सीताराम गुप्ता
पीतमपुरा, दिल्ली
सितंबर, 2025
जब भी कोई व्यक्ति बीमार होता है तो वह सीधे डॉक्टर के पास जाता है। डॉक्टर रोगी का भली-भाँति परीक्षण करने के उपरांत ही अपेक्षित दवाएँ देता है। यदि बाह्य लक्षणों व सामान्य जाँच से रोग पूरी तरह से डॉक्टर की समझ में नहीं आता है तो वो कुछ टेस्ट भी लिख देता है और उनकी रिपोर्ट आने के बाद ही मरीज़ का वास्तविक उपचार प्रारंभ करता है। रोग को ठीक से जाने बिना उसका उपचार करने के भयंकर परिणाम हो सकते हैं। केस बिगड़ सकता है और मरीज़ की मौत तक हो सकती है। यदि केस न भी बिगड़े तो मूल बीमारी तो ठीक होगी नहीं और जो उपचार किया गया है वह भी व्यर्थ जाएगा। इस स्थिति से बचने के लिए रोग का सही निदान या डायग्नोसिस अनिवार्य है। जीवन में उपस्थित होने वाली समस्याओं के विषय में भी यह फ़ॉर्मूला पूरी तरह से लागू होता है।
जब कोई नई समस्या उत्पन्न होती है तो हम प्रायः कहते हैं कि लो ये और एक बीमारी गले आ पड़ी। बिल्कुल ठीक ही तो कहते हैं। समस्या भी एक बीमारी की तरह ही होती है और जब तक उसका सही निदान अथवा डायग्नोसिस नहीं हो जाता समस्या का समाधान करना भी असंभव नहीं तो कठिन ज़रूर हो जाता है।
जैसे ही हमारे सामने कोई समस्या उपस्थित होती है सबसे पहले हमें समस्या अथवा समस्या के स्वरूप को समझना चाहिए। प्रायः ऐसा होता है कि जैसे ही कोई समस्या उत्पन्न होती है हम फौरन उसके समाधान में जुट जाते हैं क्योंकि हम समस्या को जल्दी से जल्दी समाप्त कर देना चाहते हैं। कहा गया है कि जल्दी का काम शैतान का होता है। यह समस्या को और ख़राब कर सकता है। स्वाभाविक-सी बात है कि जब भी कोई समस्या आती है तो हमारे हाथ-पाँव फूल जाते हैं। हम घबरा जाते हैं और घबराहट में एकदम सही निर्णय लेना संभव नहीं होता। इससे समस्या का तात्कालिक अपूर्ण अथवा आंशिक समाधान बेशक हो जाए, पूरा अथवा अपेक्षित उचित समाधान असंभव है। यदि सतही तौर पर कोई फौरी हल निकाल भी लिया जाए तो वह समस्या बाद में विकराल रूप धारण कर सकती है इसलिए समस्या के मूल में जाकर उसे समूल नष्ट करना अनिवार्य है और यह तभी संभव है जब हम समस्या को पूरी तरह से जान लें। वैसे भी जब हम शांत होते हैं तो हमारा एकाग्र होना आसान हो जाता है और एकाग्रता की अवस्था में समस्या का कोई न कोई उचित समाधान भी सूझ ही जाता है।
परीक्षा में जब प्रश्नपत्र मिलता है तो सबसे पहले उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए। एक बार नहीं दो, तीन या चार बार पढ़ा जाना चाहिए ताकि सभी प्रश्न अच्छी तरह से समझ में आ जाएँ। इसीलिए आजकल विद्यालयों में विद्यार्थियों को प्रश्नपत्र पढ़ने के लिए पंद्रह मिनट का अतिरिक्त समय दिया जाता है। प्रश्नपत्र की तरह ही समस्या को ध्यानपूर्वक पढ़ना अथवा समझना ज़रूरी है। इसलिए जब भी कोई समस्या दरपेश आए हम फ़ौरन कोई भी क़दम न उठाएँ अथवा प्रतिक्रिया न करें। समाधान करने या कोई भी स्टेप उठाने से पहले समस्या को बहुत अच्छी तरह से देखना-समझना अथवा उसका विश्लेषण करना बहुत ज़रूरी है।
बहुत पुरानी घटना है। मेरे मामाजी की दुकान में मिट्टी तेल से भरे एक कनस्तर में आग लग गई। वहाँ सामान ख़रीदने आए एक व्यक्ति ने फौरन लपटों से घिरे उस मिट्टी तेल के कनस्तर को एक जूट की बोरी से पकड़कर दुकान से बाहर फेंक दिया। दुकान में भयंकर आग लग सकती थी उससे तो बच गए पर बाहर तेल फैलने और उसमें आग भड़कने से दुकान के बाहर बैठी मेरी नानी व अन्य कई लोग बुरी तरह से झुलस गए। कुछ घंटों के बाद मेरी नानी की तो मौत ही हो गई। किसी द्वारा बिना सोचे-समझे लिए गए निर्णय के कारण ही मैं अपने बचपन में अपनी नानी को नहीं देख पाया।
जब हम स्वयं किसी समस्या का समाधान करने में किसी भी प्रकार से सक्षम नहीं होते तो हमें स्वयं उसके समाधान के लिए आगे न आकर सही व्यक्ति या व्यक्तियों की मदद लेनी चाहिए। मान लीजिए कुछ दोस्त किसी नदी के किनारे पिकनिक मनाने जाते हैं। उनमें से दो दोस्त नदी में नहाने के लिए उतरते हैं। उन्हें नदी में कितना पानी है इसका बिलकुल अनुमान नहीं है। वे दोनों जैसे ही नदी में थोड़ा आगे जाते हैं डूबने लगते हैं। उनको डूबता देखकर उनको बचाने के लिए उनका एक दोस्त फ़ौरन नदी में छलाँग लगा देता है। डूबते हुए दोस्तों को बचाना तो दूर वह स्वयं उनसे पहले डूब जाता है। कारण स्पष्ट है कि डूबते हुए दोस्तों को बचाने का प्रयास करने के इच्छुक दोस्त को तैरना बिलकुल नहीं आता था। उसका इरादा नेक था लेकिन भावना में बहकर लिया गया उसका निर्णय अविवेकपूर्ण व ग़लत था जिससे समस्या और बढ़ गई।
समस्याओं के समाधान के संबंध में यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि यदि हमें किसी समस्या को हल करने की कोई जानकारी, तरकीब अथवा अनुभव नहीं है तो हम स्वयं ज़्यादा माथापच्ची करने के बजाय किसी योग्य व्यक्ति अथवा विशेषज्ञ की सेवाएँ लेने का प्रयास करें।
किसी भी समस्या का समाधान विवेकपूर्ण तरीके से होना चाहिए। मान लीजिए आपको किसी से कुछ पैसे लेने हैं। वो व्यक्ति हमेशा टालमटोल करता रहता है। एक दिन आपने सख़्ती दिखलाई तो उसने कहा कि नहीं देता और जो करना है कर ले। थोड़ी समझदारी से काम लेकर स्थिति को बिगड़ने से बचाया जा सकता है। थोड़े संयम से काम लिया जा सकता है। लेकिन आपने छुरा निकाला और घोंप दिया उसके पेट में। ये तो कोई समाधान नहीं हुआ। क्या आज ही ज़िंदगी का आख़िरी दिन है जो सबसे हिसाब पूरे करने हैं? समाधान की बजाय आपने अपना जीवन ही नष्ट कर डाला। आर्थिक हानि नाम की कोई चीज़ नहीं होती। जान है तो जहान है। यह अत्यंत अनिवार्य है कि हम समस्याओं को हल करने के लिए ग़लत तरीक़ों अथवा संसाधनों का प्रयोग कदापि न करें।
हर समस्या एक बीमारी की तरह ही होती है और जब तक उसका हल या समाधान नहीं हो जाता हम केवल बेचैन ही नहीं रहते अपितु समस्या का हल या समाधान न होने पर सचमुच बीमार पड़ सकते हैं। क्योंकि समस्याओं का सीधा संबंध हमारे स्वास्थ्य से है अतः समस्याओं का हल या समाधान भी हमारे उपचार व अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति में सहायक होता है। तो क्या समस्याओं का समाधान अथवा निराकरण भी बीमारियों की तरह ही किया जा सकता है? हाँ, अवश्य किया जा सकता है। जीवन में समस्याओं से मुक्ति असंभव है। यदि समस्याएँ नहीं होंगी तो परेशानियाँ और कष्ट नहीं आएँगे और परेशानियाँ और कष्ट नहीं आएँगे तो जीवन ही एक समस्या बन जाएगा। जीवन का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा क्योंकि प्रत्येक समस्या व्यक्ति के जीवन में बेहतर लाभ के अवसर लेकर उपस्थित होती है। इसलिए जीवन में समस्याओं से घबराकर भागिए मत अपितु समस्याओं का स्वागत कीजिए उन्हें चुनौती के रूप में स्वीकार कीजिए और उनका हल खोजने का प्रयास कीजिए।
कभी-कभी अरुचिकर लगने वाले कार्य हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं और हम हैं कि उन कार्यों की लगातार उपेक्षा करते रहते हैं लेकिन जब हम उन्हें पूरा करने की ठान लेते हैं या उनमें रुचि लेने लगते हैं तो ये कार्य न केवल आसानी से पूरे हो जाते हैं अपितु इनसे हमें लाभ भी होता है। कई बार कुछ कामों को लेकर हमारे मन में एक डर समाया होता है लेकिन जब हम कार्य प्रारंभ कर देते हैं तो यह जानकर हैरान हो जाते हैं कि ये कार्य करना तो बच्चों का खेल था। जब आप ऐसे कार्य निपटाना शुरू करते हैं तो जैसे-जैसे आपके कार्य पूर्ण होते जाते हैं अथवा समस्याएँ सुलझती जाती हैं आपमें अभूतपूर्व उत्साह और आत्मविश्वास पैदा होने लगता है। इससे जीवन के सभी क्षेत्रों में लाभ अथवा सफलता मिलने लगती है।
पहले जो कार्य आपको समस्याएँ लगते थे अब एकदम साधारण लगने लगते हैं। यदि कोई बड़ी समस्या भी आ जाती है तो वह भी अत्यंत सामान्य दिखलाई पड़ती है और आसानी से हल कर ली जाती है। नए-नए कार्य अथवा उत्तरदायित्व जो आपको वहन करने होते हैं यदि आप उन्हें समस्याएँ भी कहते हैं तो इन समस्याओं को समाप्त करने की दिशा में फौरन अग्रसर हो जाइए अन्यथा ये समस्याएँ चिंताओं का रूप धारण कर आपकी प्रसन्नता को समाप्त कर देंगी। ये चिंताएँ ही तो हैं जो चिता या मौत के समान होती हैं। इनसे आप तनाव तथा अन्य मानसिक व्याधियों के शिकार हो जाते हैं। ये मानसिक व्याधियाँ ही बाद में शारीरिक व्याधियाँ बन कर आपका स्वास्थ्य क्षीण कर आपकी कार्य क्षमता समाप्त कर देती हैं तथा आपका सुख-चैन छीन लेती हैं। इन समस्या रूपी पौधों को पनपने मत दीजिए, उन्हें फ़ौरन जड़ से उख़ाड़ फेंकिए।
तनाव आज के युग की सबसे भयंकर मानसिक व्याधि है। तनाव से ही अधिकतर शारीरिक रोग पैदा होते हैं। समस्याओं का हल न होने से व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है और ये तनाव बढ़ता ही चला जाता है जो बाद में डिप्रेशन का रूप ले लेता है। समस्याओं का समाधान करके आप न केवल तनावजन्य मनोदैहिक रोगों से बच सकेंगे अपितु सदैव स्वस्थ, प्रसन्नचित्त तथा उत्साहपूर्ण भी बने रहेंगे। यदि सदैव स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त बने रहना है तो समस्याओं से भागने की अपेक्षा उनको स्वीकार कीजिए, उनका विश्लेषण करके उनका सही हल खोजने का प्रयास कीजिए।
यदि कई समस्याएँ एक साथ उत्पन्न हो जाती हैं तो इसी तरीक़े से एक-एक करके उन्हें समाप्त कर डालिए। मज़ेदार बात यह है कि रोगों के उपचार की तरह ही समस्याओं का निराकरण करना संभव है और समस्याओं का निराकरण स्वयं एक उपचार पद्धति है।
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