सितंबर, 2024
बबीता झा
लगभग 500 सदस्यों की एक विशेष जूरी ने एक ऐतिहासिक मुकदमे पर विचार किया और अभियुक्त को ‘युवाओं को स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध भड़काने तथा ईश्वर में आस्था न रखने’ का दोषी पाया। जूरी ने उसे ‘हेमलॉक’ (Hemlock) नामक अत्यंत घातक विष पिलाकर मृत्युदंड देने का निर्णय सुनाया।
जूरी ने अभियुक्त से कहा कि यदि वह चाहे तो अपनी सजा में परिवर्तन हेतु आग्रह कर सकता है। तत्कालीन नियमानुसार मृत्युदंड की स्थिति में अभियुक्त स्वेच्छा से ‘देश निकाला’ (निर्वासन) माँग सकता था। अभियुक्त का जनता पर गहरा प्रभाव देखते हुए लोगों का विश्वास था कि यदि वह निर्वासन का आग्रह करेगा, तो जूरी इसे सहर्ष स्वीकार कर लेगी।
निर्भीकता और वैचारिक दृढ़ता

किंतु वह अभियुक्त कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। उसका दृढ़ विश्वास था कि उसने लोगों को सत्य और ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे राज्य व समाज का उत्थान हो सके। इसे वह राज्य के प्रति अपनी ‘श्रेष्ठ सेवा’ मानता था। अतः वैकल्पिक सजा के रूप में उसने जूरी से दंड के बजाय ‘आजीवन निःशुल्क भोजन’ (इनाम) की माँग की।
उसके इस उत्तर से जूरी सदस्य अचंभित और क्रुद्ध हो गए; कईयों को लगा कि वह उनका परिहास उड़ा रहा है या उनकी सत्ता को चुनौती दे रहा है। परिणामतः, जूरी ने ‘सूर्यास्त से पूर्व मृत्युदंड’ का अंतिम आदेश जारी कर दिया।
सजा सुनाए जाने के बाद भी उस महापुरुष के चेहरे पर लेशमात्र भी चिंता या शिकन नहीं थी। उसका मस्तिष्क जीवन भर की भाँति शांत और स्पष्ट था। उसने जूरी के समक्ष भी अत्यंत निर्भीकता से अपने विचार रखे थे।
सत्य का अन्वेषण और कर्तव्य-पालन
मृत्युदंड की प्रतीक्षा में उसे कारागार के एक छोटे से कक्ष में रखा गया। अंतिम समय में उसके कुछ विशेष शिष्यों को मिलने की अनुमति दी गई। शिष्यों ने प्रस्ताव रखा कि कारागार के रक्षक और कर्मचारी उसके अनुयायी हैं, जो उसे सहर्ष जेल से भगाने में सहायता करेंगे ताकि वह अन्य राज्य में जाकर अपने विचारों का प्रचार जारी रख सके।
किंतु उसने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया:
“मैंने जीवन भर सत्य और ज्ञान की खोज की है और लोगों को भी यही सिखाया है। अब जब मुझे मृत्यु के गूढ़ रहस्य को जानने का अवसर मिल रहा है, तो मैं इससे दूर क्यों भागूँ?”
सूर्यास्त समीप आने पर जब उसने विष तैयार करने वाले कर्मचारी को शिथिलता बरतते देखा, तो इसका

कारण पूछा। कर्मचारी ने कहा कि वह उनका प्रशंसक है और उनकी जीवन-अवधि को कुछ क्षण और बढ़ाना चाहता है। इस पर उसने कहा कि उसने जीवन भर कानून का पालन किया है और दूसरों को भी यही सिखाया है—चाहे वह कानून अनुचित ही क्यों न हो; अतः कर्मचारी को भी बिना किसी विलंब के अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
जब उसे हेमलॉक विष का पात्र दिया गया, तो उसने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे शांत भाव से एक ही घूँट में पी लिया और विश्राम की मुद्रा में लेट गया। शरीर में विष फैलने के बाद भी वह अंतिम क्षणों तक अपने शिष्यों से संवाद करता रहा, जब तक कि उसकी साँसें थम नहीं गईं।
सुकरात कौन थे? (470 – 399 ईसा पूर्व)
मृत्यु को इतनी गरिमा और दृढ़ता से स्वीकार करने वाले यह महान व्यक्तित्व थे—सुकरात (Socrates)। इनका जीवनकाल 470 से 399 ईसा पूर्व था। वे प्राचीन यूनान के प्रसिद्ध नगर-राज्य एथेंस के दार्शनिक थे।
द्वंद्वात्मक/प्रश्नोत्तर शैली (Socratic Method): सुकरात की शिक्षण शैली पारंपरिक विचारकों से सर्वथा भिन्न थी। वे कभी सीधे उपदेश नहीं देते थे, बल्कि अत्यंत सरल दिखने वाले प्रश्न पूछते थे; जैसे—‘जीवन क्या है?’, ‘सदाचार क्या है?’। उत्तर मिलने पर वे पुनः उससे भी गहरा प्रश्न पूछते थे। इस शृंखला से व्यक्ति स्वयं चिंतन करने और सत्य तक पहुँचने के लिए विवश हो जाता था।
वैचारिक क्रांति: सुकरात का ध्येय लोगों को अपने विचारों से बाँधना नहीं, बल्कि उनकी चिंतन-शक्ति को जागृत करना था। इस शैली से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में युवा उनके शिष्य बनने लगे। किंतु तत्कालीन शासकों को यह वैचारिक स्वतंत्रता अपनी सत्ता के लिए संकट प्रतीत हुई और उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया।
आधुनिक युग में सुकरात की प्रासंगिकता
सुकरात की शारीरिक मृत्यु के पश्चात भी उनके विचार और पद्धति अमर रहे। उनके शिष्य प्लेटो (Plato) ने उनके विचारों को लिपिबद्ध किया और दर्शनशास्त्र को एक नई दिशा दी।
न्यायपालिका में प्रभाव: आधुनिक अदालतों में गवाहों से प्रतिपरीक्षण (Cross-Examination) और प्रश्नोत्तर द्वारा सत्य की खोज की जो प्रणाली है, उसका आधार सुकरात की प्रश्नोत्तर शैली ही है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था: वर्तमान लोकतंत्र का मूल स्तंभ—जनप्रतिनिधियों के मध्य तर्क-वितर्क, बहस और प्रश्न पूछने की संस्कृति—की जड़ें सुदूर अतीत में सुकरात के चिंतन में ही निहित हैं।
