मार्च, 2024
एक ऐसी महिला, जिनके बचपन में ही पिता का साया उठ गया, कम आयु में विवाह कर दिया गया और प्रारंभिक अवस्था में विद्यालय जाने से वंचित रखा गया—फिर भी उन्होंने अपनी दृढ इच्छाशक्ति से उच्च शिक्षा प्राप्त की, वकील बनीं, स्वतंत्रता सेनानी बनीं, समाज सुधारक बनीं और आज़ादी के पश्चात संविधान सभा के लिए चुनी जाने वाली मद्रास प्रांत की पहली महिला बनीं।
उन्होंने जीवन भर कभी किसी आभूषण या सौंदर्य प्रसाधन का प्रयोग नहीं किया, किंतु जीवन पर्यंत दूसरों के जीवन को सुंदर बनाने का कार्य करती रहीं। इस महान व्यक्तित्व का नाम था—दुर्गाबाई देशमुख।

प्रारंभिक जीवन और व्यक्तिगत संघर्ष
दुर्गाबाई का जन्म 15 जुलाई 1909 को आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री जिले के काकीनाडा नामक स्थान पर एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री बी.वी.एन. रामाराव एक सामाजिक कार्यकर्ता थे, किंतु दुर्गाबाई के बाल्यकाल में ही उनका देहांत हो गया। उनका पालन-पोषण उनकी माता श्रीमती कृष्णवेनम्मा ने

किया, जो स्वयं स्थानीय कांग्रेस समिति की सचिव थीं।
कम उम्र में विवाह और त्याग: तत्कालीन कुरीतियों के कारण मात्र 8 वर्ष की आयु में उनका विवाह एक ज़मींदार से करा दिया गया, किंतु विचारों के मेल न होने के कारण 15 वर्ष की आयु में यह विवाह समाप्त हो गया। इसके पश्चात उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज और देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
शिक्षा के प्रति लगन: उन दिनों लड़कियों को स्कूल भेजने का चलन नहीं था, किंतु पढ़ने की तीव्र ललक को देखकर पड़ोसी हिंदी शिक्षक ने उन्हें घर पर ही पढ़ाना प्रारंभ किया। तेलुगु भाषी क्षेत्र में उन्होंने हिंदी भाषा में इतनी प्रवीणता प्राप्त कर ली कि मात्र 14-15 वर्ष की आयु में (1923 में) उन्होंने बालिकाओं को हिंदी सिखाने के लिए एक विद्यालय खोल लिया।
गांधी जी का प्रोत्साहन: जब महात्मा गांधी को इस बालिका के प्रयास का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने दुर्गाबाई को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। इस घटना ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय होने की प्रेरणा दी।
पुनर्विवाह: वर्ष 1953 में उन्होंने स्वतंत्र भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री चिंतामन देशमुख (सी.डी. देशमुख) से विवाह किया।
स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान
माता के प्रभाव और महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर वे सक्रिय राजनीति में उतरीं। वे आंध्र प्रदेश से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं:
खादी का प्रचार: वे अपनी माता के साथ गाँव-गाँव घूमकर खादी के वस्त्र बेचा करती थीं।
नमक सत्याग्रह (1930): टी. प्रकाशम के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश में शुरू हुए नमक सत्याग्रह में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। इसके कारण 25 मई 1930 को उन्हें गिरफ़्तार कर 1 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
पुनः गिरफ़्तारी और स्वाध्याय: जेल से छूटने के बाद भी वे आंदोलन में डटी रहीं, जिसके कारण उन्हें पुनः 3 वर्षों के लिए जेल भेज दिया गया। उन्होंने जेल के इस समय का सदुपयोग अंग्रेज़ी भाषा सीखने में किया।
शिक्षा और कानूनी करियर
जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने नियमित अध्ययन प्रारंभ किया:
उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में बी.ए. और एम.ए. किया।
वर्ष 1942 में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से ही कानून (Law) की डिग्री प्राप्त की और मद्रास उच्च न्यायालय में वकालत प्रारंभ की।
वे उच्च न्यायालय में हत्या (Murder) के मुकदमे में बहस करने वाली पहली भारतीय महिला वकील थीं।
स्वतंत्रता के पश्चात राष्ट्र-निर्माण और प्रशासनिक योगदान
संविधान सभा में भूमिका: वर्ष 1946 में वे मद्रास प्रांत से विधान परिषद (जो बाद में संविधान सभा बनी) के लिए चुनी गईं। वे संविधान सभा के अध्यक्षों के पैनल में शामिल एकमात्र महिला सदस्य थीं।
केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड (1953): योजना आयोग की सदस्य रहते हुए उनके ही प्रयासों से 1953 में ‘केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड’ का गठन हुआ और वे इसकी पहली अध्यक्षा बनीं।
राष्ट्रीय महिला शिक्षा समिति (1958): भारत सरकार द्वारा गठित इस समिति की वे अध्यक्षा थीं, जिसे ‘दुर्गाबाई देशमुख समिति’ भी कहा जाता है। इस समिति ने 1959 में महिला शिक्षा के विस्तार के लिए क्रांतिकारी अनुशंसाएँ की थीं।
संस्थाओं की स्थापना:
1948: तेलुगु भाषी बच्चों की शिक्षा हेतु ‘आंध्र एजुकेशन सोसाइटी’ (AES) की स्थापना की।
अंधों के लिए कार्य: ‘ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन’ के माध्यम से दृष्टिबाधितों के लिए स्कूल, छात्रावास और ‘प्रकाश इंजीनियरिंग कार्यशाला’ की स्थापना की।
1962: निर्धन वर्ग के मुफ़्त उपचार हेतु एक अस्पताल बनवाया, जो आज ‘दुर्गाबाई देशमुख अस्पताल’ के नाम से प्रसिद्ध है।
पुरस्कार, रचनाएँ और अंतिम समय
रचनाएँ: उन्होंने ‘द स्टोन दैट स्पीक्स’ (The Stone That Speaketh) नामक पुस्तक लिखी। उनकी आत्मकथा ‘चिंतामन और मैं’ (Chintaman and I) उनके निधन से एक वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई थी।
सम्मान: भारत सरकार ने उन्हें 1975 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें ‘नेहरू साक्षरता पुरस्कार’, ‘यूनेस्को पुरस्कार’ और ‘पॉल जी हॉफ़मैन पुरस्कार’ प्राप्त हुए। 1982 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया।
निधन:
9 मई 1981 को आंध्र प्रदेश में इस महान वीरांगना का निधन हो गया। दुर्गाबाई देशमुख का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि विषम परिस्थितियाँ भी यदि दृढ़ संकल्प के सामने आएँ, तो वे मार्ग की बाधा नहीं बन सकतीं।
