बबीता झा
सितंबर, 2024
एक समय की बात है, एक समुद्री जहाज़ भयंकर तूफ़ान में फँस गया। कप्तान के अनगिनत प्रयासों के उपरांत भी जहाज़ को डूबने से नहीं बचाया जा सका और अंततः वह समुद्र की गहराइयों में समा गया। उस दुर्घटना में केवल एक व्यक्ति जीवित बचा, जिसे ईश्वर के न्याय पर पूर्ण विश्वास था। वह समुद्र की लहरों के साथ बहते हुए एक छोटे से निर्जन टापू पर पहुँच गया।
तूफ़ान शांत होने के बाद जब उसने टापू का अवलोकन किया, तो पाया कि वह स्थान पूर्णतः वीरान था; वहाँ किसी मानव का नामो-निशान तक न था। फिर भी, उस व्यक्ति का ईश्वर पर अटूट विश्वास बना रहा। उसने विचार किया कि जिस परमेश्वर ने उसे इस प्रचंड तूफ़ान से बचाकर यहाँ पहुँचाया है, वह आगे भी उसकी रक्षा अवश्य करेगा। इसी आशा के साथ वह वहाँ उगने वाले जंगली फल-फूल खाकर दिन व्यतीत करने लगा।
किंतु वहाँ जीवन अत्यंत कठिन था। न तो स्वच्छ पेयजल उपलब्ध था और न ही अग्नि प्रज्वलित करने का कोई साधन। रात्रि में विश्राम करते समय भी उसे सदैव हिंसक जंगली पशुओं का भय सताता रहता था।
इस प्रकार कई दिन बीत गए, किंतु उसे कहीं से कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई। एक दिन उसने विचार किया कि क्यों न घास-फूस और पत्तों की सहायता से एक आश्रय (झोपड़ी) बना लिया जाए, ताकि कम से कम रात्रि में निश्चिंत होकर सोया जा सके।
बिना किसी औज़ार या उपकरण के झोपड़ी बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य था, फिर भी कठिन परिश्रम करके उसने एक कामचलाऊ झोपड़ी तैयार कर ली। झोपड़ी बनते ही उसे सुरक्षा और असीम संतोष का अनुभव हुआ।
किंतु तभी मौसम ने पुनः करवट ली। टापू पर तीव्र तूफ़ान, वर्षा और बिजली का प्रकोप प्रारंभ हो गया। उसने सोचा कि वह अपनी बनाई झोपड़ी में शरण लेकर इस आपदा से बच जाएगा। किंतु अगले ही क्षण आकाश में भीषण बिजली कड़की और सीधे उसकी झोपड़ी पर आ गिरी। देखते ही देखते उसकी दिन-रात की मेहनत से बनी झोपड़ी जलकर भस्म हो गई।
यह दृश्य देखकर उसका धैर्य टूट गया और उसकी अंतिम आशा भी समाप्त हो गई। वह रोते हुए ईश्वर से शिकायत करने लगा:
“हे भगवान! मुझे इस विकट संकट में डालकर भी तुझे मुझ पर दया नहीं आई? मैंने इतनी कठोर मेहनत से जो झोपड़ी बनाई थी, उसे भी तूने भस्म कर दिया! अब न जाने कब तक मुझे खुले आकाश के नीचे इस भय में जीना पड़ेगा!”
वह अत्यंत व्यथित होकर विलाप कर रहा था।
किंतु अगले ही क्षण वह आश्चर्यचकित रह गया, जब उसने अपने समक्ष कुछ नाविकों को खड़े देखा। उन लोगों ने उसे बताया:
“हमारा जहाज़ पास के समुद्री मार्ग से गुज़र रहा था, तभी हमें इस निर्जन टापू से उठती हुई अग्नि की विशाल लपटें दिखाई दीं। धुआँ और आग देखकर हमें संदेह हुआ कि टापू पर कोई व्यक्ति फँसा हुआ है जिसे सहायता की आवश्यकता है। इसीलिए हम तुरंत आपकी खोज में यहाँ चले आए।”
यह सुनते ही वह व्यक्ति अपने कुछ क्षण पूर्व के आक्षेपों पर अत्यंत लज्जित हुआ और अश्रुपूरित नेत्रों से ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।
सत्य ही कहा गया है कि—”जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है।” ईश्वर की कार्यप्रणाली को समझ पाना मनुष्य की सीमित बुद्धि के वश में नहीं है। कई बार जिसे हम अपना सबसे बड़ा अनिष्ट या विपत्ति मान बैठते हैं, वही वास्तव में हमारे उद्धार का मार्ग बनता है।
