सितंबर 2026
बबीता झा
प्रस्तावना
भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इतिहास में डॉ. विक्रम साराभाई का नाम एक ऐसे महान वैज्ञानिक और दूरदर्शी के रूप में दर्ज है, जिन्होंने भारत को आधुनिक युग की तकनीक से जोड़ने की नींव रखी। वे न केवल एक उत्कृष्ट भौतिक विज्ञानी (Physicist) थे, बल्कि एक कुशल उद्योगपति, शिक्षाविद, और बहुमुखी प्रतिभा के धनी संस्था-निर्माता भी थे। जब भारत नए-नए स्वतंत्र हुआ था और संसाधनों की भारी कमी थी, तब डॉ. साराभाई ने यह सपना देखा कि भारत भी अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों के साथ खड़ा हो सकता है। उन्हें सर्वसम्मति से ‘भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक’ (Father of the Indian Space Program) माना जाता है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को गुजरात के अहमदाबाद में एक अत्यंत समृद्ध और प्रतिष्ठित जैन उद्योगपति परिवार में हुआ था। उनके पिता अंबालाल साराभाई भारत के एक जाने-माने उद्योगपति थे, जो स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय योगदान देते थे। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण विक्रम साराभाई का बचपन देश-विदेश की महान हस्तियों, जैसे महात्मा गांधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, और सी.वी. रमन के सानिध्य और प्रभाव में बीता।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा अहमदाबाद के ‘रिट्रीट स्कूल’ में हुई, जिसे उनके माता-पिता ने एक प्रगतिशील शिक्षा केंद्र के रूप में शुरू किया था। उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड चले गए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सेंट जॉन्स कॉलेज में दाखिला लिया। 1940 में उन्होंने कैम्ब्रिज से प्राकृतिक विज्ञान (Natural Sciences) में त्रिपुंड (Tripos) की डिग्री हासिल की। (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में बी.ए. (B.A.) या स्नातक स्तर की डिग्री के लिए दिए जाने वाले मुख्य परीक्षाओं के समूह (Degree Examinations) या ऑनर्स कोर्स को ‘त्रिपुंड’ (Tripos) कहा जाता है। 16वीं और 17वीं शताब्दी में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में स्नातक की डिग्री के समय एक मौखिक बहस (Debate/Disputation) होती थी। इस बहस के दौरान मुख्य प्रश्न पूछने वाला व्यक्ति तीन टांगों वाले एक विशेष स्टूल (Three-legged stool) पर बैठता था। उस तीन टांगों वाले स्टूल को ‘Tripos’ कहा जाता था। समय के साथ उस स्टूल के नाम से ही कैम्ब्रिज की स्नातक परीक्षा प्रणाली का नाम ‘Tripos’ पड़ गया।)
द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के कारण वे भारत लौट आए और बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में शामिल हो गए। वहाँ उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी.वी. रमन के मार्गदर्शन में कॉस्मिक किरणों (Cosmic Rays) पर गहन शोध किया। युद्ध समाप्त होने के बाद वे पुनः कैम्ब्रिज लौटे और 1947 में कॉस्मिक किरणों पर अपने शोधपत्र के लिए पीएच.डी. (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की।
अनुसंधान और प्रमुख संस्थाओं का निर्माण

डॉ. साराभाई केवल प्रयोगशाला तक सीमित रहने वाले वैज्ञानिक नहीं थे; वे दूरदर्शी संस्था-निर्माता थे। उनका मानना था कि किसी भी देश के विकास के लिए उत्कृष्ट शैक्षणिक और शोध संस्थानों का होना अनिवार्य है। मात्र 28 वर्ष की आयु में, कैम्ब्रिज से लौटने के तुरंत बाद, उन्होंने 11 नवंबर 1947 को अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory – PRL) की स्थापना की। PRL को आज भी भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का “पालना” (Cradle of Space Sciences) कहा जाता है।
इसके अलावा, उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में दर्जनों ऐतिहासिक संस्थानों की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई:
- भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद (IIMA): भारत में प्रबंधन (Management) शिक्षा को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने के लिए उन्होंने 1961 में IIMA की नींव रखी।
- अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्रियल रिसर्च एसोसिएशन (ATIRA): भारत के कपड़ा उद्योग में वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए इसका गठन किया।
- कम्युनिटी साइंस सेंटर: आम जनता और विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए इसकी स्थापना की।
- दर्पण एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स: अपनी पत्नी, प्रसिद्ध नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई के साथ मिलकर उन्होंने कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए इस संस्थान की स्थापना की।
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का सपना और ISRO की स्थापना
1957 में जब सोवियत संघ ने दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह ‘स्पुतनिक-1’ (Sputnik-1) लॉन्च किया, तो डॉ. साराभाई ने यह पहचान लिया कि अंतरिक्ष तकनीक केवल विकसित देशों के शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि भारत जैसे विकासशील देश की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए भी अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है।
डॉ. साराभाई की इस सोच को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी भाभा का पूर्ण समर्थन मिला।
- INCOSPAR का गठन (1962): 1962 में डॉ. साराभाई के नेतृत्व में ‘भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति’ (INCOSPAR) का गठन किया गया।
- थुम्बा रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन: केरल के तिरुवनंतपुरम के पास स्थित एक छोटे से मछुआरों के गाँव ‘थुम्बा’ को रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र के रूप में चुना गया। 21 नवंबर 1963 को भारत ने अपना पहला साउंडिंग रॉकेट (Nike-Apache) यहाँ से लॉन्च किया। उस समय संसाधनों की इतनी कमी थी कि रॉकेट के पुर्जों को साइकिल और बैलगाड़ियों पर ढोया गया था।
- ISRO की स्थापना (1969): 15 अगस्त 1969 को INCOSPAR को पुनर्गठित करके भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का रूप दिया गया। डॉ. साराभाई इसके संस्थापक और पहले अध्यक्ष बने।
डॉ. साराभाई का मानना था:
“यदि हमें राष्ट्रों के समुदाय में एक सार्थक भूमिका निभानी है, तो हमें मानव और समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग में किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए।”
उपग्रह तकनीक और ‘साइट’ (SITE) परियोजना
डॉ. साराभाई भारत के ग्रामीण इलाकों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि संबंधी जानकारी पहुँचाने के लिए उपग्रहों का उपयोग करना चाहते थे। उन्होंने SITE (Satellite Instructional Television Experiment) यानी ‘उपग्रह शैक्षणिक टेलीविजन प्रयोग’ की रूपरेखा तैयार की।
इस परियोजना के तहत 1975-76 में अमेरिकी उपग्रह ATS-6 के माध्यम से भारत के 2,400 से अधिक दूरस्थ गाँवों के टेलीविज़न सेटों पर प्रत्यक्ष रूप से शैक्षणिक कार्यक्रम प्रसारित किए गए। नासा (NASA) ने इसे “दुनिया का सबसे जटिल संचार प्रयोग” करार दिया था। इसके साथ ही, भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ की योजना भी डॉ. साराभाई के मार्गदर्शन में ही बनाई गई थी, जिसे 1975 में लॉन्च किया गया।
परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में योगदान
1966 में डॉ. होमी भाभा के असमय निधन के बाद डॉ. विक्रम साराभाई को भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग (Atomic Energy Commission of India) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने डॉ. भाभा के काम को आगे बढ़ाया और भारत में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग (जैसे बिजली उत्पादन और चिकित्सा) पर विशेष बल दिया। उन्होंने कलपक्कम में ‘फ़ास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर’ (FBTR) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
पुरस्कार और सम्मान
विज्ञान और समाज के प्रति डॉ. साराभाई के अमूल्य योगदान के लिए भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उन्हें कई शीर्ष सम्मानों से अलंकृत किया:
- शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1962)
- पद्मभूषण (1966)
- पद्मविभूषण (1972 – मरणोपरांत)
अंतरराष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ (IAU) ने उनके सम्मान में चंद्रमा के ‘सी ऑफ सेरेनिटी’ (Sea of Serenity) में स्थित एक विशाल क्रेटर का नाम ‘साराभाई क्रेटर’ रखा। इसके अतिरिक्त, इसरो के थुम्बा स्थित केंद्र का नाम बदलकर ‘विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र’ (VSSC) रखा गया। भारत के चंद्रयान-2 मिशन के लैंडर का नाम भी उनके सम्मान में ‘विक्रम’ रखा गया था।
असमय निधन और विरासत
अत्यधिक परिश्रम और निरंतर यात्राओं के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित होने लगा। 30 दिसंबर 1971 को मात्र 52 वर्ष की अल्पायु में तिरुवनंतपुरम के कोवलम में हृदय गति रुकने से उनका आकस्मिक निधन हो गया। पूरा देश इस महान वैज्ञानिक के खो जाने से शोक में डूब गया।
डॉ. विक्रम साराभाई का जीवन यह सिद्ध करता है कि एक सच्चा वैज्ञानिक केवल प्रयोगशाला में प्रयोग नहीं करता, बल्कि अपनी खोजों से कोटि-कोटि जनमानस के जीवन को सुगम बनाने का प्रयास करता है। आज भारत जो चंद्रयान, मंगलयान और आदित्य-L1 जैसे जटिल अंतरिक्ष मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दे रहा है, वह उसी दूरदर्शी सोच और बीज का प्रतिफल है जो डॉ. साराभाई ने छह दशक पहले बोया था। उनका जीवन और विचार भारत की हर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
