शब्दों की नीलामी

जून, 2026

आभा झा 'अद्विका'
आभा झा ‘अद्विका’
गौड़ रेसिडेंसी चंद्रनगर
गाजियाबाद, उप्र
हिंदी और मैथिली भाषा की साहित्यकार

शहर के बीचों-बीच एक प्रतिष्ठित साहित्यिक महोत्सव चल रहा था। बड़े-बड़े बैनर, चमकती रोशनी, और मंच पर नामी लेखकों की भीड़— सब कुछ किसी उत्सव से कम नहीं था। उसी भीड़ में एक कोने में चुपचाप बैठी थी— राधिका।
राधिका एक उभरती हुई लेखिका थी। उसकी कहानियाँ नारी के दर्द, संघर्ष और आत्मसम्मान की सच्ची तस्वीर पेश करती थीं। उसने कई पत्रिकाओं में अपनी रचनाएँ भेजी थीं, पर हर बार एक ही जवाब मिलता— ‘आपकी कहानी अच्छी है, लेकिन इसमें ‘बिकने वाला तत्व’ नहीं है।’
आज वह अपने पांडुलिपि के साथ एक बड़े प्रकाशक से मिलने आई थी। दिल में उम्मीद थी कि शायद आज उसकी आवाज सुनी जाएगी।
प्रकाशक के केबिन में प्रवेश करते ही उसने देखा—दीवारों पर चमकदार किताबों के कवर लगे थे, जिनमें अधिकतर में ग्लैमर और रोमांस का तड़का था।
प्रकाशक ने मुस्कुराते हुए पूछा, “हाँ, बताइए, क्या लिखती हैं आप?”
राधिका ने धीरे से अपनी पांडुलिपि आगे बढ़ाई, “सर, ये मेरी कहानियाँ हैं—गाँव की औरतों की, उनकी पीड़ा और उनकी ताकत की…’
प्रकाशक ने कुछ पन्ने पलटे, फिर भौंहें सिकोड़ते हुए बोला, “देखिए, लेखन अच्छा है, पर ये सब अब नहीं बिकता। आपको थोड़ा ‘मॉडर्न’ होना पड़ेगा।’
“मॉडर्न?” राधिका ने हैरानी से पूछा।
“हाँ,” वह बोला, “थोड़ा ग्लैमर, थोड़ी बोल्डनेस… ऐसी चीज़ें डालिए जो लोगों को आकर्षित करें। आजकल नारी-विमर्श भी तभी बिकता है, जब उसमें सनसनी हो।’
राधिका के भीतर कुछ टूट-सा गया। उसने धीमे स्वर में कहा, ‘लेकिन सर, मैं जो लिखती हूँ, वो सच है… उन औरतों का सच, जो आज भी चुपचाप जी रही हैं।’
प्रकाशक ने हँसते हुए कहा, “सच से ज्यादा ज़रूरी है ‘सेल’। अगर किताब नहीं बिकी, तो सच भी किस काम का?”
राधिका ने अपनी पांडुलिपि वापस ली और बाहर आ गई। उसकी आँखों में नमी थी, पर भीतर कहीं एक आग भी जल रही थी।
कुछ महीनों बाद, उसी महोत्सव में एक नई किताब चर्चा का विषय बनी— ‘अधूरी औरत की पूरी कहानी।’ लेखक का नाम था— राधिका।
इस बार मंच पर वही राधिका थी, और सामने बैठी भीड़ उसकी बातों को ध्यान से सुन रही थी।
एक पत्रकार ने पूछा, “आपकी किताब इतनी लोकप्रिय कैसे हो गई, जबकि इसमें कोई ग्लैमर या सनसनी नहीं है?”
राधिका ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया, ‘क्योंकि इसमें सच्चाई है। और सच्चाई देर से सही, पर अपना रास्ता बना ही लेती है।’
भीड़ में तालियाँ गूँज उठीं।
उसी समय वही प्रकाशक भी वहाँ मौजूद था। उसने आगे बढ़कर कहा, ‘मुझे माफ़ कीजिए, मैंने आपकी प्रतिभा को समझने में गलती की।’
राधिका मुस्कुराई, ‘गलती आपकी नहीं, उस सोच की है जो साहित्य को सिर्फ बाज़ार की नजर से देखती है।’
उसने आगे कहा, ‘नारी सिर्फ एक ‘विषय’ नहीं है, जिसे बेचा जाए। वह एक संवेदना है, एक सच्चाई है, जिसे समझना जरूरी है।’
मंच से उतरते समय राधिका ने महसूस किया— उसके शब्द अब बिक नहीं रहे थे, बल्कि समाज को जगा रहे थे।
और शायद यही साहित्य की सबसे बड़ी जीत थी— जब शब्द नीलामी में नहीं, सम्मान में बदल जाएँ।
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