लाइकाचार्य और पाठकपुराण

जून, 2026

सन्दीप तोमर
सन्दीप तोमर
अध्यापक,
जीवन पार्क, उत्तम नगर, दिल्ली

(लेखक परिचय: 4 कविता संग्रह, 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह और एक आत्मकथा के अतिरिक्त अनेक रचनाएँ साझा संग्रह, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबसाइट में सतत प्रकाशन।

एक समय जरुर साहित्य को मापने का सबसे बड़ा टूल लेखन स्टाइल, कंटेंट, और लेखन की गहराई रहे होंगे लेकिन आजकल साहित्य का स्तर इस बात से नहीं मापा जाता कि आपने क्या लिखा है, बल्कि इस बात से तय होता है कि आपकी पोस्ट पर कितने

और ‘वाह-वाह’ के इमोजी बरसे हैं। अगर आपकी सोशल मिडिया की किसी पोस्ट पर पचास लोग ‘लाजवाब’ लिख दें, तो समझ लीजिए आपने तुलसीदास और प्रेमचंद को एक साथ मात दे दी है।
लेकिन सोशल मिडिया का एक बड़ा रहस्य है, जिसे समझना हर नए-पुराने लेखक के लिए जरूरी है — यह रहस्य है ‘डॉट (.) का दर्शन।’
जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। डॉट की महिमा अपरम्पार है, किसी महिला मित्र ने यदि अपनी फेसबुक वाल पर सिर्फ एक डॉट ‘.’ डाल दिया, तो वह डॉट नहीं, डिजिटल युग का ब्रह्मवाक्य बन जाता है। उस एक बिंदु में लोग पूरा उपनिषद पढ़ लेते हैं— ‘क्या गहराई है!’
‘वाह! क्या अभिव्यक्ति है!’ ‘आपने तो सब कह दिया…’।
अब उधर बेचारा पुरुष पूरी रात जागकर, पत्नी की डाँट खाकर, चाय के पाँच कप पीकर, समाज की विसंगतियों पर 1500 शब्दों का लेख लिखता है, सोशल मिडिया पर पोस्ट करता है। फिर वह अपनी ही पोस्ट के नीचे खुद ही आकर झाँकता है, जैसे कोई दुकानदार अपनी ही दुकान में ग्राहक बनकर पूछे— ‘भैया, कुछ बिक भी रहा है क्या?’
उसे लगता है कि शायद फेसबुक का एल्गोरिदम उससे व्यक्तिगत दुश्मनी निकाल रहा है। लेकिन असलियत यह है कि यहाँ एल्गोरिदम नहीं, ‘लाइकाचार्य’ काम कर रहे हैं, जो यह तय करते हैं कि किसे महाकवि बनाना है और किसे मौन साधक।
कुछ लोग तो इतने कर्मठ होते हैं कि किसी की सोशल मिडिया पोस्ट पढ़ना उन्हें समय की बर्बादी लगता है। वे सीधे लाइक बटन से आक्रमण करते हैं और कभी-कभी अतिक्रमण भी। उनका सिद्धांत साफ है— ‘बिना पढ़े ही लाइक करो, अपना समय बचाओ और संबंध निभाओ।’
ऐसे लोग आपके हर लेख पर लाइक करेंगे, चाहे आपने कविता लिखी हो, व्यंग्य लिखा हो या बिजली का बिल ही क्यों न अपलोड कर दिया हो। इनके लिए रचना की विधा कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए हर रचना समान है। उनके जैसे समानता के इस भाव के जैसा लोकतंत्र आपको दुनिया में कहीं और नहीं मिलेगा।
दूसरी ओर, कुछ लेखक मित्रों का दर्द भी कम रोचक नहीं है। वे रोज सुबह उठते ही सबसे पहले अपनी पोस्ट पर लाइक गिनते हैं— ‘कल शर्मा जी की पोस्ट पर सत्रह सौ लाइक थे, मेरी पर मात्र सत्रह, ऐसा क्यों और कैसे होता है? क्या मैं इतना बुरा लिखता हूँ? या फिर मुझे भी डॉट डालना शुरू कर देना चाहिए?’
कई तो इस हद तक निराश हो जाते हैं कि अगली पोस्ट डालते समय ही लिख देते हैं— ‘दोस्तों, अगर यह पोस्ट पसंद आए तो लाइक जरूर करें।’ जैसे कि साहित्य नहीं, कोई यूट्यूब वीडियो हो और आपको कहाँ पड़े — ‘लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करना न भूलें।’
इसी बात पर याद आया— पहले आपके लेखन, कार्यक्रम, या साहित्यिक पुरस्कार की खबर अखबार में आती थी और आम जनता उसे पढ़कर लेखक को जानती, समझती और पहचानती थी, आज लेखक को अखबार की कतरन पढने के लिए व्हाट्सएप से खुद से जुड़े पाठक तक पुनः ठेलनी पड़ती है। पहले लेखक की कीर्ति अलग-अलग राज्यों तक फैली होती थी, अब अखबार मांगने आये पडोसी द्वारा आपकी किताबे देखने पर आश्चर्य करने पर आपको स्वयं बताना पड़ता है कि आप पडोसी होने के साथ-साथ लेखक भी हैं।
अब ऐसे माहौल में अगर कोई समझदार व्यक्ति कह दे कि ‘लाइक और कमेंट लेखन का मूल्यांकन नहीं हैं’, तो लोग उसे ऐसे देखते हैं जैसे उसने कोई बहुत बड़ा आध्यात्मिक रहस्य खोल दिया हो।
असल में, सच्चाई थोड़ी कड़वी है— लाइक भीड़ का खेल है, और पाठक अकेलेपन का।
जो लोग सच में पढ़ते हैं, वे अक्सर चुप रहते हैं। वे लाइक नहीं करते, क्योंकि उन्हें शब्दों को समझने में समय लगता है। वे कमेंट नहीं करते, क्योंकि वे सोचते हैं। और जब वे आपसे मिलते हैं, तो आपकी एक पंक्ति पकड़कर पूछते हैं— ‘यहाँ आपने यह क्यों लिखा?’ बस, वही क्षण आपके लेखक होने का असली पुरस्कार होता है।
बाकी जो लोग बिना पढ़े ‘वाह-वाह’ करते हैं, वे साहित्य के नहीं, सोशल मीडिया के नागरिक हैं। उनका काम है ट्रैफिक बढ़ाना, विचार नहीं।
तो हे व्यथित लेखक!
अगर आपकी पोस्ट पर कम लाइक आ रहे हैं, तो निराश मत होइए। संभव है, आप सच में लिख रहे हैं।
और अगर किसी दिन आपकी पोस्ट पर अचानक बहुत सारे लाइक आ जाएँ, तो थोड़ा सावधान हो जाइए— कहीं आपने अनजाने में कोई ‘डॉट’ तो नहीं लिख दिया?
अंत में बस यही— आपका काम लिखना है, लाइक की खेती करना नहीं।
लिखते रहिए, क्योंकि शब्द ही अंततः बचते हैं— लाइक तो अगली पोस्ट आते ही पलट जाते हैं।
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