक होता है। यदि हम कुछ सावधानियाँ रखें तो गिरने व गिरने से उत्पन्न होने वाली समस्याओं व पीड़ा से बचा जा सकता है।
यदि हम अपने आस-पास का अवलोकन करें तो पाएँगे कि ज़्यादातर बुज़ुर्ग बाथरूम में ही दुर्घटना का शिकार होते हैं। प्रायः बाथरूमों में जो टाइलें लगी होती हैं उनकी सतह चिकनी होती हैं। पैर फिसलने का कारण प्रायः चिकनी सतह या फ़र्श पर लगी चिकनाई होती है। बाथरूम अथवा किचन का फ़र्श प्रायः गीला हो जाता है और यदि उस पर चिकनाई की कुछ बूँदें भी होंगी तो वहाँ बहुत फिसलन हो जाएगी। जहाँ तक संभव हो सके बाथरूम व किचन में फिसलनरोधी टाइलें ही लगवाएँ। बाथरूम व किचन में सिर्फ़ सुंदर दिखने वाला चिकना पत्थर अथवा टाइलें भूलकर भी नहीं लगवानी चाहिए।
शारीरिक कमज़ोरी के कारण भी बुज़ुर्गों को बाथरूम अथवा शौचालय में उठने-बैठने में दिक्कत होती है। पाश्चात्य शैली के शौचालय बुज़ुर्गों के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक होते हैं। पाश्चात्य शैली के शौचालय के निर्माण के साथ-साथ यदि इन स्थानों पर कुछ हैंडल भी लगवा दिये जाएँ तो बुज़ुर्गों को बाथरूम अथवा शौचालय में उठने-बैठने में सुविधा होगी और वे गिरने व गिरने के परिणामस्वरूप फ्रेक्चर जैसी दुर्घटनाओं से बचे रह सकेंगे। इसके अतिरिक्त घर में अन्य स्थानों पर भी ज़रूरत के अनुसार हैंडल तथा सीढ़ियाँ और सीढ़ियों के दोनों ओर रेलिंग लगवाना अनिवार्य प्रतीत होता है।
बढ़ती उम्र में बुज़ुर्गों की आँखों की रोशनी कमज़ोर पड़ जाती है। इस उम्र में यदि घर में अथवा उनके कमरे में पर्याप्त रोशनी नहीं होगी तो भी वे दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। बुज़ुर्गों को किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचाने के लिए न केवल उनके कमरे, बाथरूम व शौचालय तथा घर में अन्य स्थानों पर पर्याप्त रोशनी होनी चाहिए अपितु समय-समय पर उनकी आँखों की जाँच करवा कर सही नंबर का चश्मा लगवाना भी अनिवार्य है। साथ ही बुज़ुर्गों को स्टूल आदि पर खड़े होकर ऊँचाई से सामान उतारने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। ये तभी संभव है जब घर के दूसरे सदस्य ये कार्य स्वयं करें व बुज़ुर्गों को ऐसा करने से हर हाल में रोकें।
कुछ लोग नहाते समय सिर के बालों में अथवा बदन पर तेल लगाते हैं। तेल लगाते समय नन्ही-नन्ही तेल की बूँदें आसपास के फ़र्श पर भी फैल जाती हैं जो कभी भी एक बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती हैं। ऐसे चिकने फ़र्श पर बच्चे और बूढ़े प्रायः अपनी हड्डियाँ तुड़वा बैठते हैं अतः चिकने फ़र्श को साफ़ कर देना चाहिए। तेल की बूँदों के अतिरिक्त साबुन के छोटे-छोटे टुकड़े भी कई बार फिसलने का कारण बनते हैं। साबुन का एक अत्यंत छोटा-सा टुकड़ा भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है अतः साबुन के छोटे-छोटे टुकड़ों को भी फ़र्श से बिलकुल साफ़ कर देना चाहिए।
कई बार नहाने के बाद गीले साबुन को फ़र्श पर ही छोड़ देते हैं जिससे साबुन की टिक्की उठाने के बाद भी कुछ साबुन फ़र्श पर लगा रह जाता है जो दुर्घटना का कारण बन जाता है। इसलिए साबुन को फ़र्श पर रखने की बजाय साबुनदानी में ही रखना ठीक है और साबुनदानी को भी सही स्थान पर रखना चाहिए क्योंकि साबुनदानी से भी गीले साबुन की बूँदें टपक कर फ़र्श को फिसलनभरा बना देती हैं। जब भी नहाएँ या कपड़े धोएँ साबुन को ठीक स्थान पर रखें तथा बाहर आने से पहले फ़र्श को साफ करके ही बाहर आएँ।
बर्फ़ के टुकड़े तथा ओले भी फिसलन उत्पन्न करते हैं। सपाट-चिकने फ़र्श पर यदि ओले गिरे हों तो उस पर कभी नहीं चलना चाहिए। घर की बालकनी में ही ओलों पर फिसलने के कारण गिरने से हमारे पड़ोस में एक युवक की बाज़ू की हड्डी टूट गई थी जिससे उसे काफी पीड़ा और असुविधा हुई। कुछ दिनों बाद उनके बुज़ुर्ग पिता भी घर का दरवाज़ा खोलते समय गिर पड़े और उनके भी एक हाथ की हड्डी टूट गई जो मरते दम तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुई व इसके कारण उनके हाथ में हमेशा दर्द बना रहा। और इस सारी परेशानी का कारण किसी न किसी तरह की फिसलन ही थी।
किचन में कई बार बर्फ़ के टुकड़े या आइसक्यूब बिखर जाते हैं जिनसे किचन का फ़र्श गीला ही नहीं फिसलनयुक्त भी हो जाता है अतः ऐसे टुकड़ों को फ़ौरन हटाकर फ़र्श साफ कर देना चाहिए। कई बार फ़र्श पर फैली कुछ चीज़ें भी फिसलने का कारण बन जाती हैं जैसे कंचे अथवा गोल आकार के साबुत दालों जैसे ठोस बीज। इन पर पैर आने से गिरना लाज़िमी है अतः फ़र्श को साफ़ रखना चाहिए और यदि इस प्रकार की चीज़ें बिखरी हों तो उनसे बचकर सावधानीपूर्वक चलना चाहिए और उन्हें जल्दी से जल्दी साफ़ कर देना चाहिए।
बरसात के दिनों में छत पर अथवा खुली बालकनी में लगातार पानी बरसने से काई जम जाती है जो अत्यंत फिसलनभरी होती है अतः ऐसे स्थानों पर जाते समय पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। जिन स्थानों पर प्रायः पानी टपकता रहता है अथवा अन्य कारणों से गीला रहता है वहाँ भी काई जमने से फिसलन पैदा हो जाती है अतः ऐसे स्थानों पर पानी के रिसाव को रोकने का उपाय करना चाहिए। यदि पानी के नल टपक रहे हों तो उनके वाशर आदि बदलवा देने चाहिए। इससे न केवल अमूल्य जल का दुरुपयोग रुकेगा अपितु संभावित दुर्घटनाओं से भी सुरक्षा मिलेगी।
बरसात के दिनों में पहाड़ी रास्तों पर चलना भी बहुत मुश्किल और ख़तरनाक हो जाता है क्योंकि गीले पत्थर अधिक फिसलन पैदा करते हैं अतः उचित प्रकार ट्रेकिंग शूज़ पहनकर ही ऐसे रास्तों पर चलना चाहिए। बरसात में चिकनी मिट्टी भी अत्यधिक फिसलनभरी हो जाती है अतः गीली चिकनी मिट्टी पर चलते वक़्त विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। प्रसिद्ध उर्दू शायर नज़ीर अकबराबादी की एक नज़्म ‘‘बरसात की बहारें’’ याद आ रही है। उसका एक बंद देखिए:
“कीचड़ से हो रही है जिस जा ज़मीं फिसलनी,
मुश्किल हुई है वाँ से हर इक को राह चलनी,
फिसला जो पाँव पगड़ी मुश्किल है फिर संभलनी,
जूती गड़ी तो उनसे क्या ताब फिर निकलनी,
क्या-क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।”
फ्रेक्चर की बात चली है तो मैं उर्दू भाषा के रुबाई के मशहूर शायर प्रोफेसर अमीर चंद ‘बहार’ साहब का ज़िक्र भी ज़रूर करूँगा। उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले ही उनसे फोन पर बात हो रही थी तो पता चला कि ‘बहार’ साहब फ्रेक्चर के कारण घर में क़ैद होकर रह गए हैं। सचमुच कितना दुर्भाग्यपूर्ण तथा दुखदायी है फ्रेक्चर का होना और वो भी बड़ी उम्र में। बड़ी उम्र में फ्रेक्चर से बचाव वैसे भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि चोट लगने पर न केवल ज़्यादा कष्ट होता है अपितु हीलिंग में भी देर लगती है।
फलों के छिलके विशेष रूप से केले के छिलके भी फिसलने का बहुत बड़ा कारण बनते हैं अतः इनसे बचना चाहिए। छिलके सड़क पर अथवा गली में बिलकुल न फेंके तथा घर में भी फ़ौरन डस्टबिन में डालें। केले के छिलके तो कई बार फ़र्श पर रखने के बाद उठा लेने पर भी फ़र्श को फिसलनयुक्त बना देते हैं अतः केले खाने के बाद छिलके फ़र्श पर डालने के बजाए सीधे किसी प्लेट में रखें तथा बाद में डस्टबिन में डाल दें।
कई बार हमारे जूते भी ऐसे होते हैं कि उनसे फिसलने की संभावना बढ़ जाती है अतः ऐसे जूतों का चुनाव करना चाहिए जिनसे फिसलकर गिरने की संभावना न हो। सफ़र के दौरान अधिक तंग अथवा अधिक ढीले-ढाले कपड़ों से भी गिरने और चोट लगने की संभावना रहती है इसलिए सफ़र के दौरान पहनने के लिए उचित प्रकार के कपड़ों का चुनाव करना चाहिए।
जहाँ आवागमन ज़्यादा होता है वहाँ बिल्डिंगों की सीढ़ियाँ और ज़ीनों की सीढ़ियाँ भी घिस-घिस कर चिकनी हो जाती हैं। ऐसे ज़ीनों में साइडों में दोनों ओर पकड़ने के लिए रेलिंग्स लगानी चाहिए तथा अत्यंत सावधानीपूर्वक चलना चाहिए। घरों या बिल्डिंगों के मुख्य दरवाज़ों पर बने रैंप्स की सतह भी अधिक चिकनी नहीं होनी चाहिए। दिव्यांगों के लिए बने रैंप्स भी अधिक ढ़लानयुक्त और ज़्यादा चिकने नहीं होने चाहिए।
बसों अथवा रेलगाड़ियों में चढ़ते-उतरते वक़्त भी सावधानी ज़रूरी है क्योंकि इनके पायदान घिस-घिसकर चिकने हो जाते हैं जिन पर पैर फिसलने का डर होता है। बरसात के दिनों में तो पक्की सड़कें भी चिकनी हो जाती हैं अतः दुपहिया वाहन फिसलकर गिरने का डर बना रहता है। अतः ऐसे मौसम में स्कूटर या मोटरबाइक अत्यंत सावधानीपूर्वक व कम स्पीड पर ही चलानी चाहिए।
जिस व्यक्ति के शरीर में लोच होगी वह फिसलकर गिरते वक़्त संभल सकता है और चोट लगने से बच सकता है अतः शरीर में लोच बनाए रखने के लिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना चाहिए।
नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए। अधिकाधिक मात्रा में सादा और प्राकृतिक भोजन लेना चाहिए तथा पर्याप्त मात्रा में फलों और सब्ज़ियों का प्रयोग करना चाहिए। दौड़ते या व्यायाम करते समय शरीर का संतुलन बनाए रखना चाहिए।
वैसे तो स्कीइंग और आइस स्केटिंग फिसलने के खेल ही हैं लेकिन इनमें अत्यधिक चुस्ती-स्फूर्ति की आवश्यकता होती है। युवावस्था में तो ये सब संभव है लेकिन वृद्धावस्था में नहीं अतः बुज़ुर्गों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
बुज़ुर्गों का एक सबसे बड़ा सहारा होता है उनकी छड़ी। छड़ी के इस्तेमाल में शर्म नहीं करनी चाहिए। साथ ही छड़ी ऐसी होनी चाहिए जो हलकी और मजबूत होने के साथ-साथ चलते समय फर्श पर सही तरह से रखी जा सके। छड़ी का फ़र्श पर टिकाया जाने वाला निचला हिस्सा हमवार होना ज़रूरी है अन्यथा गिरने का डर बना रहता है। सही छड़ी का सही प्रयोग करने वाले बुज़ुर्गों में दुर्घटना की संभावना अत्यंत कम हो जाती है। वैसे अच्छी लकड़ी की बनी एक कलात्मक छड़ी सुरक्षा के साथ-साथ इस्तेमाल करने वाले के बाहरी व्यक्तित्व को सँवारने का काम भी करती है।
इसके अतिरिक्त हम सब का भी ये दायित्व है कि बच्चों और बुज़ुर्गों को चोट और पीड़ा से बचाने के लिए उन्हें उचित परिवेश उपलब्ध कराएँ। विशेष रूप से चिकनाई की बूँदें और साबुन के टुकड़े बाथरूम के फ़र्श पर बिलकुल नहीं होने चाहिए।
बुज़ुर्गों को फ्रेक्चर से बचाना वैसे भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि चोट लगने पर उन्हें ज़्यादा कष्ट होता है और हीलिंग भी देर से होती है। कभी-कभी तो चोट ताउम्र ठीक नहीं होती अतः सावधानी अत्यंत अनिवार्य है। ऐसे में सावधानी ही उचित एवं अत्यंत कारगर उपचार प्रतीत होता है।
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