बबीता झा
मार्च, 2025
प्राचीन समय की बात है। एक गाँव में चार मित्र रहते थे। वे चारों उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय गए। वहाँ रहकर उन्होंने अन्य अनेक विद्याओं के साथ-साथ ‘मृत-संजीवनी विद्या’ भी सीखी। शिक्षा पूर्ण होने के बाद चारों अत्यधिक उत्साह और प्रसन्नता के साथ अपने गाँव के लिए लौटे। वे सोच रहे थे कि जब गाँव के लोगों को उनकी इस अद्भुत विद्या का पता चलेगा, तो वे कितने चकित और प्रसन्न होंगे।
मार्ग में एक सघन जंगल से गुज़रते समय अचानक उनकी दृष्टि एक शेर के कंकाल पर पड़ी। अपनी विद्या की परीक्षा लेने और गाँव वालों को प्रभावित करने के विचार से उन्होंने इसका प्रयोग करने का निर्णय लिया।
पहले मित्र ने अपनी विद्या से कंकाल पर माँस चढ़ाया।
दूसरे मित्र ने नसें, रक्त और आंतरिक अंग बनाए।
तीसरे मित्र ने शरीर को चमड़ी से ढक दिया। अब वह कंकाल एक सद्य-मृत शेर प्रतीत हो रहा था।
जब उन्होंने चौथे मित्र से उस शेर में प्राण फूँकने को कहा, तो उसने इसके भावी परिणाम के प्रति सचेत किया। किंतु शेष तीनों मित्र अपनी विद्या के अहंकार और उत्साह में इतने अंधे हो चुके थे कि वे परिणाम के बारे में सोचने को तैयार ही नहीं थे। वे चौथे मित्र को ताना देने लगे कि शायद उसे विद्या ठीक से नहीं आती, इसलिए वह डर रहा है।
जब तीनों ने उसकी चेतावनी नहीं मानी, तो चौथे मित्र ने कहा, “यदि तुम इसे जीवित करने पर ही तुले हो, तो मुझे पहले किसी सुरक्षित स्थान (पेड़) पर चढ़ जाने दो।”
चौथा मित्र दूर हट गया और तीनों ने शेर को जीवित कर दिया। जीवित होते ही शेर ने उन तीनों मित्रों पर हमला कर उन्हें मार डाला।
यह कथा स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पुस्तकीय या सैद्धांतिक ज्ञान का प्रयोग सदैव सामान्य विवेक बुद्धि (Common Sense) के साथ ही किया जाना चाहिए। इसका एक अन्य बड़ा उदाहरण रावण है। उसे समस्त शस्त्रों और शास्त्रों का प्रकांड ज्ञान था, किंतु उस ज्ञान ने उसे अभिमानी बना दिया और सही-गलत का विवेक समाप्त कर दिया। इसी कारण विद्वान होने के बावजूद हज़ारों वर्षों से उसका पुतला जलाया जाता है। दूसरी ओर, माता शबरी औपचारिक रूप से अशिक्षित थीं; उन्होंने शास्त्रों का ज्ञान केवल सुनकर अर्जित किया था, किंतु अपने आचरण, सहज विवेक और भक्ति-भाव के कारण वे युगों-युगों से वंदनीय हैं।
उपर्युक्त उदाहरणों का अर्थ यह कदापि नहीं कि शिक्षा या पुस्तकें अनावश्यक हैं। पढ़ना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अपने आंतरिक और बाह्य जगत को समझने के लिए हमारा जीवन बहुत छोटा है और हमारी इंद्रियों की क्षमता सीमित है। पुस्तकें दूसरों के जीवन-अनुभवों और दृष्टिकोण को जानने का सशक्त माध्यम हैं।
पुस्तकीय ज्ञान हमें तथ्य और अनुभव देता है, जिसका प्रयोग सहज विवेक से करना होता है।
‘पढ़ाई’ हमारे विचारों का विस्तार कर सहज विवेक को और प्रखर बनाती है।
दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यही कारण है कि हमारी भारतीय संस्कृति में विद्या की देवी सरस्वती के साथ विवेक के देवता गणेश की पूजा की परंपरा रही है।
वास्तव में, पुस्तकें पढ़ना जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही यह जानना भी आवश्यक है कि ‘क्या, कैसे, कब और कितना पढ़ना चाहिए?’ वर्तमान डिजिटल युग में इस संदर्भ में निम्नलिखित 8 प्रमुख चुनौतियाँ उभरकर आई हैं:
अत्यधिक मानसिक भटकाव (Distractions): इंटरनेट पर ध्यान भटकाने वाली सामग्रियाँ (Entertainment/Sensational Content) गंधर्वों और अप्सराओं के आकर्षण से भी अधिक प्रभावी रूप से उपलब्ध हैं।
शॉर्ट-फ़ॉर्म कंटेंट और ध्यान केंद्रित न होना: 2 मिनट की मैगी, 10 मिनट की डिलीवरी और 30-60 सेकेंड की ‘रील्स’ (Reels) के दौर में मानव मस्तिष्क का किसी एक गंभीर विषय पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित (Focus) रखना कठिन हो गया है।
एल्गोरिदम का दायरा (Filter Bubbles): इंटरनेट पर हम जो खोजते या देखते हैं, एल्गोरिदम हमें केवल उसी से मिलती-जुलती सामग्री दिखाता है। इससे मौलिक और सृजनात्मक विचारों से साक्षात्कार घट जाता है।
मार्केटिंग का प्रभाव: आक्रामक विपणन (Marketing), विज्ञापनों और ‘रीडर्स चॉइस’ जैसे टैग्स के कारण कई उत्कृष्ट और गंभीर रचनाएँ पाठकों की दृष्टि से ओझल रह जाती हैं।
कॉपीराइट का संकट: डिजिटल माध्यमों पर बौद्धिक संपदा (Copyright) को सुरक्षित रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
एआई (AI) से अनुचित प्रतिस्पर्धा: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) कुछ ही सेकेंडों में कहानियाँ या कविताएँ उत्पन्न कर देती है, जिससे मूल और गंभीर लेखकों के समक्ष असमान प्रतिस्पर्धा खड़ी हो गई है।
रॉयल्टी और स्वामित्व की समस्या: डिजिटल प्रतियों में संपादन कर मूल लेखक का नाम हटाना और उसे उसकी रॉयल्टी/श्रेय से वंचित करना आसान हो गया है।
भाषाई अराजकता: स्व-प्रकाशन (Self-Publishing) के अनियंत्रित प्रसार ने गुणवत्तापूर्ण संपादन की प्रक्रिया को कमजोर किया है, जिससे भाषाई गुणवत्ता में गिरावट आई है।
इन चुनौतियों के साथ-साथ डिजिटल युग ने पाठकों और लेखकों को 4 बड़े अवसर भी प्रदान किए हैं:
वैश्विक और सुलभ सामग्री: विश्वभर का साहित्य और विभिन्न भाषाओं की सामग्री बिना किसी भौगोलिक या समय की सीमा के, नि:शुल्क या न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध है।
प्रत्यक्ष लेखक-पाठक संवाद: लेखक और पाठक बिना किसी बिचौलिए के सीधे आपस में विचार-विमर्श कर सकते हैं।
प्रकाशन की स्वतंत्रता: प्रतिभाशाली लेखकों की पारंपरिक प्रकाशकों पर निर्भरता समाप्त हुई है। वे ब्लॉग, ई-बुक्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से सीधे पाठकों तक पहुँच सकते हैं।
बहु-आयामी माध्यम (Multi-Media Integration): पुस्तकों को अब ऑडियो-बुक्स, वीडियो, ग्राफिक्स और एनिमेशन के माध्यम से अधिक रोचक बनाया जा रहा है। इससे भिन्न-भिन्न अभिरुचि वाले लोग अपनी सुविधा अनुसार पढ़, देख या सुन सकते हैं।
निसंदेह डिजिटल युग ने पठन-पाठन के संसार और पाठकों की प्राथमिकताओं को व्यापक रूप से बदला है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं। आज जब मस्तिष्क को भ्रमित और दूषित करने वाले तत्त्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, तब एक स्वस्थ, संतुलित और प्रखर मस्तिष्क के लिए सद्साहित्य पढ़ने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम तकनीक का उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करें।

