रघुनाथ बाबू की दुकान

जून, 2026

केदारनाथ दास
केदारनाथ दास
अवकाशप्राप्त प्रिन्सिपल, बसिया इंटर कॉलेज,
बसिया, जिला- गुमला, झारखंड

अपनों के बीच आज अपना खुद का शहर अपरिचित हो चुका है। यह बहुत पुरानी बात नहीं है। स्मरण में तो यह भी बना हुआ है कि इसी शहर के बीचों-बीच किताबों की एक पुरानी सी दुकान अभी भी अस्तव्यस्त ही सही अस्तित्व में तो है। यह दुकान पुरानी है और इतनी पुरानी है कि उसकी दीवारों पर समय की धूल जरुर जमी रहती परन्तु किसी ने इसे कभी परिचय की दुनिया से बाहर निकलने की कोशिश करते नहीं देखा।
धूलभरी यह दुकान इसलिए भी मन को रोमांचित करने लगती क्योंकि पुरानी यादों, अधूरी मोहब्बतों और जीवन के संघर्षों की खुशबू के रोमांच से किसी को कभी इनकार नहीं होता। यह वही दुकान है जहां लकड़ी की अलमारियों में रखी किताबों से एक अजीब-सी खुशबू आती रहती और इसके परिसर में प्रवेश करते ही ऐसा लगता मानो शब्द अभी भी सांस ले रहे हों। इन सांसों को गति प्रदान करने वाले, साहित्य के प्रति समर्पित और वयोवृद्ध रघुनाथ बाबू को कौन भूल सकता है जो कभी इस दुकान के मालिक ही नहीं बल्कि शब्द पुरुष हुआ करते थे। भीड़ भरी सड़क में आज जब हर कोई तन्हा नजर आ रहा है तब उनके द्वारा बार बार दुहराया जाने वाला नसीहत अभी भी नजरों के सामने से अपने खुद के शहर का परिचय देने को आतुर नजर आने लगता है। यह कोई संयोग नहीं है जब वे अक्सर कहा करते थे, ‘किताबें बिकने की चीज नहीं होती बेटा, ये तो मनुष्य की आत्मा को बचाए रखने का सबसे अच्छा साधन है।’
आज जब रघुनाथ बाबू के दुकान का अस्तित्व शहर के चकाचौंध में कहीं खो सा गया है तो ऐसा जान पड़ता है मानों अपना खुद का शहर नि:शब्द है और श्मशान की मंजिल तय कर चुका है। ऐसा तब है जबकि समय पल प्रति पल बदल रहा है और सुविधाएँ भी निरंतर बढ़ती चली जा रही हैं। शहर में अब चमचमाती रोशनी, कॉफी कैफे और सेल्फी पॉइंट के साथ तमाम तरह के नये नये मॉल खुल चुके हैं। इनमें से लगभग हर मॉल के किसी न किसी मंजिल पर ‘बुक लाउंज’ की एक चमचमाती सी दुनिया भी सज चुकी है। आज जब रघुनाथ बाबू का ग्लैमर शेष नहीं रह गया है तो मन इस बात को लेकर भी व्यथित है कि सिर्फ उनके ग्लैमर के गुजर जाने से मानों भ्रम की एक दुनिया भी सज गई है। इस नई दुनिया में किताबें कम हैं और सजावट पर सब कुछ केन्द्रित होकर रह गया है। इनमें न प्रेम और सौंदर्य को समर्पित श्रृंगार रस की किताबें हैं न हंसी-मजाक के हास्य रस, शोक की अभिव्यक्ति के करूण रस, क्रोध या गुस्सा के रौद्र रस, उत्साह या बहादुरी के वीर रस, डर या भय के भयानक रस, घृणा के वीभत्स रस, विस्मय के अद्भुत रस, शांति को समर्पित शांत रस के अतिरिक्त संतान प्रेम के वात्सल्य रस और ईश्वर के प्रति प्रेम के भक्ति रस की कविताओं का दम शेष रह गया है। साहित्य में बाज़ारवाद का प्रयोग यह कि शब्दों के संस्कार की जगह मोटिवेशनल आर्टिकल की किताबें अब शॉर्टकट में बिक रहे हैं। यहाँ ‘सात दिन में सफल बनें’, ‘तीन मिनट में करोड़पति’ और ‘पाँच तरीके, जिनसे लोग आपको पसंद करेंगे’, “सफलता के पाँच सुत्र” जैसी खुबसूरत किताबें सजी पड़ी हैं और लोग किताबें पढ़ने नहीं बल्कि इनके साथ तस्वीरें खिंचवाने आने लगे हैं।
शहर को अभी भी याद है कि रघुनाथ बाबू के दुकान की पहचान सदैव “शब्द संसार” के तौर पर बनी रही परन्तु मॉल के इस चकाचौंध में अब यह संसार धीरे-धीरे सूना होने लगा है। हाँ, रघुनाथ बाबू की आत्मा अभी भी बनी हुई है। ऐसे में, एक दिन रघुनाथ बाबू की मुलाकात उनके एक पुराने प्रशंसक अंशुमान से हो जाती है। आज वह किसी बड़े प्रकाशन संस्थान का प्रधान संपादक बना हुआ है। महंगे कपड़े, चमकदार जूते और हाथ में नवीनतम मोबाइल के साथ सजे धजे इस रौबदार व्यक्तित्व ने खंडहर बन चुके “शब्द संसार” की पहचान को ढूंढते आज अपने गुरुजी के सामने है। यह साक्षात्कार सहज सरल भी नहीं है क्योंकि उनकी दुकान को देखते ही उसकी वाणी में एक नसीहत आ जाती है कि ‘गुरुजी, आप भी समय के साथ बदलिए। आज प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा नहीं बिकते, कुछ मसालेदार लिखिए। थोड़ा विवाद, थोड़ा रोमांस, थोड़ा सनसनी… तभी लोग खरीदेंगे।’ रघुनाथ बाबू ठहरे ठेठ साहित्यानुरागी जिनके लिए शब्दों में शब्द विन्यास नहीं बल्कि आत्मा का वास रहता है। जाहिर सी बात है, उन्हें अपने ही किसी प्रिय की ओर मिला यह सलाह रास नहीं आया क्योंकि यह कहीं न कहीं आत्मा के उस विग्रह का सौदा था जिसकी साधना में पीढ़ियों ने तपस्या की है। वैसे भी, यह सौदा किसी भी विद्यानुरागी तपस्वी के लिए कैसे स्वीकार्य हो सकता था? वस्तुत: रघुनाथ बाबू के लिए भी यह एक असहज सी स्थिति थी फिर भी संयम के साथ अपने चिर परिचित अंदाज मुस्कुराते हुए उन्होंने धीरे से पूछा, “और इंसानियत? वो भी बिकती है क्या?” मानवीय चकाचौंध को पूरी दुनिया मान लेने के भ्रम में जी रहा अंशुमान हंस पड़ा, “आजकल भावनाएँ नहीं गुरुजी, ब्रांड बिकते हैं।’ इस निरर्थक से बहस के लिए रघुनाथ बाबू के पास कोई जवाब नहीं था।
निरूत्तर रघुनाथ बाबू उस दिन बहुत देर तक चुपचाप पड़े रहे और इस जद्दोजहद के उत्तर तलाशने की नीयत से रात में उन्होंने अपनी एक पुरानी डायरी खोली। उसमें वर्षों पहले लिखी एक पंक्ति थी ‘जिस क्षण बाज़ार के सामने साहित्य घुटने टेकने को मजबूर हो जाए, उसी क्षण शब्दों की आत्मा भी मर जाती है।’ यह केवल नीतिशास्त्र का कोई वाक्य भर नहीं था फिर भी इस एक वाक्य पर नजर पड़ते ही साहित्य में समाधान तलाशने वाले रघुनाथ बाबू फिर से निरूत्तर हो जाते हैं। इस डायरी में और इस पंक्ति में उन्हें अपने सवाल का कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने अपनी डायरी के पन्नों को पलटने के बजाय उसे बंद करना उचित समझा। पन्नों की इस नि:शब्दता की गुत्थी अभी सुलझ पाती इसके पहले ही पिछले कुछ महीनों के अंतराल में आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई थी कि उनके लिए अब दुकान का किराया देना भी मुश्किल होता चला गया। मकान मालिक ने साफ कह दिया था कि या तो दुकान खाली कीजिए या इसे किसी ब्रांडेड कैफे को दे दीजिए।
इस नई परिस्थिति में रघुनाथ बाबू को आज पहली बार शब्दों की आत्मा के मौत का अहसास हुआ और उन्होंने अब अपनी अलमारियों को ऐसे देखा जैसे कोई पिता अपने बीमार व बेवश बच्चों को देखता है। दुर्भाग्य से उसी रात तेज बारिश हो गई। इस बारिश से दुकान की छत टपकने लगी और किताबें भीगने लगीं। रघुनाथ बाबू के लिए यह किसी कालरात्रि से कम न थी क्योंकि पानी की धार निरंतर बढ़ती चली जा रही थी और इस वर्षा के कारण किताब भी भींगने लगे थे और यह सबकुछ देखकर उनके हाथ अब कांप रहे थे। कांपते हाथों से किताबों को समेटने की मजबूरी विकराल रूप धारण किए सामने थी और कुछ समझ बुझ पाते इसके पहले अचानक उनकी नजर दरवाजे पर खड़ी एक छोटी लड़की पर टिक जाती है। वह पास में रेहड़ी लगाकर चाय बेचने वाले सरोज की अबोध सी बेटी गुड़िया थी। रघुनाथ बाबू अभी कुछ बोल पाते इसके पहले गुड़िया दरवाजे के अंदर दाखिल हो जाती है और एक भीगी हुई किताब उठाकर सवाल का एक अतिरिक्त बोझ उन पर डाल देती है कि ‘बाबूजी, ये किताब रो क्यों रही है?’ उसकी मासूमियत भरे इस सवाल से रघुनाथ बाबू की आंखें भर आईं क्योंकि इस बच्ची की इस मासूमियत ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। उन्हें पता है कि किताबों से जो पानी गिर रहे हैं उसका तात्कालिक कारण वर्षा है परन्तु सच तो यह भी रहा है कि किताबें इसलिए रो रही हैं क्योंकि अब लोग इन्हें पढ़ना नहीं चाहते।
गुड़िया अभी बच्ची है और नादान है परन्तु जिज्ञासाओं और संभावनाओं से अटी पड़ी है जबकि रघुनाथ बाबू भविष्य की जिजीविषा को बनाए रखना चाहते हैं। बहरहाल उन्होंने गुड़िया की ओर रुख करते हुए जवाब दिया, ‘बेटा, ये किताब इसलिए रो रहे हैं क्योंकि अब लोग इसे पढ़ना भूल रहे हैं।’ यह एक अति साधारण सा जवाब था परन्तु गुड़िया की मासूमियत ने उनकी आंखों को एक नई दुनिया में लाकर खड़ा कर दिया। जिज्ञासाओं के सवाल जवाब अभी चल ही रहे थे कि अचानक से गुड़िया का यह संकल्प सामने आ गया कि “मैं तो पढ़ूँगी।” नादान सी गुड़िया ने मानों रघुनाथ बाबू के लिए कालरात्रि से बाहर निकलने का रास्ता साफ कर दिया हो। बहुत अरसे बाद उस दिन पहली बार रघुनाथ बाबू को लगा कि साहित्य अभी मरा नहीं है। बारिश थम चुकी थी और अगले दिन आसमान साफ हो चुका था। मौसम बनते बिगड़ते रहते हैं परन्तु आज का खुला आसमान किसी चमत्कार से कम नहीं था।
सुबह सुरज की पहली किरण के साथ दुकान के दरवाजे पर गुड़िया फिर से दस्तक दे रही थी। समय के साथ यह क्रम चल निकला और अब गुड़िया रोज दुकान आने लगी। वह धीरे-धीरे अक्षर जोड़ना सीखती, कविताएँ पढ़ती और कहानियां सुनती। कुछ दिनों बाद उसके साथ मोहल्ले के कुछ और बच्चे आने भी दरवाजे पर दस्तक देने लगे। गुड़िया की इस गुदगुदी के कारण दुकान फिर से भरने लगी। इस बार दुकान की रौनक का मजमून खरीदारों से नहीं बल्कि पाठकों से लिखा जाने लगा। बच्चे फर्श पर बैठते और रघुनाथ बाबू कभी प्रेमचंद, कभी टैगोर, कभी नागार्जुन की कहानियाँ सुनाते। यहाँ गुड़िया की मासूमियत का कमाल यह रहा कि शब्दों को अब आत्मा का साथ मिलने लगा और देखते देखते मॉल वाले बुक लाउंज धीरे-धीरे खाली होने लगे। निसंदेह लोगों को वहाँ कॉफी के साथ सेल्फी पॉइंट तो मिल जाती थी परन्तु वहां न आत्मविश्वास था, न कोई अपनापन था और न आत्मीयता। बुक लाउंज की खाली कुर्सियों ने किताबों के कारोबार से जुड़े कॉरपोरेट जगत में एक तरह की हलचल मचा कर रख दी।
वर्षा के कुछ बूंदों के कारण अपना अस्तित्व तलाशने को मजबूर “शब्द संसार” वाली इस दुकान के सामने यदि चकाचौंध वाली दुनिया का कमाल फीका नजर आने लगे, तो कोई अंशुमान चुप कैसे बैठा रह सकता था? आखिरकार एक दिन अंशुमान फिर से उनकी दुकान पर आ धमका। इस बार यहां आने के साथ उसकी निगाहें कातर थी क्योंकि टूटी कुर्सियों के बीच बैठे बच्चे तालियाँ बजा रहे हैं और रघुनाथ बाबू मजे ले ले कर कविता सुनाए जा रहे हैं। अंशुमान कुछ देर तो चुप रहा फिर धीमे स्वर में बोला, ‘गुरुजी… शायद मैं गलत था।’ रघुनाथ बाबू मुस्कुराए और अलमारी से एक पुरानी किताब निकाली। इस किताब को अंशुमान के हाथ में देते हुए कहा, ‘बाज़ार जरूरतें पूरी कर सकता है बेटा लेकिन मनुष्य को मनुष्य बनाने का काम केवल साहित्य ही कर सकता है।’ अंशुमान की आँखें नम होकर झुक गईं। दुकान अब भी पुरानी ही है, दीवारे भी जर्जर हैं और किराए के लिए दुकान मालिक का दबाव अभी भी बरकरार है लेकिन शब्द जिंदा बने हुए हैं।
शायद यही साहित्य की सबसे बड़ी जीत है कि भौतिकता और बाज़ार शोर के बीच भी कहीं न कहीं एक छोटी-सी जगह बची ही रहती है जहाँ इंसान का दिल अनसुलझे शब्दों के बीच अपना संसार ढूंढने के जतन में लगा रहता है।
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