सितंबर 2026

गुरुग्राम, हरियाणा
सतवंत कौर और निमरत कौर में गहरी मित्रता थी। दोनों का दिन एक-दूसरे से मिले बिना पूरा न होता था। संयोग से वे पास-पास ही रहती थीं। दोनों का जीवन एक-दूसरे के लिए खुली किताब जैसा था। दोनों साथ मिलकर गुरुद्वारे जाती थीं; दोनों का स्वभाव अत्यंत धार्मिक था।
सतवंत कौर अपने पति को १५ वर्ष पहले ही खो चुकी थीं। उन्होंने अपने बेटे का विवाह बहुत धूमधाम से किया था। वे अपनी बहू को बहुत चाहती थीं। चूँकि बहू नौकरी पर जाती थी, इसलिए घर का सारा काम सतवंत कौर ही संभालती थीं। धीरे-धीरे बहू ने जब अपने असली रंग दिखाने शुरू किए, तो वे जानकर भी अनजान बनी रहीं। अपने नम्र स्वभाव के कारण वे कुछ सह लेतीं और कुछ अनदेखा कर देतीं, यह सोचकर कि— “अभी नादान है, धीरे-धीरे घर-गृहस्थी की समझ आ जाएगी।”
बढ़ता अत्याचार और खामोशी
एक दिन सतवंत कौर अपनी सहेली से बोलीं— “आज तो मन्नत ने हद ही कर दी! मैं अपनी चाबी साथ लेकर गुरुद्वारे गई थी। वापस आई तो मैं बाहर से चाबी लगाती रही, पर उसने अपनी चाबी अंदर से लगाकर रखी हुई थी। ताला भी न खुले और मैंने कितने फोन किए, पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैं पसीने-पसीने होकर बाहर खड़ी रही।”
यह कहते-कहते वे निमरत के सामने रोने लगीं; उनके आँसू थम ही नहीं रहे थे। अब तो यह रोज़ का सिलसिला हो गया था। सतवंत कौर ने कभी अपने बेटे को यह सब बताने की हिम्मत नहीं जुटाई, क्योंकि उन्हें डर था कि घर में कलेश हो जाएगा।
एक दिन रविवार को बहू और बेटा दोनों घूमने गए। रास्ते भर मन्नत झगड़ा करती रही। चिरदीप सिंह ने गाड़ी रोकी और कहा— “तुम गाड़ी से उतर जाओ, नहीं तो एक्सीडेंट हो जाएगा।”
इस पर मन्नत ने उसे ही थप्पड़ पर थप्पड़ मारने शुरू कर दिए। वहाँ भीड़ इकट्ठा हो गई। चिरदीप सिंह शर्म के मारे गाड़ी छोड़कर पैदल ही घर की ओर चल पड़ा। धीरे-धीरे यह रोज़ का क्रम बन गया था; कभी सतवंत कौर तो कभी चिरदीप सिंह उसका शिकार बनते। मन्नत ने माँ-बेटे का जीवन नरक बना दिया था।
उच्छृंखलता और तलाक का षड्यंत्र
घर के कामकाज से मन्नत को कोई मतलब नहीं था। कभी ‘स्विगी’ तो कभी ‘ज़ोमैटो’ से खाना ऑर्डर करती और खुद कमरे में बैठकर खा लेती। बूढ़ी माँ घर में साथ रहती हैं, उनसे पूछने का उसने कभी कोई औचित्य न समझा। धीरे-धीरे वह ड्रग्स भी लेने लगी। देर रात तक तेज़ संगीत बजाकर अपने दोस्तों को घर बुलाती, पार्टियाँ करती, न जाने कौन-कौन से ड्रिंक्स मँगवाती और खाना ऑर्डर करती। अगले दिन १२ बजे से पहले वह कमरे से बाहर न निकलती। सतवंत कौर, जो वाहेगुरु से डरकर रहने वाली स्त्री थीं, चुपचाप यह तमाशा देखती रहतीं और अपने कमरे में जाकर आँसू बहातीं।
पानी सिर के ऊपर से गुज़र चुका था। अब इससे छुटकारा पाना ही एकमात्र हल था, पर यह काम इतना आसान नहीं था। मन्नत की इन हरकतों के पीछे उसकी माँ का हाथ था। उनकी योजना थी कि मन्नत जब तलाक देगी, तो हर्ज़ाने में मोटी रकम मिलेगी।
वही हुआ! उसने पहले तो अपनी माँ के पास रहना शुरू किया, फिर बहुत मोटी रकम की माँग की। माँ-बेटे ने अपना घर बेचकर वह रकम चुकाई, पर उन्होंने निश्चय कर लिया था कि— “इस अत्याचार से तो छुटकारा पाना ही है।” मन्नत के मायके वालों की योजना सफल हो गई। इसके बाद सतवंत कौर और चिरदीप दूसरी सोसाइटी में एक छोटा घर लेकर रहने लगे।
दो साल बाद…
“मासी जी! मासी जी! तुसीं जल्दी आ जाओ!”—इतनी ज़ोर-ज़ोर से दहाड़े मारकर रोते हुए सतवंत कौर की बेटी फोन पर कहे जा रही थी— “मम्मी सानू छड के चले गए (मम्मी हमें छोड़कर चली गईं)।”
निमरत कौर यह सुनते ही तड़प उठीं और रोते हुए बोलीं— “तेरी मम्मी ने तो चिरदीप का विवाह अपने हाथों से करना था, दस दिन बाद तो उसका विवाह है!”
अपने बेटे का नया रिश्ता पक्का करके सतवंत कौर स्वर्ग सिधार गईं। वे एक ऐसी जगह पहुँच गईं जहाँ उन्हें सताने वाला अब कोई न था।
आज भी निमरत कौर की आँखें अपनी सखी को याद करके भीग जाती हैं, जब वे देखती हैं कि— “चिरदीप की नई पत्नी सिमरन कितनी अच्छी बहू बनकर आई है, उनका एक बेटा भी है और सुखी परिवार है।” पर शायद यह सुख सतवंत कौर के भाग्य में देखना नहीं लिखा था
