एक माँ ऐसी भी

जून, 2026

अंजली खेर
भोपाल


संकल्‍प के कमरे का दरवाजा खोलते ही वीणा का मन कसैला सा हो गया। कितना बे‍तरतीब सा कर रखा हैं, धुले कपड़े चादर की गठरी से बाहर निकलकर जैसे चिढ़ा रहे थे – “बहुत तहज़ीब पसंद हो ना, अब अपने बेटे को थोड़ा शरूर सिखाओं तो जानें।”
चादर झटकारने के लिए तकिया उठाया ही था कि देखा, तकिये के नीचे रोमांटिक पत्रिका रखी हुई हैं, पन्‍ने पलटे तो मन घृणा से भर उठा – “ये मेरा ही बेटा है? घिन आती है इसकी सोच पर मुझे। सोचने को मजबूर हो जाती हॅू कि क्‍या वाकई बच्‍चों के गुण-अवगुण, आदतें माता-पिता के जींस पर ही निर्भर करते हैं? संकल्‍प के पापा और मैं तो ऐसे नहीं थे, फिर ये हमारा बेटा ऐसा कैसे हो गया?”
चादर झटकारकर वीणा से मैग्‍जीन जस की तस तकिये के नीचे रख दी। कमरा थोड़ा सलीके से करके वह बाहर आई तभी डोरबेल बजी। दरवाजा खोला तो सामने संकल्‍प कॉलेज का बैग पकड़े खड़ा था।
हाय मॉम, कैसी हो, क्‍या कर रही हो – संकल्प अंदर आते हुए बोला।
मैं तो ठीक हॅू। चाय बना रही हॅू, पीयेगा मेरे साथ? वीणा ने पूछा।
मेरे मन की बात कह दी मॉम, आप चाय बनाओ जल्‍दी से, बहुत थकान सी लग रही हैं । मैं फ्रेश होकर आता हॅू- कहकर संकल्प वाशरूम में चला जाता है।
वीणा दो कप चाय और बिस्किट ट्रे में रख लेकर् आती है और सोफे पर बैठ जाती है। संकल्‍प टॉवेल से मुँह पोंछकर चाय का कप उठाता हैं।
कैसा रहा कॉलेज? आज तो चार घंटे लेट आये हो, कोई खास वज़ह? वीणा प्रश्न भरी निगाह् से संकल्प को देखती है।
“अरे मॉम, आज हम लोग कॉलेज के बाद ग्रुप डिस्‍कशन कर रहे थे, इंटर कॉलेज कॉम्‍पटीशन होने वाले हैं ना” संकल्प जवाब देता है।
“कॉलेज में ही डिस्‍कशन चल रहा था या फिर कहीं और गये थे तुम सब?” वीणा एक और सवाल दागती है।
“अरे मॉम कॉलेज में नहीं थे, बिट्टन मार्केट के कैफे में गये थे, पेट-पूजा के साथ काफी कुछ डिस्‍कस किया। बहुत मज़ा आया। वाह मॉम, चाय तो बहुत ही जायकेदार बनी है, बहुत दिन बाद आपके हाथ की चाय पी हैं” संकल्प चाय की चुस्की लेते हुए कहता है।
“तुम्‍हारे पास समय ही कहा हैं बेटा, कॉलेज, दोस्‍त – सहेलियां, कॉम्‍पटीशन्‍स, पता नहीं और भी क्‍या क्‍या” वीणा तंज कसती है।
“आपको क्‍या लगता हैं मॉम? मैं क्‍या टाइमपास करता हॅू बाहर जाकर?” संकल्प का सुर तीखा हो जाता है।
“नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं। मुझे तुम पर विश्‍वास है। अरे हां तुमको पता हैं, शमिता आंटी आई थी कल शाम घर पर, बहुत परेशान सी थी अपनी बेटी के बारे में लोगों से सुन-सुन कर” वीणा विषय बदलते हुए कहती है।
“क्‍यों ऐसा क्‍या कर दिया बेटी ने?” संकल्प प्रश्न करता है।
“अरे अपने किसी दोस्‍त के साथ कहीं घूमने या यूं ही ग्रुप डिस्‍कशन के लिए कही गई होगी, किसी रिश्‍तेदार या पड़ोसी ने देखा होगा तो बताया कि तुम्‍हारी बेटी किसी आवारा से लड़के के साथ घूमते दिखी, कॉलेज बैग पीठ पर टांगे हुए।” सुनकर शमिता को समझ ही नहीं आ रहा कि बेटी को कैसे समझाये, कि वह गलत राह पर जा रही हैं, बोलकर वीणा संकल्प के चेहरे को पढ़ती है।
“अरे मॉम, लड़कों का क्‍या जाता हैं, उनको तो रोज नई-नई गर्लफ्रेंड चाहिए घुमाने के लिए। लड़कियों का क्‍या हैं, दो-चार तोहफें दे दो, पट जाती हैं। फिर बदनामी की भी फिक्र नहीं होती उन्‍हें” संकल्प के चेहरे पर कुटिल मुस्कान बिखर जाती है।
“लड़कियों को भले ही नहीं समझ आता होगा, पर लड़कों के गर्लफ्रेंड बनाने के फितुर और टाइमपास की मानसिकता के कारण लड़कियों की जिंदगी तो दागदार बन ही जाती हैं, माता-पिता के लिए जिंदगी भर तिल-तिल कर मरने का सबब। क्‍या तुम्‍हारी बहन या घर की बेटी के साथ ऐसा हो तो तुमको गंवारा होगा?” वीणा संकल्प से फिर पूछती है।
“इन लड़कियो को कहा किसने 100-200 के तोहफों के लिए अपनी और मां-बाप की जिंदगी में जहर घोलने के लिए, समझाएं भी तो कौन इन बेवकूफ लड़कियों को? इनका अपना विवेक तो होता नहीं, और लड़के इन्‍हें मोहरा बना अपना टाइम पास कर लेते हैं । मेरी बहन-बेटी ऐसा करें तो मैं सरे बाज़ार दो हाथ जड़कर उसका घर से बाहर निकलना बंद करा देता” संकल्प का चेहरा तमतमा गया था।
“संकल्‍प, मैं समझाऊंगी उन लडकियों को, दो उन लड़कियों का नंबर मुझे अभी और इसी वक्‍त” वीणा संकल्प को कटघरे में खड़ा करती है।
“किनकी बात कर रही हो मॉम? मैं शमिता आंटी और उनकी बेटी को जानता भी नहीं” संकल्प हैरानी जाहिर करता है।
“अरे मेरे जलेबी से सीदे-साधे, भोले बेटे, शमिता आंटी की बेटी की नहीं, मैं उन लड़कियों की बात कर रही हॅू, जो गाहे-बगाहे तुम्‍हारी बाइक पर तुम्‍हारे कंधों पर झूलते हुए तुम्‍हारे साथ रोज़ाना घूमा करती हैं, कम से कम 2-4 लड़कियों की जिंदगी तबाह होने से से बच जाये” वीणा स्पष्ट करते हुए कहती है।
“मॉम आपने कब देख लिया मेरे साथ लड़कियों को घूमते हुए?” संकल्प के चेहरे पर हवाईया उड़ते साफ नजर आने लगती है।
“मैने नहीं देखा बेटा, पर आए दिन तुम्‍हारे ऐसे मनोरंजक दौरों के बारे में अपने ही लोगों से सुन-सुनकर थक चुकी हॅू, इसीलिए ऐसी मनगढंत कहानी कहकर तुम्‍हारी मानसिकता को टटोला। बेवकूफ वो लड़कियां हैं या नहीं, मुझे नहीं पता, पर इतना तो पक्‍का हैं कि तुम जैसे लड़के अपने मां-बाप को मूर्ख समझकर दूसरे की बेटियों को खिलौना बनाकर अपना वर्तमान और भविष्‍य दोनों तबाह कर रहे हो। एक बात ध्‍यान रखना, दूसरे की बेटियों की जिंदगी का नासूर बनाकर तुम कुछ समय के लिए तो खुश हो सकते हो पर इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि तुम्‍हारे अंतस में कहीं ना कहीं ऐसे गलत कामों का नकारात्‍मक असर दिखाई ना पड़ता हो” वीणा आगाह करते हुए कहती है।
“आप सच कहती हो मॉम, हम लोग आपस में ज्‍यादा गर्लफ्रेंड बनाने की शर्त लगाते हैं और अपना सारा समय उन्‍हें घुमाने-फिराने, गिफ्ट खरीदकर देने जैसे बेतुके कामों में जाया करते हैं। मैं वादा करता हॅू, अब इन कामों में अपना समय जाया नहीं करूंगा, अपने कैरियर की तरफ ध्‍यान लगाउँगा” संकल्प ग्लानि से भर उठता है।
“ये हुई ना बात!… जब तुम अपनी बहन और बेटियों के साथ ऐसे घिनौने काम की कल्‍पना भी नहीं कर सकते तो फिर दूसरी लड़किया भी तो किसी की बहन, बेटी हैं, यदि सभी लड़के ये बात समझ जाये तो शायद किसी मां को ऐसी कहानियां गढ़ने का कारण ही ना मिले” वीणा की आवाज़ में जोश भरा था।
“हां मॉम, मेरी बुद्धि पर चढ़ी धूंध अब छंट गई हैं” संकल्प को अपने किये पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।
“चलो, देर आएँ दुरूस्‍त आए मेरे लाल” वीणा संकल्प की पीठ थपथपा कर बोली।
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