दिसंबर, 2025

समरपार्क, निपानिया इंदौर, मप्र
अभी हाले हाल कोर्ट में जूता फिंका तो बबाल मच गया, हाय तौबा मच गई? जूता ‘लेदर’ का था तो चर्चा में आ गया किंतु सदियों से सोने का, चांदी का जूता सर्वत्र चल रहा है पर कौन बोला? सोने-चांदी के जूते सब शांति से सहन करते है। कोर्ट में बहस चलें तो जायज है लेकिन जूता चलना अशोभनीय, निंदनीय, अफ़सोसनाक है।
पर यारों जूते तो सदियों से सदनों में चलते आये है, कोई नई बात नहीं है पर ये लेदर का शूज ‘हाइलाइट’ हो गया, चांदी का होता तो “एयरटाइट” हो जाता, पता भी नहीं चलता? आजकल जूते बेभाव, महंगे होकर सड़कों पर कम सदनों, कोर्टों, महफिलों में बिंदास चल रहे है और सोशल मीडिया पर छा रहे है। वर्षों से सोने का जूता दफ्तरों में, फाइलों में, भ्र्ष्टाचार में, घूसखोरी में चल रहा है कौन ने खिलाफत की, किसने कंठ फाड़ा?
पहले के बुजुर्ग इन जूतों को घर में, रसोई तक में प्रवेश वर्जित रखते थे अब ये न्यायालय में भी चल पड़े हैं? ये बहुत नाइंसाफी तो है किंतु ये जूते का वक्त है। ये वक्त का जूता है जो मर्यादा तोड़कर चल रहा है। जूते को भी सोचना चाहिए कि वो सिर्फ रास्तो पर ही चलें, बेरास्तो, सदनों में प्रवेश न करें पर जालिम मर्जी पड़े वही चल पड़ता है? कहते है की वक्त का जूता अच्छे-अच्छे पहलवान को भी ढ़ीला कर देता है और चांदी का ‘शूज़’ कुपोषित, मरियल, मरेखाद व्यक्ति को भी गामा पहलवान बना देता है। साहित्य में कई लोग जूता घिसते रहते है पर कुछ की चरण पादुका चरम पर होती है। आजकल तो कीमती जूते देख, महिलाएं भी पिघल जाती है। फ़टे जूते को देखकर कौन घास डाले?
सम्राट कॉन्स्टेंटियस को उसी की सभा में, लगभग ढाई हजार साल पहले एक विद्रोही ने पहला जूता मारा था। केवल भारत में ही नहीं, दुनिया भर में जूता निम्नतम अपमान का प्रतीक रहा है। जूता चोटिल कम करता है, अपमानित अधिक, जूता फेंकने वाला ‘केवल हिंसक’ नहीं होता यदि वह केवल हिंसक होता तो पत्थर फेंकता। पत्थर, चोटिल अधिक करता है, आहत कम। जूता, एक ‘असहाय-आक्रोश’ की अभिव्यक्ति है। एक कुचला हुआ प्रतिरोध, जो किसी पर कुछ फेंकने में निहित, न्यूनतम-हिंसा से खुद को बचा नहीं सकता। जैसे किसी के मुंह पर थूकने में हमला निहित है लेकिन थूक का लक्ष्य देह को घायल करना नहीं। ये अंतरात्मा को घायल करने का प्रयास है।
जूता सदियों से अपमान का शक्तिशाली स्वर रहा है। माध्यम रहा है। अशक्त-क्रोध ने कई बार जूते को अभिव्यक्ति बनाया है। संस्कृत कवि भास के दो हजार साल पुराने नाटक ‘प्रतिज्ञायौगंधरायण’ में मंत्री यौगंधरायण, सेवक को सलाह देता है कि ‘नृपं प्रति पादत्राणेन ताडयेत्’ अर्थात ”राजा की तरफ जूता फेंक कर मारना” । जूता दैहिक रूप से राजा का क्या बिगाड़ेगा? जूते का लक्ष्य देह होती ही नहीं?
भारतीय लोकोक्तियों की दुनिया तो एक चलता-फिरता ‘जूताखाना’ है। किसी को अपमानित करने के लिए जितना वैविध्य जूते में है, उतना अन्य किसी शब्द में नहीं। जैसे किसी को ‘जूते की नोक पर रखना’ । कोई नोक इतना आहत नहीं करेगी जितना ‘जूते की नोक’। ‘सौ-सौ जूते खाय, तमाशा घुसकर देखेंगे” ये लोकोक्ति उन बेशर्मों का सम्मान है, जो अपमानप्रुफ हो चुके। ”जूते चाटना” कोई कह दे तुम उसकी घडी, अंगूठी, कड़ा, पगड़ी चाटते हो तो चल जायेगा लेकिन ‘जूता चाटना’ दो ही शब्द काफी हैं ये बताने के लिए कि लक्ष्य कहाँ है।
जूतों को छोड़कर बाकी अधिकांश मालाएं केवल सम्मानित करती हैं। अकेली जूतों की माला है जो ‘अति सम्मानित’ करने के लिए पहनाई जाती है। सूखा जूता तो फिर भी ठीक था। रचनात्मक शिल्पियों ने अधिकतम उपार्जन के लिए ‘भिगोकर जूते मारना” भी अविष्कृत किया। कुछ कहते हैं दुष्ट से ‘जूता हाथ में लेकर ही बात करनी’ चाहिए। बड़े-बूढ़े कहते हैं ‘भाग सोया हो तो नए जूते भी काटते हैं।
जूता महात्म्य जहाँ तक बखाना जाये, कम है। पहिये और आग के बाद मानव सभ्यता की तीसरी बड़ी खोज जूता ही है। इस जगत में जितने भी युगल हैं, उनमे सबसे शाश्वत जोड़ी जूतों की ही है। एक के बिना दूसरा हवा में तो चलता है जमीन पर नहीं। आस्था और विनम्रता का स्तर ऐसा कि मंदिर की सीढ़ियों पर ही जीवन काट देता है। आज़ादी की लड़ाई में भी जूते ने अपना योगदान दिया। लाहौर और बनारस की विरोध-सभाओं में जूते दिखाकर नारे लगाए जाते थे ”शासक के पाँव का जूता नहीं बनेंगे” फ़ारसी में एक शब्द है ‘पैज़ार’। जिसका मतलब भी जूता ही है लेकिन यदि ये किसी तरह ‘जूतम’ से मिल जाए तो फिर जो ‘जूतम-पैज़ार’ होगी, वो अविस्मर्णीय होगी। कई बार जब ‘तर्क’ हार जाता है, ‘जूता वाद’ जीत लेता है इसलिए जब ‘शब्द’ नहीं चलते तब ‘जूते’ चलते हैं।
किसी व्यक्ति को आप उसके चेहरे से अधिक जूतों से जान सकते हैं” जूता केवल व्यक्ति को गिरने से ही नहीं बचाता, चरित्र गिरने से भी बचाता है, इसलिए जूता चरित्र से कम फिसलता है। पुराने कई जमीदार मूंछों की नोक से भी पैनी जूतों की नोक रखते थे। जूते पर लिखने के लिए कितने भी जूते घिसो, कम है। इसलिए तमाम विश्व में आज तक फेंके गए समस्त जूतों की ‘कड़ी निंदा’ करते हुए।
जूताख्यान को यहीं विराम देकर, अपने जूते खोजता हूँ, ताकि घूमने जा सकूँ। जूता अभी हाल में कोर्ट में चल पड़ा? जो हुआ निंदनीय, अफसोसनाक, खेदनाक, अशोभनीय कृत्य हो गया। पर ये तो सदियों से चल रहा है। लेकिन गुपचुप, सबके सामने चला तो चर्चित हो गया।
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