राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’: ओज, वीरता और राष्ट्रीय चेतना के अमर ध्वजवाहक (हमारे साहित्यकार)

बबीता झा
सितंबर, 2024

“याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।”


‘कुरुक्षेत्र’ में जो यह हुंकार भरते हैं, वही कलम ‘उर्वशी’ में प्रेम का सूक्ष्म आध्यात्मिक निरूपण भी करती है।
“तब भी मरुत अनुकूल हों,
मुझको मिलें, जो शूल हों,
प्रियतम जहाँ भी हों, बिछे सर्वत्र पथ में फूल हों।”
यह ओजस्वी कलम थी हिंदी साहित्य के महान राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की। स्वतंत्रता से पूर्व अँग्रेज़ी सरकार उन्हें ‘विद्रोही कवि’ मानती थी, किंतु स्वतंत्रता के पश्चात संपूर्ण राष्ट्र ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ का गौरवपूर्ण सम्मान दिया।

दिनकर जी का जीवन एवं कृतित्व
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय ज़िले के सिमरिया गाँव में हुआ था। दिनकर जी मुख्य रूप से ऐतिहासिक एवं पौराणिक पात्रों को माध्यम बनाकर वर्तमान समय की विसंगतियों और राष्ट्रीय चुनौतियों पर लिखते थे। उन्होंने 34 से अधिक काव्य-ग्रंथ, 26 से अधिक गद्य-कृतियाँ और 13 निबंध-संग्रह लिखे।
प्रमुख रचनाएँ:
काव्य-कृतियाँ: ‘प्रणभंग’ (1929), ‘रेणुका’ (1935), ‘हुंकार’ (1938), ‘कुरुक्षेत्र’ (1946), ‘रश्मिरथी’ (1952), ‘उर्वशी’ (1961), ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ (1963) आदि।
गद्य-कृति: ‘संस्कृति के चार अध्याय’ (1956)।
उनकी अधिकांश रचनाओं में वीरता, शौर्य, क्रांति और राष्ट्रवाद का प्रखर स्वर गुंजायम है।

प्रमुख रचनाओं का वैशिष्ट्य
उर्वशी (गीति-काव्य): यह ‘उर्वशी’ और राजा ‘पुरूरवा’ की पौराणिक कथा पर आधारित एक काव्यात्मक नाटक है। पुरूरवा पृथ्वी के राजा होकर स्वर्ग के सौंदर्य की कामना करते हैं, जबकि स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी पृथ्वी के पार्थिव सुख व प्रेम की। इसमें प्रेम, सौंदर्य और काम-अध्यात्म का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विवेचन है। इस कालजयी कृति के लिए उन्हें वर्ष 1972 में प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
कुरुक्षेत्र: स्वतंत्रता से ठीक पूर्व (1946 में) प्रकाशित इस काव्य का आधार महाभारत का ‘शांति पर्व’ है। इसमें वे शक्ति के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखते हैं:
“क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।”
रश्मिरथी एवं अन्य काव्य: यही शौर्य का भाव ‘रश्मिरथी’ में निखरकर आता है:
“पत्थर-सी हों मांसपेशियाँ, लोहे-सा भुजदंड अभय,
नस-नस में तेज प्रवाहित हो, तभी जवानी पाती जय।”
तथा ‘वीर’ कविता में वे युवाओं का आह्वान करते हैं:
“वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो,
चट्टानों की छाती से दूध निकालो।”
निर्भीक जन-चेतना: दिनकर जी का यह प्रखर स्वर स्वतंत्रता के बाद भी मंद नहीं पड़ा। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू जी ने उन्हें राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया था, किंतु नीतियों से असहमत होने पर उन्होंने संसद में निर्भीक होकर लिखा:
“देखने में देवता-सदृश लगता है,
बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्यारा हो,
समझो उसी ने हमें मारा है।।”
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के आघात से व्यथित होकर उन्होंने ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में शक्ति का पुनः आह्वान करते हुए लिखा:
“रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
फिरा दे हमें गांडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।”

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पुरस्कार एवं सम्मान
ओज और शौर्य से भरी राष्ट्रवादी रचनाओं के कारण दिनकर जी को ‘युग-चारण’ कहा गया। उन्हें महाकवि भूषण के बाद राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा कवि माना जाता है।
साहित्य अकादमी पुरस्कार: ‘संस्कृति के चार अध्याय’ (1959) के लिए।
ज्ञानपीठ पुरस्कार: ‘उर्वशी’ (1972) के लिए।
पद्म भूषण: भारत सरकार द्वारा 1959 में नागरिक सम्मान से विभूषित किया गया।
संसदीय योगदान: वर्ष 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए और लगातार 12 वर्षों तक संसद सदस्य रहे।
अंतरराष्ट्रीय व अन्य सम्मान: ‘कुरुक्षेत्र’ को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वाँ स्थान दिया गया। भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा ‘मानद डी.लिट्.’, गुरु कुल महाविद्यालय द्वारा ‘विद्या-वाचस्पति’ तथा राजस्थान विद्यापीठ द्वारा ‘साहित्य-चूड़ामणि’ की उपाधियों से अलंकृत किया गया।
डाक टिकट: वर्ष 1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक विशेष स्मारक डाक टिकट जारी किया।

निष्कर्षण
65 वर्ष की आयु में 24 अप्रैल 1974 को तमिलनाडु के मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में इस महाकवि का निधन हो गया। किंतु उनकी ओजस्वी, मानवतावादी और राष्ट्रप्रेमी पंक्तियाँ सदैव भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी:
“किस भांति उठूँ इतना ऊपर?
मस्तक कैसे छू पाऊँ मैं?
ग्रीवा तक हाथ न जा सकते,
उँगलियाँ न छू सकतीं ललाट।
वामन की पूजा किस प्रकार,
पहुँचे तुम तक मानव-विराट?”

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