बबीता झा
जून, 2026
“स्वाभिमान से जीने के लिए पढ़ाई करो,
पाठशाला ही इंसानों का सच्चा गहना है।’
उठो, जागो और शिक्षा प्राप्त करो,
जाति व्यवस्था के बंधनों को तोड़ फेंको।”
यह काव्य पंक्तियाँ फुले दंपत्ति की एक प्रसिद्ध मराठी कविता के हिंदी अनुवाद का अंश हैं। आज भले ही यह एक सामान्य प्रेरणादायी कविता लगे, किंतु जिस समय यह लिखी गई थी और जिस दमित समाज के लिए लिखी गई थी, वहाँ यह एक वैचारिक क्रांति का उद्घोष करती थी।
भारतीय समाज-सुधार के इतिहास में सावित्रीबाई फुले एक ऐसा प्रकाशपुंज हैं, जो महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा की अलख जगाने और कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष की अनवरत मशाल बनकर चमकीं। वे महान समाज सुधारक ज्योतिराव फुले की धर्मपत्नी ही नहीं, अपितु उनकी सबसे दृढ़ सहयोगी भी थीं।
19वीं सदी के कट्टरपंथी और पुरुष-प्रधान समाज में, जहाँ महिलाओं और दलितों को शिक्षा के अधिकार से पूर्णतः वंचित रखा गया था, वहाँ सावित्रीबाई ने ज्ञान का अभूतपूर्व दीप जलाया। उन्हें भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत और महान समाज सुधारक के रूप में आदर से स्मरण किया जाता है। अपने पति महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर उन्होंने सामाजिक न्याय की जो नींव रखी, उसने आधुनिक भारत का परिदृश्य बदल दिया।
प्रारंभिक जीवन और विवाह
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगाँव नामक एक छोटे से ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। उस दौर की सामाजिक कुप्रथाओं के अनुसार, मात्र 9 वर्ष की अल्पायु में ही वर्ष 1840 में उनका विवाह 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले से संपन्न कर दिया गया।
विवाह के समय सावित्रीबाई पूर्णतः अनपढ़ थीं, किंतु उनके भीतर सीखने की तीव्र उत्कंठा थी। उनके पति ज्योतिराव क्रांतिकारी विचारों के धनी थे और उनका दृढ़ विश्वास था कि समाज परिवर्तन की मूल कुंजी शिक्षा ही है। उन्होंने समाज के प्रचंड विरोध की परवाह न करते हुए सावित्रीबाई को गृह-शिक्षण के माध्यम से पढ़ना-लिखना सिखाया। इसके पश्चात सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे से शिक्षिका बनने का औपचारिक प्रशिक्षण (Teachers’ Training) प्राप्त किया। इस प्रकार, वे भारत की प्रथम प्रामाणिक महिला शिक्षिका बनीं।
शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक क्रांति
1 जनवरी 1848 को ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने पुणे के भिड़े वाड़ा में बालिकाओं के लिए भारत के प्रथम स्वदेशी विद्यालय की स्थापना की। यह कदम तत्कालीन रूढ़िवादी समाज के लिए किसी प्रचंड भूकंप से कम नहीं था। प्रारंभ में विद्यालय में केवल 9 छात्राओं ने प्रवेश लिया, जिन्हें सावित्रीबाई स्वयं पढ़ाती थीं।
यह मार्ग अत्यंत कंटकाकीर्ण था। जब सावित्रीबाई अध्यापन के लिए विद्यालय जाती थीं, तो मार्ग में रूढ़िवादी लोग उन पर पत्थर, गोबर और कीचड़ फेंकते थे। समाज का मानना था कि स्त्री को पढ़ाना अधर्म है और इससे समाज का विनाश हो जाएगा। किंतु सावित्रीबाई इन प्रताड़नाओं से तनिक भी विचलित नहीं हुईं। वे अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं और विद्यालय पहुँचकर गंदी साड़ी बदलकर छात्राओं को पढ़ाती थीं। उनकी इस अटूट दृढ़ता और अदम्य साहस के सामने विरोधियों के षड्यंत्र ढह गए।
फुले दंपत्ति केवल एक विद्यालय तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने वर्ष 1851 तक पुणे और उसके आसपास के क्षेत्रों में बालिकाओं के लिए लगभग 18 विद्यालय खोले। शिक्षा के संवर्धन में उनके इस अभूतपूर्व योगदान के लिए ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1852 में फुले दंपत्ति को सार्वजनिक रूप से सम्मानित भी किया।
सामाजिक सुधार एवं कुप्रथाओं पर प्रहार
सावित्रीबाई फुले का कार्यक्षेत्र केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज की हर उस अमानवीय प्रथा पर आघात किया जो मानवीय गरिमा के प्रतिकूल थी।
सत्यशोधक समाज की भूमिका: वर्ष 1873 में ज्योतिराव फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जिसका मूल उद्देश्य वंचितों, शूद्रों और अति-शूद्रों को सामाजिक गुलामी से मुक्त कराना था। सावित्रीबाई इसकी सक्रिय सदस्य थीं। ज्योतिराव के अवसान के पश्चात उन्होंने अत्यंत कुशलता से इस संस्था का नेतृत्व भी संभाला।
बाल-विवाह का विरोध और विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन: तत्कालीन समय में बाल-विवाह के कारण अनेक बालिकाएँ अल्पायु में ही विधवा हो जाती थीं। उनका मुंडन कर दिया जाता था और समाज उन्हें अपशकुन मानकर बहिष्कृत कर देता था। सावित्रीबाई ने इस बर्बर प्रथा का कड़ा विरोध किया। उन्होंने नाइयों (Barbers) को संगठित करके हड़ताल करवाई ताकि वे विधवा महिलाओं का मुंडन न करें। उन्होंने विधवा-पुनर्विवाह की वकालत की और स्वयं एक बाल-विधवा के पुत्र (यशवंत) को गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया तथा उसे डॉक्टर बनाया।
‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना: लोकलाज के भय से जो असहाय विधवा महिलाएँ गर्भवती होने पर आत्महत्या करने को विवश हो जाती थीं या नवजात शिशुओं को त्याग देती थीं, उनके लिए सावित्रीबाई ने अपने गृह में ही ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ प्रारंभ किया। यहाँ ऐसी महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की सुविधा दी जाती थी और उनके शिशुओं की देखरेख की जाती थी।
छुआछूत का मुखर विरोध: अछूत समझे जाने वाले वर्गों को सार्वजनिक कुओं से जल लेने का अधिकार नहीं था। इस अमानवीयता को मिटाने हेतु सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने अपने निजी घर का हौज (कुआँ) सभी जातियों के लोगों के लिए खोल दिया।
साहित्यिक योगदान
सावित्रीबाई न केवल एक कर्मठ समाज-सेविका थीं, बल्कि एक उत्कृष्ट कवयित्री और प्रखर विचारक भी थीं। वे अपनी कविताओं का प्रयोग जन-जागरण के माध्यम के रूप में करती थीं। उनके 2 प्रमुख काव्य-संग्रह अत्यंत प्रसिद्ध हैं:
काव्य फुले (1854): इसमें उनकी प्रारंभिक कविताएँ संकलित हैं, जो प्रकृति, शिक्षा और सामाजिक चेतना पर आधारित हैं।
बावनकशी सुबोध रत्नाकर (1892): यह ज्योतिराव फुले के विचारों और संघर्षों का काव्यात्मक संकलन है।
अंतिम समय और अमर बलिदान
सावित्रीबाई फुले का जीवन अंतिम साँस तक जन-सेवा और परोपकार को समर्पित रहा। वर्ष 1897 में पुणे और उसके आसपास के क्षेत्रों में भयानक ‘प्लेग’ महामारी फैली। इस जानलेवा बीमारी के विकराल काल में भी वे मूकदर्शक बनकर नहीं बैठीं। उन्होंने अपने दत्तक पुत्र डॉ. यशवंत के साथ मिलकर प्लेग पीड़ितों के उपचार हेतु एक क्लिनिक (चिकित्सालय) खोला।
वे स्वयं पीड़ित बस्तियों में जाकर असाध्य रोगियों को अपनी गोद में उठाकर अस्पताल लाती थीं। इसी निस्वार्थ सेवा कार्य के दौरान, प्लेग से ग्रसित एक अबोध बालक को बचाते समय वे स्वयं भी इस भयानक संक्रमण की चपेट में आ गईं। अंततः 10 मार्च 1897 को इस महान आत्मा ने अंतिम साँस ली।
निष्कर्ष
स्पष्टतः सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्ष, त्याग और अटूट संकल्प की एक सजीव मिसाल है। उन्होंने उस युग में परिवर्तन का बीजारोपण किया जब महिलाओं की स्थिति पिंजरे में बंद पक्षी समान थी। आज भारत की प्रत्येक शिक्षित महिला—चाहे वह चिकित्सक हो, अभियंता हो, राजनीतिज्ञ हो या अंतरिक्ष यात्री—कहीं न कहीं सावित्रीबाई फुले के संघर्षों की ऋणी है।
उनके इस अविस्मरणीय योगदान को अक्षुण्ण रखने के लिए भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया तथा पुणे विश्वविद्यालय का नाम परिवर्तित करके ‘सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय’ रखा गया। वे केवल अतीत का कोई पृष्ठ नहीं हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के हर उस आंदोलन की जीवंत प्रेरणा हैं जो समानता, न्याय और मानवीय गरिमा की बात करता है।
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के चरणों में शत-शत नमन!
